जीवन हमें नित नए उपहार दे रहा है। हर घड़ी, हर नया दिन एक अवसर बनकर आता है। हमारे लक्ष्य छोटे हों या बड़े, हर पल हम उनकी तरफ़ बढ़ सकते हैं; यदि अपने आस-पास सजग होकर देखें कि प्रकृति किस तरह हमारी सहायक हो रही है। वह हमें आगे ले जाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। हम कोई कर्म करते हैं और फिर प्रमाद वश या यह सोचकर कि इससे क्या होने वाला है, बीच में ही छोड़ देते हैं। किंतु प्रकृति धैर्य नहीं छोड़ती, वह माँ है जो सदा अपने बच्चों को पूर्णता की ओर जाते देखना चाहती है। माया कहकर हम चाहे उसे दोष दें पर माया ही हमें जगाती है; फंसने से बचाती है, कभी पुरस्कार द्वारा, कभी फटकार द्वारा हमें सही मार्ग पर रखती है, ताकि एक दिन हम अपने गंतव्य तक पहुँच सकें, स्वयं को परमात्मा से जोड़ सकें। सदकर्मों को करते हुए, मन को शुद्ध रखें और कण-कण में छिपे देवत्व को अपने भीतर पहचान सकें। माँ की कृपा का अनुभव करना भी एक तरह की साधना है जो सजग होकर की जा सकती है। हम अपने वरदानों पर नज़र डालें तो वे बढ़ते जाते हैं, और वे प्रेरित करते हैं। पाँच इंद्रियों तथा मन के रूप में देवता हमारे सहायक बनें, वे हमें सन्मार्ग पर रखें, ऐसी ही प्रार्थना हमें करनी है।
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Sunday, November 20, 2022
Thursday, April 27, 2017
तेरा तुझको अर्पण
२८ अप्रैल २०१७
शास्त्रों में दान की महिमा यूँ ही नहीं गाई गयी है. देने का भाव
जिसके मन में जगता है वह देवत्व की और कदम बढ़ाने लगता है. प्रकृति इतनी प्रिय
क्यों लगती है क्यों कि वह निरंतर लुटा रही है. नन्हे बच्चे सहज ही मुस्कान बांटते
रहते हैं. पालतू पशु निस्वार्थ प्रेम लुटाते रहते हैं. संत जो समाज को सिर्फ देते
ही देते हैं, सबके आदर के पात्र बन जाते हैं. तन,
मन धन किसी भी प्रकार से हमें इस
जगत में कुछ देने का भाव रखना है. हाथों से सेवा न भी कर सकें तो वाणी से
अथवा सद्विचारों के रूप में मानसिक सेवा भी कर सकते हैं. ऐसा करने से सबसे बड़ा
लाभ हमारा होता है, वस्तुओं के प्रति आसक्ति घटती
है, मन
खाली होता है और परमात्मा की कृपा का अनुभव सहज ही होने लगता है. जो खाली है, वही तो भरा जायेगा. हरेक
के पास जगत को देने के लिए बहुत कुछ है, बल्कि जो कुछ हमारे पास है वह जगत से ही मिला है तो उसी
की वस्तु उसी को लौटा देनी है और मुक्त भाव से इस जगत में विहार करना है.
Tuesday, December 16, 2014
सोच वही जो उसको भाए
जुलाई २००७
साधना
के द्वारा मन की शक्तियाँ जब बढती हैं तो दैवीय सत्ता भीतर जगने लगती है. पहली बार
जब हम इस धरा पर आये थे, तो भीतर देवत्व था, वह ढक गया है पर भीतर वह पूर्ण जाग्रत
है, रह-रह कर वह अपनी सत्ता से परिचित कराता है. हमें उसे बाहर निकालना है. हम
देवताओं के वंशज हैं, अमृत पुत्र हैं. सद्विवेक हमारा स्वभाव है. व्यर्थ के
विचारों को यदि सार्थक विचारों में बदल दें तो हमारी क्षमता पांच गुणी बढ़ जाएगी. जब
मन शांत होता है तब परमात्मा के प्रति भीतर सहज प्रेम जगने लगता है. उससे एक संबंध
बनने लगता है. उसके प्रेम से हम सशक्त हो जाते हैं और वह हमें राह दिखाता है. तब
हम संसार के लिए उपयोगी बनने लगते हैं. परमात्मा हमारे द्वारा काम करने लगता है.
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