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Thursday, April 21, 2022

प्रेम गली अति सांकरी

 अहंकार स्वयं को बचाए रखने के लिए तर्क का आश्रय लेता है। प्रेम हर तर्क से ऊपर है, वह आत्मा का सहज गुण है। प्रेम को मरने का भय नहीं होता, वह शाश्वत है। जहाँ प्रेम है वहाँ अभय है। अहंकार आहत  होता है तो प्रतिशोध लेना चाहता है, प्रेम पिघल जाता है, वह दीनता का अनुभव करता है। प्रेम में भी विरह की पीड़ा है पर वह पीड़ा मन को शुद्ध करती है। अहंकार से उत्पन्न पीड़ा दुःख का कारण होती है। संत कहते हैं जब भी भीतर दुःख हो शरण में आ जाना चाहिए। अहंकार में व्यक्ति स्वयं प्रमुख होता है, प्रेम में सामने वाला मुख्य होता है, उसकी प्रसन्नता में ही प्रेमी अपनी ख़ुशी देखता है।   

Sunday, July 5, 2020

दुःख से जो भी मुक्ति चाहे


बुद्ध ने कहा है, जीवन में दुःख है. इस दुःख का कारण है. कारण का निवारण है. वह पथ है जिस पर चलकर एक दुखविहीन अवस्था का अनुभव किया जा सकता है. जीवन में जन्म, मरण, बुढ़ापा, मृत्यु, ये चार दुःख हरेक को भोगने पड़ते हैं. उदासी, क्रोध, ईर्ष्या, चिंता, भय, अवसाद सभी दुःख हैं. प्रियजनों से विछोह दुःख है, अप्रिय से मिलन दुःख है. इच्छा, आसक्ति, देह, मन, बुद्धि आदि से चिपकाव दुःख है. अज्ञान ही इन दुखों का कारण है. जीवन के मर्म को न समझकर हम इन दुखों से ग्रस्त होते हैं. इन दुखों से बचा जा सकता है. जीवन के सत्य को समझकर ही कोई दुःख से मुक्त हो सकता है. बुद्ध ने एक मार्ग भी दिया जिस पर चल कर एक ऐसी अवस्था भी आती है जहाँ कोई दुःख नहीं है. इस पथ का राही सजग होकर सदा वर्तमान में रहता है. सजगतापूर्वक जीने का मार्ग ही अष्टांगिक मार्ग है. सम्यक समझ, सम्यक विचार, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयत्न, सम्यक ध्यान, सम्यक एकाग्रता जिसके अंग हैं. 

Saturday, May 23, 2020

दुःख में जो जागना सीखे


जीवन कितने ही रूपों में हमारे सम्मुख आता है. कभी शांत तो कभी रौद्र, कभी सरल तो कभी कठिन. हम उसे किस रूप में ग्रहण करते हैं यह हम पर निर्भर है. जीवन में यदि सब कुछ ठीक चल रहा हो तो हम अपनी ऊर्जा को व्यर्थ ही इधर-उधर के कामों में लगा देते हैं. यदि कोई विपदा आती है तो हम सजग हो जाते हैं और अपना सारा समय और ऊर्जा उस दुःख से बाहर निकलने में लगाते हैं. उस समय जीवन में एक लक्ष्य होता है जीवन धारा एक ओर ही बहती है. आज पूरे विश्व के आगे एक समस्या है, सरकारें सजगतापूर्वक अपने-अपने देशवासियों के लिए नए-नए प्रोजेक्ट आरंभ कर रही हैं. लोग स्वास्थ्य के प्रति सजग हो रहे हैं. धन की दौड़ में जो अपने गांव छोड़कर चले गए थे वे घर लौट रहे हैं. परिवार का जो महत्व खोता जा रहा था, अब वापस स्थापित हो रहा है. दुःख की घड़ी में सब एक हो जाते हैं, शायद इसीलिए प्रकृति कभी-कभी क्रुद्ध होती है. मानव अपने पर्यावरण से जुड़े, लोग आपस में जुड़ें, सभी को अपने कर्त्तव्य पालन का बोध हो, इसका भान कराने के लिए ही महामारी जैसी विपदाएं समय-समय पर युगों से आती हैं. जो समर्थ हैं उन्हें सेवा का अवसर मिले और जो संकट ग्रस्त हैं उन्हें अपनी आंतरिक शक्तियों का भान हो. समाज आपस में जुड़े और अकर्मण्यता का जो दानव मानवता को ग्रस रहा था उसका नाश हो. जीवन में एक गहरा परिवर्तन हो, माता-पिता और बच्चों में संवाद हो, पीढ़ियों का अंतर घटे, भोजन में शुद्धता का ध्यान रखा जाये. स्वच्छता का मानदण्ड बढ़े, ये सारे छोटे-छोटे पर महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं जो आज किसी न किसी रूप में प्राप्त हो रहे हैं. 

