Showing posts with label तन. Show all posts
Showing posts with label तन. Show all posts

Monday, December 18, 2023

मुक्त हुई चेतना जिस पल

श्री श्री कहते हैं, चंड-मुंड, मधु-कैटभ, शुंभ-निशुंभ तथा रक्त बीज आदि सभी असुर  हमारे भीतर हैं. हृदय और मस्तिष्क ही चंड-मुंड बन जाते हैं, यदि ह्रदय  अति भावुक है और मस्तिष्क अति बौद्धिक है।ऐसी स्थिति में  दोनों असुर की भाँति हमें दुख में पहुँचाते हैं। भावुकता और बौद्धिकता का संतुलित मेल ही हमारे जीवन को सुंदर बनाता है. मन में क्षण-क्षण जन्मने वाले राग-द्वेष ही मधु-कैटभ हैं और उनसे मुक्ति तब तक नहीं मिल सकती जब तक हमारी चेतना प्रेम में विश्राम न पा ले. जन्मों-जन्मों के संस्कार जो रक्त-बीज के रूप में हमारे भीतर पड़े हैं, उनसे भी तभी मुक्त हुआ जा सकता है जब दैवी शक्ति भीतर जागे, हमारी सुप्त चेतना मुक्त हो. अभी तो तन, मन व चेतना तीनों एक-दूसरे से चिपके हुए हैं, एक को पीड़ा हो तो दूसरा उसे अपनी पीड़ा मान लेता है, एक को हर्ष हो तो दूसरा उसे अपना हर्ष मान लेता है और होता यह है कि जगत में रहते हुए तन या मन  को तो सुख-दुःख का अनुभव होता ही है, तो हर वक्त बेचारी चेतना कभी परेशान कभी दुखी या ख़ुशी में फूली हुई रहती है, उसे कभी मन के साथ अतीत में जाकर पछताना पड़ता है तो कभी भविष्य में जाकर आशंकित होना पड़ता है, वह कभी चैन से रह ही नहीं पाती, नींद में भी मन उसे स्वप्न की झूठी दुनिया में ले जाता है.  उसकी मुक्ति ही हर साधना का लक्ष्य है। 


Wednesday, November 9, 2022

बन जाए जीवन जब उत्सव

जीवन एक प्रसाद की तरह हमें मिला है।हमारा तन, पाँच इंद्रियाँ, मन तथा बुद्धि इस प्रसाद को ग्रहण करने में सहायक बन सकते हैं, यदि हम उनके प्रति सम्मान का भाव रखें। अपने शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए जब हम सृष्टि कर्ता  के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करते हैं तब हमारे सम्मुख एक नया आयाम खुलने लगता है। मन उसे जान नहीं सकता पर वह स्वयं मन को अपना आभास कराता है। जब जगत और अपने शरीर के प्रति हमारे भीतर सम्मान की भावना होती है तो अहंकार अपने शुद्ध रूप में प्रकट होता है। ऐसी स्थिति में हम स्वयं को जगत से पृथक मानकर स्वार्थ पूर्ति में लिप्त नहीं रहते बल्कि जगत का अंश मानकर स्वयं को उन कार्यों में लीन पाते हैं जो अपने साथ-साथ सबके लिए सुख का कारण बनें। छोटी-छोटी बातें अब व्यथित नहीं करतीं, एक गहन शांति का घेरा सदा ही चारों ओर बना रहता है और हम उस आनंद का अनुभव करते हैं जिसका कोई बाहरी कारण दिखायी नहीं देता। जीवन हमारे लिए एक अनवरत चलने वाला उत्सव बन जाता है। 


Wednesday, March 23, 2022

कौन यहाँ क़िसमें रहता है

क्या आपने कभी सोचा है, मन में शून्य है अथवा शून्य में मन है ? यदि कोई कुएँ से पानी भर रहा हो और सोचे कि घट में जल है या जल में घट ? इसी तरह दिल में रब है या रब में दिल है ? हम देह में रहते हैं या देह हममें  ? भक्त भगवान से पूछे, तुझमें मैं हूँ या तू मुझमें है ? स्वर्ण में कंगन है या कंगन में स्वर्ण ? वस्त्र में धागा  है या धागे  में वस्त्र ? और तो और, क्या सवाल में जवाब है या जवाब में सवाल छुपा है ? धरती पर जल है या जल में ही धरती है ?  इन सारे सवालों के उत्तर में मात्र एक शब्द मिलेगा ! 

