Tuesday, July 28, 2026
गुरुतत्व जागे जब भीतर
Sunday, October 27, 2024
समग्रता आये जब भीतर
हम देखते हैं कि पदार्थ अचेतन है, चट्टान हिल नहीं सकती, इसमें जीवन नहीं है। जीव जगत अर्धचेतन है, वृक्ष, पशु,पक्षी जीवित हैं, लेकिन उनमें विकसित मन नहीं है।मनुष्य चेतन है, उसमें मन है।मनुष्य में चेतना 'मैं' के विचार के साथ आती है।उसके भीतर चिंतन शुरू होता है, उसका व्यक्तित्व अस्तित्व में आता है। मन और बुद्धि के द्वारा वह अतीत का आकलन करता है, भविष्य की योजनाएँ बनाता है। मन को एक तरह की स्वतंत्रता है, वह सही-ग़लत में चुनाव कर सकता है। मन सीखे हुए ज्ञान पर आधारित रहता है। मन में एक के बाद दूसरा विचार आता रहता है इसलिए वह अहंकार के केंद्र द्वारा कार्य करता है। किंतु चेतना की एक चौथी अवस्था भी है जिसका निर्माण करना मानव के हाथ में है।इससे ही अंतर्दृष्टि का जन्म होता है।अंतर्ज्ञान भीतर से आता है, यह भीतर से विकसित होता है। चेतना के इस गुण को जिसे ध्यान, अंतर्ज्ञान, अंतर्दृष्टि, कालातीत होना कहा जाता है; वर्तमान भी कह सकते हैं। यह वह वर्तमान है जिसमें अतीत और भविष्य दोनों विलीन हो गए हैं।बुद्ध इसे ही निर्वाण कहते हैं, हिंदू और जैन इसे मोक्ष कहते हैं। जिसे पतंजलि तुरीय कहते हैं अर्थात 'चौथा'। यह अवस्था ध्यान के निरंतर अभ्यास से प्राप्त होती है। ध्यान हमारी सजगता बढ़ाने में सहायक है। यदि कोई पल-पल सचेत रहने की कला सीख जाता है तो उसे दिन-प्रतिदिन के कार्यों में अधिक सोच-विचार की आवश्यकता नहीं होती। वह तत्क्षण सही निर्णय ले पाने में सक्षम होता है। उसके भीतर एक अंतर्दृष्टि काम करने लगती है।जिसने कभी ध्यान न किया हो ऐसे व्यक्ति के लिए भी किसी ख़तरे के समय सोचने का समय नहीं होता, तुरंत निर्णय लेना है, यदि कोई सजग नहीं है तो दुर्घटना हो सकती है। किसी जाग्रत व्यक्ति के लिए यह उनका सामान्य ढंग है, वह चेतना की समग्रता से जीता है।
Monday, December 18, 2023
मुक्त हुई चेतना जिस पल
श्री श्री कहते हैं, चंड-मुंड, मधु-कैटभ, शुंभ-निशुंभ तथा रक्त बीज आदि सभी असुर हमारे भीतर हैं. हृदय और मस्तिष्क ही चंड-मुंड बन जाते हैं, यदि ह्रदय अति भावुक है और मस्तिष्क अति बौद्धिक है।ऐसी स्थिति में दोनों असुर की भाँति हमें दुख में पहुँचाते हैं। भावुकता और बौद्धिकता का संतुलित मेल ही हमारे जीवन को सुंदर बनाता है. मन में क्षण-क्षण जन्मने वाले राग-द्वेष ही मधु-कैटभ हैं और उनसे मुक्ति तब तक नहीं मिल सकती जब तक हमारी चेतना प्रेम में विश्राम न पा ले. जन्मों-जन्मों के संस्कार जो रक्त-बीज के रूप में हमारे भीतर पड़े हैं, उनसे भी तभी मुक्त हुआ जा सकता है जब दैवी शक्ति भीतर जागे, हमारी सुप्त चेतना मुक्त हो. अभी तो तन, मन व चेतना तीनों एक-दूसरे से चिपके हुए हैं, एक को पीड़ा हो तो दूसरा उसे अपनी पीड़ा मान लेता है, एक को हर्ष हो तो दूसरा उसे अपना हर्ष मान लेता है और होता यह है कि जगत में रहते हुए तन या मन को तो सुख-दुःख का अनुभव होता ही है, तो हर वक्त बेचारी चेतना कभी परेशान कभी दुखी या ख़ुशी में फूली हुई रहती है, उसे कभी मन के साथ अतीत में जाकर पछताना पड़ता है तो कभी भविष्य में जाकर आशंकित होना पड़ता है, वह कभी चैन से रह ही नहीं पाती, नींद में भी मन उसे स्वप्न की झूठी दुनिया में ले जाता है. उसकी मुक्ति ही हर साधना का लक्ष्य है।