Monday, May 11, 2020

समता में जो मन टिक जाये

अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय इन पांच कोशों के भीतर हमारा वास है. जब चेतना अन्नमय कोष से जुड़ी होती है उसे जरा-मरण का भय लगता है, प्राणमय कोष में रहकर भूख-प्यास का अनुभव होता है. मनोमय कोष के कारण हम शोक-मोह का अनुभव करते हैं, विज्ञानमय कोष ही हमारे सुख-दुःख के अनुभव का कारण है. आनंदमय कोष आत्मा का निकटस्थ है, इसमें ब्रह्म का आनन्द है किन्तु यह सदा उपलब्ध नहीं होता. जब साधक साधना के द्वारा अन्य चार कोशों के पार चला जाता है तब इसका अनुभव करता है. यहाँ असीमता का अनुभव होता है तथा विषाद और भय का लोप हो जाता है. ध्यान और समाधि के द्वारा इसमें टिकने का सामर्थ्य बढ़ता है, तब सुख-दुःख में समता प्राप्त होती है, जिसे कृष्ण योग में स्थित होना कहते हैं. मानव जीवन में ही इस समता को प्राप्त करना सम्भव है. 

Saturday, April 4, 2020

मन में जगे कामना शुभ की



परिस्थितियां कितनी भी दूभर हों, वे बाहर हैं. उनसे प्रभावित होकर सुख-दुखी होना भीतर है. बाहर की परिस्थिति पर हमारा वश नहीं चलता, मन की स्थिति कैसी हो इसका सारा उत्तरदायित्व हमारा है. मन यदि दुःख का निर्माण करेगा तो अपनी ही शक्ति का ह्रास होगा, उसका व्यवहार अपने ही विरुद्ध कहा जायेगा. मन यदि सुख का निर्माण करेगा तो समस्या का समाधान खोजने की शक्ति बनी रहेगी, समाधान न भी मिला तो भी वह अपना मित्र बना रहेगा. मन को इतना सबल बनाना हो तो बुद्धि को शुद्ध करना होगा, बुद्धि तभी निर्मल होगी जब वह अपने स्रोत से जुड़ी रहेगी. भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं, जो मन-बुद्धि से युक्त होकर मेरा स्मरण करता है वह सहज ही आनंद को उपलब्ध होता है. यदि मन में श्रद्धा हो तो उसका स्मरण सहज ही होता है और यह विश्वास बना रहता है कि एक न एक दिन यह आपदा भी गुजर जाएगी. उस दिन तक जो भी सहयोग हमसे बन पड़े करना है और एक क्षण के लिए भी स्वयं को बेबस नहीं मानना है. हर देशवासी की शुभेच्छा ही इस समय सबसे बड़ा उपाय है.

Wednesday, February 19, 2020

सुख की फसल उगाए जो



सृष्टि का बीज भीतर है, जिसका विस्तार बाहर है. बाहर जो कर्म हमने किये, उनके फल-रूप में सुख-दुःख मिले. हर सुख-दुःख के फल में छिपे थे बीज. हम अनजाने में विषैले बीज बोते रहते हैं. जब बाहर क्रोध, वैमनस्य और घृणा की फसल लहलहाती है, तब दुःख मनाते हैं. भीतर दुःख रूपी फल से निकले उदासी के बीज हैं, कुछ पीड़ा के भी. हर बार दुखी होने पर द्वेष या घृणा करने पर हम बोते रहे उन्हीं के बीज, और हर बार सुखी होने पर मुस्कानों के. तभी अकारण ही कभी-कभी मुस्कानें भी फूटती हैं भीतर से, किन्तु दो दुखों के मध्य एक छोटा सा सुख तृप्ति तो नहीं दे पाता. हम यदि सचेत होकर  सुख, शांति, करुणा और प्रेम  के बीज ही बोयें तो क्या जीवन में वही नहीं पनपेंगे। 