वह है अनंत ! 

मन सीमित शून्य अनंत ज्यों, 

तन सीमित मन असीम है !

दिल छोटा सा रब अपार है, 

रूप लघु अरूप अनंत ! 


उस अनंत शून्य में थिरता 

वहीं छिपी है मन की समता !

वहीं जागरण, वहीं समाधि 

वहीं ठहर परमपद मिलता !


Thursday, April 22, 2021

तन, मन में जब एक्य सधेगा

 देह और मन एक-दूसरे के विरोधी जान पड़ते हैं , देह को विश्राम चाहिए और मन विचारों की रेल चला देता है, नींद गायब हो जाती है.  देह को काम करना है, व्यायाम करना है, मन आलस्य का तीर छोड़ देता है, कल से करेंगे, कहकर टाल जाता है. इसी तरह मन जब विश्राम चाहता है, ध्यान के लिए बैठता है तो देह साथ नहीं देती, यहाँ-वहाँ दर्द होता है और अदृश्य चीटियां काटने लगती हैं. मन जब अध्ययन के लिए बैठना है तो देह थकान का बहाना बनाती है. देह को भूख नहीं है पर स्वादिष्ट भोजन देखकर मन नहीं भरता. मन ऊर्जा है, अग्नि तत्व से बना है. देह में पृथ्वी, जल दोनों तत्व हैं और आग व पानी तो वैसे भी एक-दूसरे के विरोधी हैं. यदि देह व मन में समझौता हो जाये, एकत्व हो जाये, समन्वय हो जाये तो वे अग्नि और जल से मिलकर बनी भाप की तरह कितनी ऊर्जा को जन्म दे सकते हैं. देह भौतिक है, मन आध्यात्मिक, यदि दोनों में सामंजस्य हो जाये तो जीवन में एक नया ही आयाम प्रकट होता है. ऐसा होने पर काम के समय मन, तन को सहयोग देता है, विश्राम के समय देह भी मन को सहयोग देती है. दो होते हुए भी वे दोनों एक की तरह कर्म करते हैं, तब कोई द्वंद्व शेष नहीं रहता. स्वाध्याय तथा प्राणायाम का निरंतर अभ्यास इस लक्ष्य की ओर ले जाने में अति सहायक है.  यही अद्वैत की ओर पहला कदम है. 


Monday, February 24, 2020

जगे प्रार्थना ऐसी मन में


शास्त्र शुद्ध बुद्ध, मुक्त आत्मा का संदेश देते हैं. तन-मन से अशुद्धियाँ निकल जाएँ, यह प्रार्थना  ही हर कोशिका को जीवंत कर देती है जीवन से हर विकार दूर हो, प्रमाद, आलस्य और तमस की नींद से जाकर हम जीवन में नया सवेरा लाएं.परमात्मा की दी हुई शक्तियों को इस्तेमाल कर स्वयं से व्यक्त होने का उन्हें मौका दें. अध्यात्म का अर्थ है आत्मा हमसे प्रकटे, तन और मन उसमें बाधा न बनें तो वह स्वयं प्रकाशित है जैसे कोई खिड़की का पट उढ़का ले तो सूरज का प्रकाश रुक जाता है. प्रकाश के लिए सूरज बनाना तो नहीं है, न ही कहीं से लाना है,आत्मा है, हमने रोक हुआ है उसका मार्ग. देह स्थूल है, मन भी स्थूल है, देह प्रकृति है, मन भी प्रकृति का अंग है, जो पल-पल बदल रही है, आत्मा सदा एक सी  स्वयं में पूर्ण है, उसको मार्ग दें तो वह अपनी मुस्कान से भर देगी तन, मन दोनों को जैसे सूर्य प्रकाशित करता है घर की हर शै को ! 