Monday, March 13, 2023
सर्वम कृष्णाअर्पणम अस्तु
हम इस जगत को अपना मानकर रहेंगे तो इससे सुख-दुःख लेने-देने का व्यापार ख़त्म हो जाएगा; वरना यह लेन-देन अनंत काल तक चल सकता है। हर बार चाहे हमें कोई दुःख दे या हम किसी को कुछ कहें, पीड़ा एक ही चेतना को होती है। जैसे सारी पूजाएँ एक को ही समर्पित हो जाती हैं, वैसे ही सारी निंदाएँ भी अंतत:एक को ही पीड़ित करती हैं। वह एक हम स्वयं हैं। जगत जैसा है उसके लिए हम ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि वह हमारा ही विस्तार है , उसमें सुधार लाना, उसे सही करना उतना ही सहज होना चाहिए जैसे कोई अपने शरीर का कोई रोग दूर करने का प्रयास करता है या घर की मरम्मत करवाता है। यह जग हमारा बड़ा घर है और यहाँ के प्राणी हमारा बड़ा शरीर, जिसमें पशु-पक्षी, पौधे सभी आते हैं। यह सारा जगत हमारे भीतर ही है, आँखों व मन द्वारा हम सब कुछ अपने भीतर ही देखते हैं। कृष्ण के विश्वरूप का संभवतः यही अर्थ है।
Sunday, October 23, 2022
एकै साधै सब सधै
Monday, July 25, 2022
जैसे नदी मिले सागर से
मानव परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है क्योंकि उसके पास अनंत सम्भावनाओं के रूप में चेतना का बीज है। जब तक हम सामान्य जीवन से संतुष्ट रहते हैं, यह सुप्तावस्था में पड़ा रहता है, जब भीतर स्वयं को जानने की ललक उठती है तो यह बीज अंकुरित होने लगता है। पहली बार उस आनंद की झलक मिलती है जो इस जगत का नहीं है। अलौकिक प्रेम की धीमी-धीमी आँच भीतर सुलगने लगती है और मन देह की सीमा के पार विचरने लगता है। चेतना का बीज जिसे गहराई में छिपा मानते थे अब सारे ब्रह्मांड में उसके विस्तार का अनुभव होता है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म है और असीम से भी असीम ! कर्मों के प्रति विशेष आग्रह टूटने लगते हैं, क्योंकि हर कर्म किसी न किसी इच्छा की पूर्ति के लिए ही किया जाता है। जीवन से अनावश्यक झर जाता है और अस्तित्त्व का जो आशय है वह हमारे होने में पूर्ण होने लगता है। जैसे कोई नदी सागर तक का मार्ग सहज ही खोजती है वैसे ही भीतर की चेतना उस परम चेतना की ओर अग्रसर हो जाती है।
Saturday, May 21, 2022
कैसे हाथ बंटाए जग में
यह जगत तब तक ही जगत जैसा दिखायी देता है, जब तक स्वयं को जगत से पृथक मानते हैं. जब हम भीतर एक को जान लेते हैं तब इस जगत से पृथकता का अनुभव नहीं करते. एक ही चेतना हर जगह व्याप्त है, जो भिन्न-भिन्न रूप धारण कर रही है; तब न किसी को पाने की इच्छा, न खोने का भय, जीवन से स्वार्थ सिद्धि लुप्त हो जाती है. स्व में सारा जगत समा जाता है. तब किसी के दोष देखने की प्रवृत्ति का भी नाश हो जाता है, क्योंकि आत्मरूप से सब एक में ही स्थित हैं और जगत रूप से सभी कुछ परिवर्तित हो रहा है. जैसे स्वयं के मन, बुद्धि आदि विकारों का शिकार होते हैं, वैसे सभी के साथ होता है. जगत परमात्मा का क्रीड़ा स्थल है, यहाँ उसके इस आयोजन में अपना हाथ बंटाना भर है, अपना नया खेल आरंभ नहीं करना है !