Saturday, January 25, 2020

पानी जैसा मन हो जिसका



जीवन में जब कुछ ऐसा घटे जिसका कारण समझ में न आये तो यह मानकर विश्राम कर लेना चाहिए कि समस्त कारणों का परम कारण परमात्मा है. यही वास्तविक ज्ञान है. जो विश्वासी है वही आत्मविश्वासी भी हो सकता है. आत्मनिष्ठा और ज्ञाननिष्ठा के बिना की गयी साधना काम नहीं आती. साधना का अर्थ है मन की तरलता. मन में किसी बात को ठहरने नहीं देना तथा वर्तमान में मुक्त हृदय से आगे बढ़ना. जब भी मन किसी घटना, वस्तु या व्यक्ति में राग-द्वेष करता है, वह अटक जाता है. मन यदि पानी की तरह बहता हुआ न रहे तो उसमें काई जम जाती है और उससे दुःख की गन्ध आने लगती है. हर मानसिक दुःख यही बताता है कि भीतर कुछ ठहर गया है. प्राणायाम के द्वारा, प्रकृति के साथ समय बिताकर, संगीत में या ध्यान में मन को लय होने देना इससे बाहर आने का निरापद उपाय है. जीवन में उल्लास का फूल खिलाना हो तो स्वयं को खोने की कला सीखनी ही होगी. खिलाड़ी खेल में खुद को भुला देता है, नर्तक नृत्य में और भक्त भक्ति में डूब जाता है. छोटा मन जब खो जाता है तभी परम आनंद प्रकट होता है.

Thursday, July 4, 2019

बीती ताहि बिसार दे



अतीत की बातों को हमारा लेकर दुखी होना वैसा ही है जैसे कोई वर्षों पूर्व आयी आँधी के द्वारा फैलायी गंदगी को आज बाल्टियाँ भर-भर कर धोये. पानी व्यर्थ जायेगा, श्रम भी व्यर्थ जायेगा और वह गंदगी जो अब है ही नहीं भला साफ कैसे हो सकती है. मन हर दिन नया हो रहा है, रोज जो भोजन हम ग्रहण करते हैं उसके सूक्ष्म संश से ही मन बनता है, जो श्वास हम आज ग्रहण कर रहे हैं वही हमें ऊर्जा से भर रही है, जो आज मिला है वह आज के लिए है, इस ऊर्जा को हम व्यर्थ ही पुरानी बातों को याद करने में लगते हैं फिर दुखी भी होते हैं. स्मृतियाँ सुखद हों तब भी उन्हें ज्यादा तूल देना ठीक नहीं, बल्कि आज को एक सुखद स्मृति बनाने के लिए ऊर्जा का सदुपयोग करना उचित है. सबसे प्रमुख बात है कि सारे अनुभव वर्तमान के क्षण में ही होते हैं, अतीत में जो भी सुखद हुआ, वह उस समय के लिए वर्तमान में ही घटा था, आज एक नये अनुभव के लिए स्वयं को खाली रखना है, वरना कोल्हू के बैल की तरह अतीत लौट-लौट कर हमारे सम्मुख वर्तमान की शक्ल में आता रहेगा, क्योंकि हम उसे भूलना ही नहीं चाह रहे हैं.