Monday, August 26, 2019

काहे री नलिनी तू कुम्हलानी



संत कबीर कहते हैं, 'काहे री नलिनी तू कुम्हलानी'. हमारा मन रूपी कमल भी अक्सर कुम्हला जाता है, हम अपने आपसे यह सवाल पूछें तो उत्तर मिल सकता है. दिक्कत यह है कि हमने स्वयं को मन ही समझ लिया है, इसलिए मन के उदास होते ही हम भी परेशान हो जाते हैं और सवाल पूछना तो दूर सामान्य व्यवहार भी भुला बैठते हैं. दुखी व्यक्ति न बोलने योग्य बोल देता है, न सोचने योग्य सोच लेता है और विषाद के कारण हुए तनाव से तन को भी रोगी बना लेता है. हम अन्यों को सलाह देने में कितने दक्ष हैं, किसी की भी, कैसी भी समस्या हो, हमारे पास उसका निदान सदा ही रहता है. कितना अच्छा हो यदि एक क्षण के लिए भी मन पर बादल छाये तो हम उससे पूछें और एक समझदार मित्र की तरह उसे इस दुःख से बाहर निकलने की सलाह दे सकें. ऐसा करने के लिए मन के साथ हुआ तादात्म्य तोड़ना होगा. नीले आकाश की तरह विस्तृत हमारा स्वरूप है और उस पर उड़ते हुए बादलों की तरह विचार हैं, दोनों में कोई तादात्म्य नहीं, दोनों पृथक हैं. विचारों के पार जाते ही मन के सुख-दुःख के हम साक्षी मात्र रहते हैं, वे हम पर अपना असर नहीं डाल सकते.  

Friday, October 5, 2018

अनुपम है यह जीवन का क्रम


६ अक्तूबर २०१८ 
मौसम में बदलाव के लक्षण स्पष्ट नजर आ रहे हैं. धूप अब उतनी नहीं चुभती, शामें शीतल हो गयी हैं और सुबह हल्का सा कोहरा लिए आती है. प्रकृति अपनी चाल से चलती रहती है, वर्ष दर वर्ष..और जीवन भी बहता रहता है. मन रूपी चन्द्रमा भी तन रूपी धरती के चक्कर लगाता रहता है, आत्मा रूपी सूर्य से प्रकाशित मन रूपी चन्द्रमा यदि इस बात को याद रखे कि उसका ज्ञान उपहार का है, सूर्य से मिला है, उसका अपना नहीं है, तो वह कृतघ्न नहीं होगा. तब पूर्णिमा के दिन जब पूर्ण चन्द्रमा प्रकाशित होता है, और अमावस्या के दिन जब वह अप्रकाशित रह जाता है, दोनों ही स्थितियों में वह विचलित नहीं होगा. जब तन और आत्मा के बिलकुल मध्य में मन आ जाता है, सूर्य ग्रहण भी तभी लगता है, अर्थात जब हम मन में ही जीने लगते हैं, आत्मा का विकास रुक जाता है. इसी प्रकार जब मन और आत्मा के मध्य तन आ जाता है, तब चन्द्र ग्रहण लगता है, अर्थात जब हम देह में जीते हैं, तब मन विकसित नहीं हो पाता. कितने सुंदर हैं ये प्रतीक और कितना गहन अर्थ इनमें छुपा है.

Monday, October 26, 2015

एक शिवालय है यह तन


मानव देह परमात्मा का मन्दिर है, देह में ही परमात्मा का अनुभव सम्भव है. मन मनुष्य निर्मित है, देह नैसर्गिक है. मन बंटा है, अशान्ति मन के कारण है. मन समाज का दिया है, तन प्रकृति का है, हर पल परमात्मा से जुड़ा है, प्राण जो इस देह को चला रहे है, पंच तत्व जिनमें परमात्मा ओतप्रोत है, जिनके स्पर्श से भीतर पुलक भर जाती है, इस देह द्वारा ही अनुभव में आते हैं. इसीलिए संतजन कहते हैं स्वयं को जानो, स्वयं के पार ही वह छुपा है जिसे जानकर फिर कुछ जानने को शेष नहीं रहता.   

