गुरु पूर्णिमा के अवसर पर
गुरुतत्व उस बोध को कहते हैं, जो यह बताता है कि शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चेतना ही एकमात्र सत्य है। यह जगत दर्पण में दिख रहे नगर की भाँति है;अथवा तो जगत वह स्वप्न है जिसे हम खुली आँखों से देखते हैं। न जाने कितनी देहें हमने ग्रहण कीं और कितनी बार मृत्यु ने इस स्वप्न को तोड़ दिया, किंतु पुनः जैसे नींद में ही हम नयी देह लेकर एक नया स्वप्न देखने लगते हैं। आत्मा एक है, वह भिन्न-भिन्न उपाधियाँ ग्रहण करती है, पर स्वयं सदा पूर्ण बनी रहती है। जैसे सागर में हज़ारों लहरें उठती हैं पर जल तत्व वैसा ही बना रहता है। अज्ञान दशा में जीव सुख-दुख, मान-अपमान आदि में अपना जीवन बिताता है पर जब गुरुतत्व भीतर प्रकट होता है तो वह आनंद के एक महासागर में निमग्न हो जाता है और जीवन मुक्त रहकर जगत में अपने कर्त्तव्य निभाता है।
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