Sunday, April 14, 2019

दो के पार ही मिलता जीवन


जीवन विरोधाभासी है. यहाँ रात है तो दिन भी है, सुख के साथ दुःख भी है, इसी तरह प्रेम है तो घृणा भी है. पक्ष है तो विपक्ष भी है. हम सुख का वरण करना चाहते हैं, और दुःख से बचना चाहते हैं, लेकिन जीवन का यह नियम है कि एक के साथ दूसरा स्वतः ही मिलता है. यदि दुःख से बचना है तो सुख का भी त्याग करना होगा, घृणा से बचना है तो प्रेम का भी मोह छोड़ना होगा. जगत को साक्षी भाव से देखकर स्वयं को द्वन्द्वों से ऊपर उठाना ही साधना है. रात और दिन दोनों से ऊपर संध्या काल है, जिसका बहुत महत्व शास्त्रों में गाया गया है. सुख-दुःख दोनों से ऊपर आनंद है, जो आत्मा का स्वभाव है. प्रेम व घृणा दोनों से ऊपर करुणा है, जिसकी आज जगत को बहुत आवश्यकता है. इसी तरह हर द्वंद्व के पार जाकर ही समाधान मिल सकता है.

Thursday, March 28, 2019

न द्वेष्टि न कांक्षति



भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं जो न किसी से द्वेष करता है और न ही किसी की आकांक्षा करता है, वह मुक्त ही है. मन में यदि किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के प्रति द्वेष है तो मन शांत रह ही नहीं सकता, अशांत मन में सुख नहीं टिकता और सुख की राह पर चलकर ही तो आनंद के फूलों को पाया जा सकता है. परमात्मा प्रेम, शांति और आनंद ही तो है. यदि भीतर ये तीनों नहीं हैं तो उससे मुलाकात हो नहीं सकती, और यदि हम उससे ये तीनों मांगते हैं तो ऐसे हृदय में जहाँ द्वेष है, इन्हें रखेंगे कैसे. आग और पानी जैसे एक साथ नहीं रह सकते, वैसे ही शांति और दुःख एक साथ नहीं रहते. इसी प्रकार जिस हृदय में आकांक्षा बसती है, वहाँ भी बेचैनी है, फिर ईश्वर को पुकारने का धैर्य कहाँ बचता है. यदि उससे आकांक्षा पूर्ण करने की प्रार्थना की तो वह पूरी हो भी सकती है पर उससे मिलन नहीं होगा और कुछ समय बाद एक नई आकांक्षा जन्म ले लेगी. परमात्मा के निकट जाना हो तो मन को खाली करके जाना होगा, तभी वह स्वयं आकर उसमें रहेगा.

Thursday, March 14, 2019

सुख का स्रोत एक वही है



जब दुःख को दूर करने के लिए हम संसार की ओर देखते हैं, यह भूल ही जाते हैं कि यह दुःख आया कहाँ से है ? जिस संसार से किसी वक्त हमने सुख लिया था उसी का परिणाम तो यह दुःख मिला है, फिर इसके निवारण के लिए जो उपाय हम करने वाले हैं, वह क्या नये दुःख में नहीं ले जायेगा. साधक की दृष्टि जब इस सत्य को देख लेती है तब वह हर दुःख के निवारण के लिए भीतर देखता है, अथवा परमात्मा की ओर देखता है. स्वयं के स्वरूप में कोई दुःख नहीं है, परमात्मा सच्चिदानंद है, उसके स्मरण से जिस शांति का अनुभव होता है वह अनमोल है. बुद्धि में धैर्य हो तभी वह जड़ व चेतन दोनों के भेद को समझ सकती है, तथा चेतन में विश्राम पा सकती है. कृष्ण उसी को बुद्धियोग कहते हैं.