Monday, June 1, 2015

उसका सुमिरन जब होगा

अप्रैल २००९ 
दुनिया का कोई ऐसा सुख नहीं है जो अपने पीछे दुःख को न छिपाए हो. परमात्मा का सुख ही ऐसा है जो विपरीत से जुड़ा नहीं है. ज्ञान है तो परमात्मा है. ज्ञान के कारण कोई परमात्मा के मार्ग पर नहीं चलता, दुःख के कारण चलता है. दुखों में सबसे बड़ा दुःख तो मरण का है. मरण को याद रखके ही कोई परमात्मा को याद करता है. बेअंत की याद उसी को आएगी जो अपने अंत को याद करता है. अकाल को वही पा सकता है जो काल को याद करता है. तन का घट मिट्टी का है, प्रकृति एक दिन उसे अपने तत्वों से जोड़ देती है. मन का घट परमात्मा का है. मन ज्योति स्वरूप है. तन को प्रकृति अपने घर पहुंचा देती है, मन को अपने घर खुद जाना है. संसार हर समय याद आता है पर हजार प्रयत्न करने पर भी परमात्मा याद नहीं आता. जिसे याद आता है, वह महा आनंद को पाता है, उसे भूल जाना ही दुःख है. 

Wednesday, April 1, 2015

निज स्वभाव में टिकना आये

अक्तूबर २००८ 
तन स्वस्थ रहे तो मन स्वस्थ रहता है और मन स्वस्थ रहे तो तन स्वस्थ रहता है पर आत्मा स्वस्थ रहे तो दोनों स्वस्थ रहते हैं. इसलिए आत्मा को ही स्वस्थ रखना परम लक्ष्य होना चाहिए. सरवर में जैसे कमल रहता है वैसे ही आत्मा तन में रह सकती है. कर्ता का भाव छूटना ही वह समझ है जो भीतर क्रांति ला सकती है. वही अहंकार है. हमारी जीवन धारा इसी के कारण मटमैली हो जाती है. जैसे जगत में सब कुछ हो रहा है, तन व मन अपने स्वभाव के अनुसार बरत रहे हैं, आत्मा साक्षी मात्र है यह अनुभव ही आत्मा को स्वस्थ रखता है.  

Friday, December 19, 2014

जब जागो तभी सवेरा

जुलाई २००७
 “जब जागें तभी सवेरा” हम सोये हुए हैं, स्वप्न ही देखकर अपना जीवन बिता रहे हैं. शास्त्र व गुरू कहते हैं हर पल सजग रहना है. मन, वचन, काया से हमसे किसी को उद्वेग न हो. यदि कभी किसी का दिल दुःख ही जाये तो प्रायश्चित करना चाहिए, जैसे हर दिन तन को स्वच्छ करते हैं वैसे ही हर रात सोने से पूर्व दिन भर की भूलों का स्मरण करके मन को धो डालना चाहिए. हर परिस्थिति में सम भाव में रहने का तप करने से भी विकार नष्ट हो जाते हैं.


Wednesday, August 6, 2014

शुभता ही प्रकटे जीवन से

जनवरी २००७ 
हमारा तन वेदिका है. प्राणों को हम भोजन की आहुति देते हैं. प्राणाग्नि बनी रहे, देह दर्शनीय रहे, पवित्र रहे इसलिए सात्विक और अल्प आहार ही लेना है. इंद्र हाथ का देव है, सो कर्म भी ऐसे हों जो भाव को शुद्ध करें. मुख के देव अग्नि हैं, अतः वाणी भी शुभ हो. अतियों का निवारण ही योग है. योग से मन प्रसन्न रहता है और भीतर ऐसा प्रेम प्रकटता है जो शरण में ले जाता है. सन्त हमें जगाते हैं और हम जग कर पुनः सो जाते हैं. हमें संकल्प करना है कि अशुभ से बचे, क्यों कि अशुभ विष है और हमें जीना है. व्यवहार क्षेत्र में पहले भाव फिर क्रिया होती है पर अध्यात्म क्षेत्र में पहले क्रिया पवित्र हो तो भाव अपने आप पवित्र होने लगते हैं. श्रवण या पठन क्रिया है पर श्रवण के बाद मनन फिर निदिध्यासन होता है. 

