बुद्ध ने कहा है, जीवन में दुःख है. इस दुःख का कारण है. कारण का निवारण है. वह पथ है जिस पर चलकर एक दुखविहीन अवस्था का अनुभव किया जा सकता है. जीवन में जन्म, मरण, बुढ़ापा, मृत्यु, ये चार दुःख हरेक को भोगने पड़ते हैं. उदासी, क्रोध, ईर्ष्या, चिंता, भय, अवसाद सभी दुःख हैं. प्रियजनों से विछोह दुःख है, अप्रिय से मिलन दुःख है. इच्छा, आसक्ति, देह, मन, बुद्धि आदि से चिपकाव दुःख है. अज्ञान ही इन दुखों का कारण है. जीवन के मर्म को न समझकर हम इन दुखों से ग्रस्त होते हैं. इन दुखों से बचा जा सकता है. जीवन के सत्य को समझकर ही कोई दुःख से मुक्त हो सकता है. बुद्ध ने एक मार्ग भी दिया जिस पर चल कर एक ऐसी अवस्था भी आती है जहाँ कोई दुःख नहीं है. इस पथ का राही सजग होकर सदा वर्तमान में रहता है. सजगतापूर्वक जीने का मार्ग ही अष्टांगिक मार्ग है. सम्यक समझ, सम्यक विचार, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयत्न, सम्यक ध्यान, सम्यक एकाग्रता जिसके अंग हैं.
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Sunday, July 5, 2020
Thursday, June 29, 2017
पहला सुख निरोगी काया
३० जून २०१७
बचपन में हम सबने एक कहानी सुनी है, एक व्यक्ति अपनी निर्धनता से तंग आकर मरना
चाहता है, एक साधु उससे कहते हैं, तुम्हारे पास तो लाखों रूपये हैं, यदि तुम अपनी
एक आँख ही दे दो तो राजा तुम्हें एकम लाख रूपये दे देंगे. इसी तरह वह हर अंग की एक
कीमत बताता है. निर्धन व्यक्ति किसी भी कीमत पर अपने अंग बेचना नहीं चाहता. उसे
अपनी भूल का अहसास हो जाता है और वह किसी भी तरह मेहनत करके अपना जीवन यापन करने
का प्रण लेता है. हम सभी अपने शरीर की अच्छी तरह देखभाल करते हैं, भरसक उसे उचित
आहार, व्यायाम तथा विश्राम देकर स्वस्थ रखने का प्रयत्न करते हैं. इसके बावजूद हम
रोगों के शिकार होते हैं, क्योंकि हम अपने भीतरी अंगों का उतना ध्यान नहीं रखते,
वे दृष्टि से परे हैं सो हम जैसा चाहे उनके साथ व्यवहार करते हैं. जितनी बार हम
क्रोध करते हैं, मस्तिष्क और हृदय पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है. अति ठंडा अथवा अति
गर्म भोजन लेने पर दोनों ही स्थति में हमारा पेट प्रभावित होता है. आलस्य और
प्रमाद का असर हड्डियों और मांसपेशियों को भुगतना पड़ता है. लोभ और ईर्ष्या का
कुप्रभाव हमारी आँतों पर पड़ता है. न जाने कितने व्यर्थ के भय हम पाले रहते हैं,
जिसका असर रक्त वाहिनियों पर पड़ता है.
Friday, June 19, 2015
यह जगत इक आईना है
फरवरी २०१०
यह जगत एक
दर्पण है, इसमें वही झलकता है जो हमारे भीतर होता है, भीतर प्रेम हो, आनंद हो,
विश्वास हो तथा शांति हो तो चारों और वही बिखरी
मालूम होती है, अन्यथा जगत सूना-सूना लगता है. यहाँ किस पर भरोसा किया जाये ऐसे
भाव भीतर उठते हैं, भीतर की नदी सूखी हो तो बाहर भी शुष्कता ही दिखती है, लेकिन
भीतर का यह मौसम कब और कैसे बदल जाता है पता ही नहीं चलता. कर्मों का जोर होता है
अथवा तो हम सजग नहीं रह पाते. कोई न कोई विकार हमें घेरे रहता है तो हम भीतर के रब
से दूर हो जाते हैं, हो नहीं सकते पर ऐसा लगता है, यह लगना भी ठीक है क्योंकि भीतर
छिपे संस्कार ऐसे ही वक्त अपना सिर उठाते हैं, पता चलता है कि अहंकार अभी गया नहीं
था, कामना अभी भीतर सोयी थी, ईर्ष्या, द्वेष के बिच्छू डंक मारने को तैयार ही बैठे
थे. अपना-आप साफ दिखने लगता है.
Thursday, April 24, 2014
कबिरा मन निर्मल भयो
जनवरी २००६
आत्मा
रूपी कश्यप का संयोग जब अदिति से होता है तो सद्गुणों का जन्म होता है. अदिति अभेद
मति है, उससे आदित्यों की सृष्टि होती है. आदित्य प्रकाश रूप हैं, देव रूप हैं. जब
अभेद बुद्धि से आत्मा मिलती है तो प्रेम, विश्वास, करुणा, सत्य तथा विनय का जन्म
होता है. दिति भेद मति है, इससे दुर्गुण ही उत्पन्न होते हैं. स्वार्थ, लोभ,
अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या तथा मोह सब दिति की संतानें हैं. हमारी बुद्धि की निर्मलता
ही सुख-दुःख का कारण है. सद्गुण जब भीतर विकसित हों तब उसे कृपा मानना चाहिए और ईश्वर
ने बुद्धियोग प्रदान किया है ऐसा मानने से अहंकार मिटने लगता है. जब तक अभेद नहीं
होगा द्वंद्व बने ही रहेंगे तब तक जीवन से दुःख मिट नहीं सकते. अभेद ही अद्वैत है,
जहां एक ही सत्ता है. वही सत्ता विभिन्न रूप लेकर प्रकट हो रही है. सभी अपनी जगह
श्रेष्ठ हैं, हर कोई अपने आप में पूर्ण हैं, पर पूर्णता अभी दबी हुई है. किसी के भीतर
पूर्णता प्रकट हो जाये तो वह कभी अपूर्णता को देखेगी ही नहीं. इसीलिए सन्त इस जगत
को निर्दोष ही देखते हैं.
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