Tuesday, March 5, 2019

राग-द्वेष से मुक्त हुआ जो


अविद्या अथवा मोह हमें यथार्थ ज्ञान से वंचित रखता है. सुख का प्रलोभन हमें रागी बनाता है और दुःख का भय द्वेषी. यदि हमारे कर्म राग, द्वेष अथवा मोह से परिचालित होंगे तो कर्मों के बंधन से हमें कोई बचा नहीं सकता. इसके विपरीत यदि हम सहज भाव से अपने नियत तथा कर्त्तव्य कर्म आदि करते हैं तो उसका कोई कर्माशय नहीं बनता, जिसका फल हमें बाद में भोगना पड़े. राग और द्वेष ही वे दो असुर हैं जिनके साथ एक साधक को अपने भीतर युद्ध लड़ना होता है. यदि कोई भी प्रवृत्ति राग प्रेरित होगी तो उसका संस्कार और गहरा हो जायेगा और बाद में उससे मुक्त होने के लिए उतना ही अधिक प्रयास करना पड़ेगा. इसी प्रकार यदि दुःख से बचने के लिए हम उद्यम से द्वेष करते हैं तो प्रमाद का संस्कार गहरा होता जाता है. कृष्ण कहते हैं, राग और द्वेष मनुष्य के बहुत बड़े शत्रु है, जो प्रत्येक इंद्रिय के प्रत्येक विषय में स्थित रहते हैं, इनसे से ही काम-क्रोध की उत्पत्ति होती है, जो समस्त विकारों के मूल हैं। जिसके मन में कामना है, वह कभी सच्चे अर्थ में सुखी नहीं हो सकता। कामना की पूर्ति में एक बार सुख की लहर-सी आती है, पर कामना ऐसी अग्नि है, जो प्रत्येक अनुकूलता को आहूति बनाकर अपना महत्व बढ़ाती रहती है। जितनी कामना की पूर्ति होती है, उतनी यह अधिक बढ़ती है। कामना अभाव की स्थिति का अनुभव कराती है। जहां अभाव है, वहीं प्रतिकूलता है और प्रतिकूलता ही दुख है। कामना कभी पूर्ण होती ही नहीं, इसलिए मनुष्य कभी दुख से मुक्त हो ही नहीं सकता। इसलिए साधक को इन काम-क्रोध के मूल राग-द्वेष का त्याग करना है.


Wednesday, January 23, 2019

सुख की करे कामना जो भी


२४ जनवरी २०१९ 
एक संत कहते हैं और कितना सही कहते हैं कि अन्य की गलती से जो दुखी हो जाता है, उससे बड़ा बुद्धिहीन कोई नहीं है. यदि इस सूत्र को कोई हृदयंगम कर ले तो वह सदा के लिए सुखी रहना सीख जाता है. हम सुबह से शाम तक अन्यों के कारण ही तो दुखी होते हैं, यदि अपनी गलती पर दुखी हों तो कितनी शीघ्रता से खुद को बदल लें. जब तक हम संसार में व्यवहार कर रहे हैं, द्वैत रहेगा ही, अन्य व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति से हमें संबंध निभाना होगा. हमारे प्रतिकूल हो ऐसे व्यवहार का हमें सामना भी करना पड़ेगा. ऐसे में यदि हमें उनकी त्रुटि नजर आती है, और हम व्याकुल हो जाते हैं, तब तो इस जगत में प्रसन्न रहने के अवसर बहुत कम रह जायेंगे. साधक वही है जो एक बार यह निश्चय कर लेता है कि प्रसन्न रहना उसकी सबसे बड़ी साधना है, और यदि दुखी होना ही है तो कम से कम बात अपने हाथ में तो हो, हमारी ख़ुशी ही यदि हम पर निर्भर न हो तो गुनगुनाते हुए झरने और गाते हुए पंछी ही हमसे बेहतर हुए. साधक को दुःख केवल अपने समय, शक्ति और सामर्थ्य का समुचित प्रयोग न कर पाने का होता है. वह स्वयं अन्यों के दुःख का कारण बनना चाहता ही नहीं क्योंकि अज्ञानवश ही कोई ऐसा करता है. उसे तो ज्ञान की साधना करनी है.

Monday, September 3, 2018

एक हुआ जो सारे जग से


४ सितम्बर २०१८ 
हम आज जो भी हैं, इसका चुनाव हमने ही किया है. हम कल क्या हों, इसका चुनाव अब हमें करना है. पूर्वाग्रहों, मान्यताओं और आदतों के अनुसार ही जीवन चलता रहा तो भविष्य का अनुमान लगाना जरा भी कठिन नहीं, हम वही होंगे जो आज हैं. जीवन की चुनौतियों को स्वीकार करने का यदि मन बना लिया और स्वयं को उसमें बाधा न बनने दिया तो भविष्य बिलकुल नया होगा. जीवन बढ़ने और चलने का नाम है, यह वाक्य सुनने में कितना भला लगता है, कदम-कदम आगे बढ़ते जाने से एक दिन हम स्वयं को बिलकुल बदला हुआ पायेंगे. योग साधना का यही लक्ष्य है, सर्व दुखों से मुक्ति का नाम ही योग है. अस्तित्त्व के साथ एक्य ही योग है. योग के आठ अंगों में से एक को जो साध लेता है, वह मंजिल की ओर चल पड़ता है. पांच यमों और पांच नियमों में से एक-एक की भी साधना यदि कोई करता है तो अन्य भी सधने लगते हैं.