Wednesday, January 5, 2022
ध्यान का जो अभ्यास करे
देह में रहते हुए देहातीत अवस्था का अनुभव ही ध्यान है। स्थूल इंद्रियों से स्थूल जगत का अनुभव होता है, सूक्ष्म इंद्रियों से स्वप्न अवस्था का अनुभव होता है। गहन निद्रा में स्थूल व सूक्ष्म दोनों का भान नहीं रहता। ध्यान उससे भी आगे का अनुभव है, जब निद्रा भी नहीं रहती, चेतना केवल अपने प्रति सजग रहती है। ध्यान के आरम्भिक काल में इस अवस्था का अनुभव नहीं होता है, पर दीर्घकाल के अभ्यास द्वारा इसे प्राप्त किया जा सकता है। एक बार इसका अनुभव होने के बाद भीतर स्मृति बनी रहती है। इसे ही भक्त कवि सुरति कहते हैं। इस अवस्था में गहन शांति का अनुभव होता है, मन में यदि कोई विचार आता है तो चेतना उसकी साक्षी मात्र होती है। देह में होने वाले स्पंदन और क्रियाएँ भी अनुभव में आती हैं, किंतु साक्षी भाव बना रहता है। जब विचार भी लुप्त हो जाएँ और देह का भान ही न रहे इसी अवस्था को समाधि कहते हैं। समाधि के अनुभव से सामान्य बुद्धि प्रज्ञा में बदल जाती है। मन में स्पष्टता और आनंद का अनुभव होता है।
Sunday, December 26, 2021
सहनशील चेतना हो जिसकी
जीवन क्या है ? क्या निरंतर कुछ न कुछ अनुभव करते रहने की ललक का ही दूसरा नाम जीवन नहीं है। शिशु के जन्म लेते ही यह प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। जब तक देहाध्यास नहीं छूटता, इंद्रियों से अनुभव लेने की कामना का नाश नहीं होता। हर नए प्रातः में हमारा पदार्पण यदि सजगता पूर्ण हो तो इन अनुभवों को ग्रहण करते हुए भी जीवन के मूल्यों को हम किसी भी क्षण विस्मृत नहीं करेंगे। हमारा अंतर स्वप्नशील हो जिसमें एक शिव संकल्प जलता रहे जो सदा प्रेरित करे। राह में यदि कांटे हों, अनदेखा करके कोई खुद को बचा कर निकल जाता है, पर संवेदनशील कांटे बीनता है और राह को अन्यों के लिए कंटक विहीन बना देता है ! जो सहनशील होगा वही अपनी चेतना को विकसित कर सकता है, नित नया सृजन करता है. जैसे प्रकृति नित नई है, यदि मन हर दिन कोई नया विचार, कोई नया गीत रचे। यह अनादि सत्य है कि सनातन मूल्यों को पकड़ कर ही नया सृजन होता है, वैसे ही जैसे मूल को पकड़ कर ही नया फूल खिलता है.