Thursday, December 5, 2013

ऐसे जग सुंदर हो जाये

हमारा तन स्वस्थ रहे ताकि हम साधना कर सकें, साधना करें ताकि मन स्वस्थ रहे, मन स्वस्थ रहे ताकि अंतर साधना हो सके, अंतर साधना हो ताकि मन निर्मल हो, मन निर्मल हो ताकि उसमें परम सत्य का प्रकाश हो, परम सत्य को पायें क्यों कि सत्य ही शिव और सुंदर है, शिव को पायें ताकि हम सभी के लिए सुखद हो जाएँ, हमारे होने से जड़-चेतन किसी को कोई उद्वेग न हो, न ही हमें किसी से कोई उद्वेग हो. सौन्दर्य को पाकर हम चारों ओर सुन्दरता बिखेरें. कुछ भी ऐसा न कहें, सोचें, न करें जो इस जगत को क्षण भर के लिए भी असुन्दर बना दे. ईश्वर की इस सुंदर सृष्टि को देख-देख हम चकित होते हैं, विभोर होते हैं, भीतर प्रेम का अनुभव करते हैं तो और भी चकित होते हैं, कैसे अद्भुत भाव भीतर जगते हैं, यह क्या है? कौन है? किसे अनुभव होता है? कौन अनुभव कराता है? कौन प्रेम देता है? कौन प्रेम लेता है ? ये सारे भाव शब्दों की पकड़ में नहीं आते. संतों की आँखों से ये पल-पल झरते हैं. 

Monday, May 6, 2013

बिखरा है चहुँ ओर वही तो


सितम्बर २००४ 
हमारा तन पांच तत्वों का बना हुआ है और हमारा मन प्रेम का, मन को हम देख नहीं सकते महसूस करते हैं, वैसे ही प्रेम को भी. जैसे विकारी मन दुःख देता है, शांत मन सुखकारी है, प्रेम भी यदि विकृत हो जाये अर्थात उसमे ईर्ष्या, क्रोध आदि के भाव समा जाएँ तो वह दुःख देता है. इन विकारों से रहित शुद्ध प्रेम हमें अपने भीतर ही खोजना होगा, तब वह सृष्टि के कण-कण में दिखाई देगा. वर्तमान के क्षणों में ही ऐसे प्रेम का अनुभव हो सकता है, क्योंकि वह बालवत निर्दोष होता है, उसे कुछ चाहिए नहीं, वह देना चाहता है. मृत्यु के क्षणों में भी प्रेम के कारण ही प्रेमी अनंत में समा  जाता है, फिर एक नया शरीर धारण करता है तो जगत से प्रेम के कारण ही.

Sunday, November 18, 2012

एक पुकार सदा आती है


अक्तूबर २००३ 
हमारे तन का पोर-पोर, मन का हर अणु परमात्मा के नाम से इस तरह ओत-प्रोत हो जाये कि जैसे पात्र पूरा भर जाने पर जल छलकने लगता है वैसे ही उसके नाम का अमृत हमारे अधरों व नेत्रों से स्वतः ही झलकने लगे. हमारा चित्त जब पूर्णतया तृप्त होगा उसके नाम से भरा होगा तो भीतर के पाप-ताप, अशुभ वासनाएं धुल जाएँगी. उसके नाम में अनंत शक्ति है, वह ऐसा जहाज है जो हजारों को पार लगाता है. हमारे भीतर-बाहर उसकी ही सत्ता है. वह हजारों हाथों से हमें सम्भाले है, हमारी बुद्धि को वही तीक्ष्णता देता है, हमारे प्राणों का वही आधार है. वह ईश्वर अनिर्वचनीय है, वह जब हमारे साथ है तो हमें किसी बात का भय नहीं, कोई आशा नहीं, कोई चाह नहीं. वह मौन में भी बोलता है. हमारे भीतर उसी का मौन छाया है जो तृप्ति प्रदान करता है. हम आत्मा के द्वारा ही उसका अनुभव कर सकते हैं, इसके लिए न तो बल चाहिए न ही बुद्धि, हम जिस कार्य को बिना शरीर, मन, बुद्धि आदि की सहायता के कर सकते हैं वह है ध्यान. वही हमें प्रभु से मिलाता है. कार्य करते हुए यदि कर्तापन नहीं रहे तो भी हम शरीर, मन, बुद्धि से परे ही हुए. ऐसा कार्य भी ध्यान बन जाता है. हमारा जीवन सहज भी है और दुष्कर भी, ईश्वर भी ऐसा ही ही है अति निकट भी अति दूर भी. इन द्वंद्वों से भी मुक्त होना है, तब एक सहज शांति का अनुभव होता है, पर हम ही उसे गंवा देते हैं पर कृष्ण हमारा मित्र हमें बार-बार अपनी ओर ले जाने की चेष्टा करता है.