Thursday, August 23, 2018

सुख-दुःख मन की ही कलियाँ हैं


२३ अगस्त २०१८ 
कितनी बार हमने ये शब्द नहीं सुने हैं, ‘हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं’. भाग्य का अर्थ जीवन में केवल सुखद परिस्थितियाँ आना ही तो नहीं है. जो भी हमारे साथ घट रहा है, वह सब हमारे ही द्वारा रचा गया है. सुख को तो हम स्वयं की कृति मान सकते हैं, पर दुःख का कारण  स्वयं को नहीं मानते. यही बात है कि दुःख जीवन से कभी विदा ही नहीं लेता. अनजाने में हम स्वयं ही रोज-रोज इसकी नई-नई फसल बोते रहते हैं और हर बार इसका कारण किसी न किसी पर डाल देते हैं. जीवन में किसी ने कामयाबी हासिल की तो हम उसकी मेहनत और कठोर परिश्रम के कारण उसे बधाई देते हैं, इसी तरह जब कोई अपने जीवन में असफल हुआ, अस्वस्थ हुआ और दुखी हुआ, यदि उसी क्षण वह इसकी जिम्मेदारी भाग्य पर न डालकर स्वयं पर लेने की हिम्मत दिखाए, उसी क्षण से उसका भाग्य बदलने लगता है. हमारे मन का तनाव भी खुद का बनाया हुआ है और हमारे मन का उल्लास भी हमारी ही रचना है. जीवन हर क्षण एक सा है, हमारी दृष्टि जैसी होगी वह वैसा ही दिखाई देने वाला है. किसी के पास कुछ भी न हो पर उसका मन प्रसन्न रहने की कला जानता हो तो वह अभाव का अनुभव ही नहीं करेगा. किसी के पास सब कुछ हो और मन को खिलने की कला नहीं आती हो तो वह उस सुख को भी पीड़ा में बदल सकता है.

Monday, July 16, 2018

सुख सपना दुःख बुलबुला


१७ जुलाई २०१८
सुख की तलाश जब तक बाहर है, दुःख मिलने ही वाला है. सुख-दुःख दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक के साथ दूसरा मुफ्त में मिलता है. सुख जब अपने होने में ही मिलने लगता है, तब उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं होता, क्योंकि अपने होने में तो किसी को आज तक संदेह नहीं हुआ. हमारी तकलीफ यह है कि हम कभी भीतर जाकर अपने सही स्वरूप को खोजते नहीं. जगत के साथ हमारा जो संबंध है, उसी के नाते हम स्वयं को दी गयी उपाधियों से ही जानते हैं. कोई हमसे हमारी पहचान पूछे तो झट हमारा उत्तर होगा, अपना नाम, जबकि वह तो बदला जा सकता है, राष्ट्रीयता अथवा धर्म भी बदला जा सकता है, व्यवसाय भी बदल सकता है, रिश्ते भी जो आज हैं कल बदल  सकते हैं. स्वयं को हम जब तक शुद्ध रूप में पहचान नहीं लेते अपने होने का स्वाद हमें नहीं मिल सकता. तब तक सुख की तलाश बाहर ही जारी रहेगी और पीछे-पीछे दुःख भी मिलता रहेगा.