Sunday, October 3, 2021
मन असीम की शरण में जाए
हम जगत के लिए कैसे उपयोगी बनें यदि मन इसका चिंतन करे तो उसके सारे भय, आशंकाएँ और द्वंद्व खो जाएँगे। अहंकार केवल स्वयं के बारे में सोचता है और जैसे ही मन का विस्तार होता है, अहंकार के लिए कोई जगह नहीं बचती। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है सीमित में दुःख है, असीम में विश्राम है। अनंत ही हमारे मन को समाधान दे सकता है। स्वयं को जगत से पृथक मानना व जगत को स्वयं का विरोधी मानना ही तनाव का कारण है। तनाव से ही तन व मन के कई रोग होते हैं। जब हम सारे अस्तित्त्व को अपना ही विस्तार देखते हैं तो मन खो जाता है। देह पंच तत्त्वों के स्थूल भाग से बना है और मन उन्हीं के सूक्ष्म भाग से। इस प्रकार देह सृष्टि का ही एक छोटा अंश है और मन इस विशाल मन का। चेतना भी विश्व चेतना का ही भाग है। यहाँ हर वस्तु दूसरे से संयुक्त है। यह पूरा ब्रह्मांड एक ही जीवित इकाई है। यदि हम स्वयं को इसका एक अंश मानते हैं तो कोई विरोध या प्रतिद्वंदिता नहीं रह जाती। मन से सारा विषाद खो जाता है और एक अपूर्व शांति का अनुभव होता है।
Monday, August 30, 2021
जीवन में जब ध्यान घटेगा
Sunday, August 1, 2021
शिव-शक्ति से भरा जगत यह
शिव और शक्ति जगत के माता-पिता हैं, शिव अर्थात शुद्ध चैतन्य और शक्ति, उसमें निहित अनंत शक्तियाँ। सृष्टि में जो भिन्न-भिन्न प्रकार के पदार्थ हमें दिखाई पड़ते हैं, वे शिव की संकल्प शक्ति से ही जन्मे हैं। हमारे भीतर भी शिव तत्व है जिसका अनुभव ध्यान में किया जा सकता है, क्रिया शक्ति, ज्ञान शक्ति और इच्छा शक्ति जिसमें निहित हैं। जब ये तीनों शक्तियाँ एक होकर शांत हो जाती हैं तब केवल चैतन्य ही शेष रहता है। श्वास का लेना यदि शक्ति का कार्य है तो श्वास छोड़ने के बाद की विश्रांति शिव का अनुभव है। दिन में हम कार्य करते हैं जिसमें हर तरह की शक्ति की आवश्यकता होती है, पर रात्रि में विश्राम के लिए सब कुछ छोड़ देना होता है, इसलिए रात्रि को शिव रात्रि कहा जाता है। ध्यान में भी कुछ करना नहीं है केवल विश्राम करना होता है, तभी शुद्ध चेतना का अनुभव किया जा सकता है। इसी तरह कर्ता भाव से मुक्त होकर ही हम स्वयं में विश्राम पा सकते हैं।
Saturday, May 15, 2021
भक्ति करे कोई सूरमा
जब जीवन में उत्कृष्टता की चाह जगती है, तब भक्ति के प्रति जिज्ञासा मन में जगती है. जिनके जीवन में भक्ति रस प्रकट हुआ है वही भक्ति के बारे में बता सकता है. नारद कहते हैं, भक्ति प्रेम स्वरूपा है, प्रेम के बिना इस जगत में कोई रह नहीं सकता. प्रेम से ही सब कुछ प्रकट होता है पर प्रेम विकारों के बिना नहीं मिलता. भक्ति वह प्रेम है जो अविकारी है, वह अमृतस्वरूप है. प्रेम का लक्षण है शाश्वतता का अनुभव होना. ईश्वर को प्रेम करना भक्ति का प्रथम लक्षण है, जो दिखता नहीं उस अदृश्य से प्रेम करने पर तृप्ति का अनुभव होता है. जब तक समय की अनुभूति होती है तब तक हम अमरता का अनुभव नहीं करते. ईश्वर के प्रति प्रेम जगते ही भीतर एक शांत, प्रसन्न चेतना जगती है. भक्त के जीवन में द्वेष नहीं रहता, शोक नहीं रहता. ज्ञान मन के विकारों को दूर करता है पर ज्ञान के ऊपर है भक्ति. ज्ञान हमें पूर्णता का अनुभव नहीं कराता. भक्त अपने भीतर एक मस्ती का अनुभव करता है, स्तब्धता का अनुभव करता है. ज्ञान का उदय होता है और क्षय होता है पर भक्ति कभी कम नहीं होती जो नित वृद्धि को प्राप्त होती है.