Sunday, May 6, 2012

मन का कौन लगाये मोल


जगत से व्यवहार करना है, उसे हमारी सेवा चाहिए जो तन और धन से हम कर सकते हैं. परमात्मा को हमारा मन चाहिए. संसार को हमारे मन की परवाह नहीं होती. मन का मोल परमात्मा ही जानता है  मन का स्नेह, प्रीत, पूजा, श्रद्धा सब अस्तित्त्व के नाम हो तो हमें सौ गुणा प्रतिदान मिलता है, उसका प्रेम शत गुणा होकर हमारे भीतर प्रकट होता है. दिव्य सुख व दिव्य आनंद देने में वही सक्षम है. मन तो आत्मा रूपी समुन्दर में उठी लहर है और आत्मा उसी का अंश है सो मन भी उसी का हुआ पर हम इसे जगत को दे देते हैं. कोई कीमती सामान देने से पहले हम दस बार सोचते हैं पर अनमोल मन दुश्मन को भी रत्ती के भाव दे देने में हमें कोई फर्क नहीं पड़ता. जब हम किसी के प्रति दुर्भाव भी रखते हैं तो भी मन उसी का चिंतन करता है यह उसे देना ही हुआ. व्यवहार भर का सम्बन्ध तो हमें संसार से बनाये रखना है पर दृढ़ बंधन उसी के साथ बांधना है अथवा तो उसके नाते बांधना है, उसको सबमें देखकर बांधना है. वह अकारण दयालु है, हितैषी है, प्रेमिल है, निकटस्थ है. वह तभी आता है जब मन खाली हो जाता है. एक हल्की जलधारा की तरह... जो स्वच्छ है निर्मल है, शीतल है, सुखमय है, वर्षा की फुहार की तरह... आकाश की तरह.. जहाँ कुछ भी नहीं है. मन जब विस्तृत हो जाता है सारा ब्रह्मांड अपना लगता है सभी को घेरे हुए पर सबसे अलग.

Thursday, December 29, 2011

जाना है उस पार


अगस्त २००२ 
ध्यान जब सधने लगता है तो कई अद्भुत अनुभव साधक को होते हैं. कितनी सुंदरता छिपी है हमारे भीतर, ईश्वर जहाँ है वहाँ तो सौंदर्य बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की आकांक्षा को इनसे बल मिलता है. सत्संग, स्वाध्याय व साधना को कभी त्यागना नहीं है, शरीर की अवस्था चाहे कैसी भी हो. बाहरी परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने भीतर की यात्रा पर जाने से वे हमें रोकें नहीं. धीरे-धीरे इस मार्ग पर बढ़ना होता है और हृदय में यह दृढ़ विश्वास लिये कि इसी जन्म में मंजिल मिलेगी. मन से स्मरण कभी जाये नहीं तो मानना होगा कि उसने पूरी तरह इस पर अधिकार कर लिया है. सँग दोष  से बचना होगा और कमलवत् रहने की कला सीखनी होगी. वाणी का संयम व अन्तर्मुख होना भी आवश्यक है. मधुमय, रसमय और आनन्दमय उस ईश्वर को पाना कितना सरल है. चित्त के विक्षेप से ही वह दूर लगता है लेकिन यह विक्षेप तो भ्रम है, टिकेगा नहीं. वह शाश्वत है, अटल है, आधार है सबका. वह कहीं जाता नहीं. केवल चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्वच्छ करना है.