Sunday, May 20, 2018

सुख-दुःख के जो पार हो गया


२१ मई २०१८ 
संत कहते हैं, जीवन में शुभ और अशुभ दोनों हैं, रात और दिन की तरह सुख और दुःख की तरह विपरीत सदा साथ-साथ चलते हैं. सच्चा साधक वही है जो दोनों को देखता है, और दोनों से ही प्रभावित नहीं होता. उसे तो वहाँ पहुंचना है जहाँ दो नहीं हैं, अद्वैत ही उसकी मंजिल है. पोखर में जल भी है और कीचड़ भी, कमल दोनों से ऊपर है, अछूता ! यदि सुख की तृष्णा बनी रही तो दुःख की राह सामने ही खड़ी है. यदि अच्छा ही अच्छा चाहा तो बुरा कोई न कोई रूप धरकर डराएगा ही. जीवन जैसा भी दिखाए साक्षी भाव से देखने की कला ही अध्यात्म है. देह जब तक है जरा और मृत्यु का भय बना ही है, प्राण जब तक हैं, भूख-प्यास लगते ही रहेंगे. मन जब तक है, शोक-मोह से छुटकारा नहीं. स्वयं आत्मा में स्थित होकर इन तीनों को देखना है, जहाँ एकरस शांति के अलावा कुछ भी नहीं. देह, प्राण, मन तभी तो हैं जब आत्मा स्वयं है, वही उनका आधार है. जिसने इस रहस्य को समझ लिया वह सदा के लिए मुक्त है.  

Friday, December 15, 2017

मुक्त रहे मन भूत-भावी से

१६ दिसम्बर २०१७ 
असजग व्यक्ति ही स्वयं के लिए और अंततः समष्टि के लिए दुःख का कारण बनता है. सृष्टि का हर कण स्वयं में आनंदित है. दुःख की अपने आप में कोई सत्ता नहीं है, यह सुख पर पड़ा आवरण मात्र है. कल्पना और स्मृति ही इसके दो आश्रय हैं. मानव मन के द्वारा दुःख का सृजन होता है. जीवन अपने आप में इतना अनमोल है पर जैसे नेत्र में पड़ा धूल का नन्हा सा कण दृष्टि को बाधित कर देता है और विशाल गगन भी दिखाई नहीं देता, वैसे ही मन में उठा कोई संस्कार जीवन की दिव्यता और भव्यता को भुला देता है. जैसे एक बीज अनंत बीजों का कारण है उसी प्रकार एक संस्कार अपने जैसे अनेक संस्कारों को जन्म देता है. जीवन तब एक पहेली बन जाता है.  

Monday, November 6, 2017

विश्राम में छुपा है राम

६ नवम्बर २०१७ 
सुख-दुःख, इच्छा-प्रयत्न और राग-द्वेष से युक्त मन सदा ही चलायमान रहता है. जगत से राग के कारण सुख की इच्छा इसे प्रयत्न में लगाती है. द्वेष के कारण यह दुःख का अनुभव करता है. ध्यान करते समय अल्प काल के लिए ही सही जब मन सब इच्छाओं से मुक्त होकर स्वयं में स्थित हो जाता है, तब सुख-दुःख के पार चला जाता है. उस स्थिति में न राग है न द्वेष, एक निर्विकार दशा का अनुभव अपने भीतर कर यह शांति का अनुभव करता है. देह को सबल बनाने के लिए जैसे व्यायाम आवश्यक है, मन को सबल बनाने के लिए विश्राम आवश्यक है. ऐसा विश्राम ध्यान से ही प्राप्त होता है, जो उसे सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है.   


Friday, October 13, 2017

मन को अपना मीत बनाएं

१३ अक्तूबर २०१७ 
संतजन कहते हैं, हमारे सारे दुःख स्वयं के ही बनाये हुए हैं. हमारा मन विरोधी इच्छाओं का जन्मदाता है. मन स्वयं ही स्वयं के विपरीत मार्ग पर चलता है और स्वयं ही स्वयं को दोषी ठहराता है. कितना अच्छा हो कि बुद्धि में विवेक जागृत हो और मानव सदा अपने हित में ही निर्णय ले. वह श्रेय के मार्ग का पथिक हो. प्रेय के मार्ग पर चलकर स्वयं अपनी ही हानि करते हुए हम न जाने कितनी बार वही-वही भूलें करते हैं, जो हमें स्वधर्म से दूर ले जाती हैं. अपने समय, शक्ति और सामर्थ्य का सदुपयोग करते हुए हम मन को शुद्ध बना सकते हैं. निर्मल मन में ही आत्मा की झलक मिलती है. आत्मज्ञान होने के बाद ही व्यक्ति का वास्तविक जीवन आरम्भ होता है.