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Wednesday, January 30, 2019

उसके कदमों में झुकना है


३१ जनवरी २०१९ 
जीवन में कोई आदर्श न हो, कोई ऐसा न हो जिसके सामने सिर झुकाया जा सके तो जीवन का मर्म कभी नहीं खुल सकता. जिसके भीतर प्रेम और आदर को स्थान नहीं मिला उसके मन में भक्ति और श्रद्धा कैसे खिल सकती है. हमें अपने बड़ों का आदर करना है ताकि हमारा उद्धार हो, छात्रों को शिक्षकों का सम्मान करना है तभी वे उनके दिए ज्ञान को ग्रहण कर सकेंगे. पुत्र को पिता के पैर छूने हैं ताकि एक दिन उसका सिर भीतर परमात्मा के सम्मुख भी झुक सके. बहू को सासूजी का कहा मानना है ताकि एक दिन उसके भीतर देवी का जागरण हो सके. आधुनिकता के नाम पर आज हम सारी सम्भावनाओं को ही खत्म दिए जा रहे हैं. छोटे-छोटे बच्चे माँ-पिता के सामने जवाब देने लगे हैं, जो मन माता-पिता के सम्मुख नहीं झुकता वह कभी परमात्मा के सामने झुकेगा इसकी कल्पना व्यर्थ है. ऐसा मन यदि भविष्य में तनाव का शिकार होता है तो कोई आश्चर्य नहीं. झुकना हमारे लिए सार्थक है, जिसके सम्मुख हम झुकते हैं उसके लिए नहीं.

Thursday, October 26, 2017

ॐ सूर्यायः नमः

२६ अक्तूबर २०१७ 
परमात्मा की कृपा का अनुभव करना जिसने सीख लिया, उसका सारा जीवन एक उपहार बन जाता है. हवा, धूप, जल पृथ्वी और आकाश के प्रति उसके हृदय में आदर और सम्मान का भाव उमगता है, वह इन्हें दूषित करने की बात तो सोच ही नहीं सकता. हमारे वैदिक ग्रन्थों में प्रकृति के लिए जो प्रार्थनाएं और स्तुतियाँ हैं, वह ऐसे ही ऋषियों ने गायीं हैं. विज्ञान ने मानव जीवन को सुख-सुविधाओं से तो सम्पन्न किया है पर उसके मन के कोमल भावों को जैसे चुरा लिया है. अब चाँद को देखकर शहरी नागरिक का मन उल्लसित नहीं होता, सूर्य को जल चढ़ाने की बात पर वह हँसता है. मन को पल्लवित और प्रफ्फुलित होने के लिए प्रकृति का आश्रय लेना ही होगा, यह उसी से बना है. छठ पूजा सूर्य के प्रति मानव मन की श्रद्धा का जीवंत उदाहरण है. 

Thursday, April 27, 2017

तेरा तुझको अर्पण

२८ अप्रैल २०१७ 
शास्त्रों में दान की महिमा यूँ ही नहीं गाई गयी है. देने का भाव जिसके मन में जगता है वह देवत्व की और कदम बढ़ाने लगता है. प्रकृति इतनी प्रिय क्यों लगती है क्यों कि वह निरंतर लुटा रही है. नन्हे बच्चे सहज ही मुस्कान बांटते रहते हैं. पालतू पशु निस्वार्थ प्रेम लुटाते रहते हैं. संत जो समाज को सिर्फ देते ही देते हैं, सबके आदर के पात्र बन जाते हैं. तन, मन धन किसी भी प्रकार से हमें इस जगत  में कुछ देने का भाव रखना है. हाथों से सेवा न भी कर सकें तो वाणी से अथवा सद्विचारों के रूप  में मानसिक सेवा भी कर सकते हैं. ऐसा करने से सबसे बड़ा लाभ हमारा होता है, वस्तुओं के प्रति आसक्ति घटती है, मन खाली होता है और परमात्मा की कृपा का अनुभव सहज ही होने लगता है. जो खाली है, वही तो भरा जायेगा. हरेक के पास जगत को देने के लिए बहुत कुछ है, बल्कि जो कुछ हमारे पास है वह जगत से ही मिला है तो उसी की वस्तु उसी को लौटा देनी है और मुक्त भाव से इस जगत में विहार करना है.  

Tuesday, August 19, 2014

हो निशंक जियें इस जग में

जनवरी २००७ 
श्रेष्ठ जनों से जब हम आदर ग्रहण करने लगते हैं तो वह हमारे पतन का कारण है. मान पाने की इच्छा वह भी बड़े लोगों से अधम सुख है. जो अपने भविष्य को सुंदर बनाना चाहता है उसे तो हर पल सजग रहना होगा. ईश्वर से उसे वही चाहना चाहिए जो उसके लिए हितकारी हो. श्रद्धा से भरा मन, विश्वासी मन, समर्पित मन ही निर्भार, निश्चिंत, निर्द्वन्द्व तथा निशंक हो सकता है. जब हम ऐसा जीवन जी सकते हैं तो व्यर्थ की चिंता क्यों करें. हम कितने तो भाग्यशाली हैं, मानव जन्म मिला, भारत भूमि में मिला तथा ज्ञान पाने का अवसर मिला. न जाने किस जन्म में कौन सा पुण्य किया था जो इतना सब सहज ही प्राप्त हुआ है. इस जगत में पाने योग्य यदि कुछ है तो श्रद्धा ही है. इसके सामने बड़े से बड़े सुख भी फीके पड़ जाते हैं. यह सुख भीतर से मिलता है, हमें सहज बनाता है, सत्य से मिलाता है. इसे पाने के बाद ही कोई मीरा गीतों को लुटाती है, सन्तजन प्रेम बरसाते हैं. यह जगत शरीर को रखने में सहायक है, लेकिन सुख नहीं दे सकता, हाँ, सुख देने के का भ्रम अवश्य दे सकता है.   

Wednesday, August 3, 2011

स्वर्ग-नर्क


जुलाई २००१ 
जब हमारे दिल मिले हों, स्वर्ग निकट है. मन जब झील के शांत पानी की तरह स्वच्छ और स्थिर होगा तो आत्मा की झलक हम देख पाएंगे. जब भौतिक वस्तुओं का उतना ही आदर होगा जिसके वे योग्य हैं तो हम स्वर्ग के निकट हैं. जब अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिये हम दूसरे को तुच्छ मानते हैं तो नर्क में ही होते हैं. हमारे मन में कामना यदि संसार की होगी तो पूरी होने पर अहंकार को तथा पूरी न होने पर विषाद को जन्म देगी. कामना परम की होगी तो शांति का अनुभव पहले ही होने लगता है... पूरी होने के बाद की शांति की तो हम कल्पना ही कर सकते हैं...अर्थात अपना स्वर्ग व नर्क हम स्वयं ही गढ़ते हैं.