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Friday, October 5, 2018

अनुपम है यह जीवन का क्रम


६ अक्तूबर २०१८ 
मौसम में बदलाव के लक्षण स्पष्ट नजर आ रहे हैं. धूप अब उतनी नहीं चुभती, शामें शीतल हो गयी हैं और सुबह हल्का सा कोहरा लिए आती है. प्रकृति अपनी चाल से चलती रहती है, वर्ष दर वर्ष..और जीवन भी बहता रहता है. मन रूपी चन्द्रमा भी तन रूपी धरती के चक्कर लगाता रहता है, आत्मा रूपी सूर्य से प्रकाशित मन रूपी चन्द्रमा यदि इस बात को याद रखे कि उसका ज्ञान उपहार का है, सूर्य से मिला है, उसका अपना नहीं है, तो वह कृतघ्न नहीं होगा. तब पूर्णिमा के दिन जब पूर्ण चन्द्रमा प्रकाशित होता है, और अमावस्या के दिन जब वह अप्रकाशित रह जाता है, दोनों ही स्थितियों में वह विचलित नहीं होगा. जब तन और आत्मा के बिलकुल मध्य में मन आ जाता है, सूर्य ग्रहण भी तभी लगता है, अर्थात जब हम मन में ही जीने लगते हैं, आत्मा का विकास रुक जाता है. इसी प्रकार जब मन और आत्मा के मध्य तन आ जाता है, तब चन्द्र ग्रहण लगता है, अर्थात जब हम देह में जीते हैं, तब मन विकसित नहीं हो पाता. कितने सुंदर हैं ये प्रतीक और कितना गहन अर्थ इनमें छुपा है.

Friday, June 19, 2015

यह जगत इक आईना है

फरवरी २०१०
यह जगत एक दर्पण है, इसमें वही झलकता है जो हमारे भीतर होता है, भीतर प्रेम हो, आनंद हो, विश्वास हो तथा शांति हो तो चारों और वही बिखरी मालूम होती है, अन्यथा जगत सूना-सूना लगता है. यहाँ किस पर भरोसा किया जाये ऐसे भाव भीतर उठते हैं, भीतर की नदी सूखी हो तो बाहर भी शुष्कता ही दिखती है, लेकिन भीतर का यह मौसम कब और कैसे बदल जाता है पता ही नहीं चलता. कर्मों का जोर होता है अथवा तो हम सजग नहीं रह पाते. कोई न कोई विकार हमें घेरे रहता है तो हम भीतर के रब से दूर हो जाते हैं, हो नहीं सकते पर ऐसा लगता है, यह लगना भी ठीक है क्योंकि भीतर छिपे संस्कार ऐसे ही वक्त अपना सिर उठाते हैं, पता चलता है कि अहंकार अभी गया नहीं था, कामना अभी भीतर सोयी थी, ईर्ष्या, द्वेष के बिच्छू डंक मारने को तैयार ही बैठे थे. अपना-आप साफ दिखने लगता है.  

Saturday, November 5, 2011

भीतर का मौसम


जून २००२ 

बाहर के मौसम के मिजाज तो बदलते रहते हैं, हमें अपने अंदर वह धुरी खोज निकालनी है जो अचल है, अडिग है जिसका आश्रय लेकर हम दुनिया में किसी भी ऊंचाई तक पहुँच सकते हैं. जो मुक्त है, शुद्ध प्रेम स्वरूप है, उसी को पाने के लिये भीतर की यात्रा योगी करते हैं. स्थिर मन ही हमें उस स्थिति तक ले जा सकता है और मन की स्थिरता ध्यान से आती है. वहाँ एक बार जाकर लौटना नहीं होता, हम जीतेजी पूर्णता का अनुभव करते हैं. प्रकृति के सान्निध्य में अथवा पूजा के क्षणों में अभी भी हम कभी-कभी ईश्वर की झलक पाते हैं पर यह अस्थायी होती है, संसार पुनः हमें अपनी ओर खींच लेता है.