Friday, April 2, 2021
चिर वसन्त की चाह जिसे है
साधना में कुछ पाना नहीं है, खोना है. तन, मन दोनों से पसीना बहाकर विषैले तत्वों को बाहर निकालना है. जीवन एक पुष्प की तरह खिले इसके लिए मन की माटी में भक्ति का बीज बोना होगा, श्रद्धा का बीज, आस्था का बीज, जो धीरे-धीरे जड़ें फैलाएगा और स्वार्थ के सारे कूड़े-करकट को खाद बनाकर उसे सुंदर आकार, रंग और गन्ध में बदल देगा. धरती में वह क्षमता है , वैसे ही मन की माटी में भी. हम जो भी सच्चे मन से चाहते हैं वह हमें दिया ही जाता है. यहां कोई पुकार कभी व्यर्थ नहीं जाती. सुख उत्तेजना का नाम है या आसक्ति का, दुःख द्वेष का नाम है अपनी इच्छा पूरी न होने का. आनंद तो एक विशेष मन:स्थिति है जो किसी बाहरी वस्तु, व्यक्ति या घटना पर आधारित नहीं है. वह तो सदा ही एक रस है. साधक को जब अपनी निर्विकार स्थिति का भान होता है, तभी आनंद का अनुभव होता है. हम जो भी देखते हैं वह हमसे बाहर है, यदि हमें स्वयं को देखना हो तो कैसे देखेंगे ? पतंजलि कहते हैं जब देखे हुए और सुने हुए के प्रति आकर्षण न रहे तब चेतना स्वयं में लौट आती है, तब स्वयं के द्वारा ही स्वयं को देखा जाता है. तब साधक के जीवन में चिर बसंत का पदार्पण होता है
Friday, July 3, 2020
चैतन्य: आत्मा -शिव सूत्र
शिव कहते हैं जिस आत्मा को तुम ढूंढ रहे हो वह चैतन्य है. यह संसार जड़-चेतन दोनों से बना है, इसमें जहाँ-जहाँ चेतना हो वहाँ मुझे खोज लेना. एक धूल के कण और एक जीवाणु में कौन चेतन है ? एक जगे हुए और एक सोये हुए व्यक्ति में कौन ज्यादा चेतन है ? हमारा मन जब निद्रा और तन्द्रा से भरा हो या किसी खतरे को देखकर सौ प्रतिशत सचेत हो तो दोनों में से कौन ज्यादा चेतन है ? यह चेतना जब किसी बुद्ध पुरुष में उस तरह खिल जाती है जैसे कोई कमल का फूल तो वहीं शिव प्रकट हो जाते हैं. मन जब अतीत के कारण पश्चाताप से भरा हो, भविष्य की चिंता से भरा हो या वर्तमान में तुलना से भरा हो तो चेतना पर एक आवरण छा जाता है. इसी को अहंकार कहते हैं जो शिव से जुदा रखता है. गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, शिव आदि गुरु हैं.