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Tuesday, May 5, 2020

चाह मिटी चिंता गयी

बुद्ध कहते हैं, तृष्णा दुष्पूर है, अर्थात मन में उठी इच्छा को तृप्त करना असम्भव है. एक इच्छा यदि पूर्ण हो गयी तो तत्क्षण दूसरी सिर उठा लेती है. यह इच्छा किसी भी तरह की हो. धन, यश, संतान, सुख, सुविधा प्राप्ति की अथवा भ्रमण करने, ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा कभी भी तृप्त नहीं की जा सकती. जैसे अग्नि का स्वभाव जलाना है, अतृप्त रहना इच्छा का स्वभाव है. मानव इस सत्य को भूल जाता है और इस असंभव कार्य को पूरा करने में अपना सारा जीवन लगा देता है. हमारे भीतर जानने की शक्ति, क्रिया शक्ति तथा इच्छा करने की शक्ति तीनों हैं, हम शेष दो शक्तियों को इस तीसरी के लिए ही लगा देते हैं. जानने की शक्ति से हम सृष्टि का सत्य भी जान सकते हैं, जिसे कृष्ण ज्ञान योग कहते हैं और क्रिया शक्ति को कर्मयोग में बदल सकते हैं. 

Sunday, May 20, 2018

सुख-दुःख के जो पार हो गया


२१ मई २०१८ 
संत कहते हैं, जीवन में शुभ और अशुभ दोनों हैं, रात और दिन की तरह सुख और दुःख की तरह विपरीत सदा साथ-साथ चलते हैं. सच्चा साधक वही है जो दोनों को देखता है, और दोनों से ही प्रभावित नहीं होता. उसे तो वहाँ पहुंचना है जहाँ दो नहीं हैं, अद्वैत ही उसकी मंजिल है. पोखर में जल भी है और कीचड़ भी, कमल दोनों से ऊपर है, अछूता ! यदि सुख की तृष्णा बनी रही तो दुःख की राह सामने ही खड़ी है. यदि अच्छा ही अच्छा चाहा तो बुरा कोई न कोई रूप धरकर डराएगा ही. जीवन जैसा भी दिखाए साक्षी भाव से देखने की कला ही अध्यात्म है. देह जब तक है जरा और मृत्यु का भय बना ही है, प्राण जब तक हैं, भूख-प्यास लगते ही रहेंगे. मन जब तक है, शोक-मोह से छुटकारा नहीं. स्वयं आत्मा में स्थित होकर इन तीनों को देखना है, जहाँ एकरस शांति के अलावा कुछ भी नहीं. देह, प्राण, मन तभी तो हैं जब आत्मा स्वयं है, वही उनका आधार है. जिसने इस रहस्य को समझ लिया वह सदा के लिए मुक्त है.  

Tuesday, November 14, 2017

मन टिक जाये जब खुद में ही

१५ नवम्बर २०१७ 
बुद्ध ने कहा है, तृष्णा दुष्पूर्ण है. एक तृष्णा को पूर्ण करो तो दूसरी सिर उठा लेती है. मन तृष्णा का ही दूसरा नाम है. मन के पार गये बिना इनसे मुक्ति नहीं मिल सकती. जैसे ही मन में कोई कामना जगे, साधक को तत्क्षण उसकी पूर्ति में न लगकर उसे अच्छी तरह देखना चाहिए. साक्षी भाव में टिकना पहला कदम है. इसके बाद उसके फलस्वरूप क्या होगा, इसका चिन्तन भी करना चाहिए. पूर्व में कितनी बार इसी तरह कामनाओं को पूर्ण किया है पर मन अभी भी संतुष्ट नहीं हुआ है, इसका भी विवेक भीतर जगाना होगा. इतनी देर में मन अथवा देह में कुछ बेचैनी का अनुभव भी हो सकता है, पर कुछ ही क्षणों में वह भी लुप्त हो जाती है. मन थिर हो जाता है और स्वयं का अनुभव होता है. जहाँ पूर्ण शांति है. इस तरह के ध्यान के अभ्यास से कुछ ही दिनों में अनावश्यक पृथक हो जायेगा और आवश्यक की पूर्ति सहज ही होती रहेगी.


Monday, March 12, 2012

बरसे कृपा का बादल ऐसे


जनवरी २००३ 
हम जब भी किसी की आलोचना करते हैं उसके अवगुण हम ग्रहण कर लेते हैं और हमारे सदगुण हमें छोड़ जाते हैं उतना स्थान भी तो चाहिए. साधक को मान-अपमान की चिंता यदि बनी है तो अहंकार अभी गया नहीं. तृष्णा यदि बनी हुई है तो अंतर्शुद्धि अभी हुई नहीं है. ईश्वर के नाम का स्मरण, उससे सम्बन्ध जोड़ने से आत्मिक खजाना बढ़ता है और विकार हमें छोड़ते हैं. हमारी भावना यदि पवित्र होगी तो छोटे से छोटा कार्य भी पावन बन जायेगा. उसकी कृपा प्राप्त करने में एक क्षण भी नहीं लगता यदि भीतर उसके लिये स्थान हो...वह तो हर पल हमें आपने शुद्द रूप से मिलाने का प्रयत्न करता है पर हम ही छोटे-छोटे सुखों के पीछे भागते रहते हैं. जब मन में कोई दौड़ बाकी न रहे, विचारों का अनवरत चलता हुआ प्रवाह रुक जाये अथवा तो साक्षी भाव टिके. मकड़ी की तरह हम अपने बनाये जाल में फंसे नहीं, कमल की भांति ऊपर रहें, निर्लिप्त, निस्सीम, शांत और ज्ञान में स्थित, तभी उसकी कृपा मिलती है.

Monday, January 9, 2012

चेतना जगानी है


सितम्बर २००२ 
हम चेतन हैं, पर जड़ की ओर हमारा झुकाव है. जब हम अपनी चेतना को परम चेतना के साथ जोड़ते हैं तो सारे कर्म योगमय हो जाते हैं, अन्यथा कर्म बंधन में डालते हैं. कृष्ण कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को न कुछ पाने की तृष्णा सताती है न कुछ खोने का भय, न उससे किसी को भय होता है न उसे ही किसी से भय रहता है. तब तो सारी सृष्टि हमें मित्रवत ही प्रतीत होगी. जहाँ कहीं भी शुभ है वहीं दृष्टि जायेगी, दोषों पर यदि दृष्टि जाये भी तो कटुता का भाव उदय न होगा.. संसार को उसके दोषों व गुणों सहित हम अपना लेने में समर्थ होंगे.