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Tuesday, January 3, 2023

मुक्ति की जो करे कामना

सुख यानि शुभ आकाश, अपने आसपास का वातावरण जब सकारात्मक तरंगे लिए हुए हो, उसमें कोई विकार न हो। किंतु जहाँ शुभ है, वहाँ अशुभ भी हो सकता है, चाहे उस समय प्रकट नहीं हो रहा। जहाँ सकरात्मकता है, वहीं नकारात्मकता भी छिपी है। इसलिए सुख की कामना का त्याग ही मुक्ति है। इस वर्ष हमारा मूलमंत्र सुख के स्थान पर मुक्ति होना चाहिए। मुक्ति का अर्थ है, पूर्ण स्वतंत्रता, दो के द्वन्द्व  से पूरी आज़ादी ! अब न सुख की तलाश है न शुभ-अशुभ का भय ! मुक्ति का अर्थ है मन के पूर्वाग्रहों, धारणाओं, कल्पनाओं, आशंकाओं से मुक्ति ! एक ऐसे स्थान में रहने की कला जहाँ पूर्ण रिक्तता है। जहाँ इस जगत का स्रोत है। जहाँ से आवश्यक ज्ञान सभी जीवों को प्राप्त होता है, क्योंकि वह ज्ञान का भी स्रोत है। आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी पाँच तत्व भी वहीं से उपजे हैं। मुक्ति की कामना हमारे शास्त्रों का मूल मंत्र है। मोक्ष की अवधारणा केवल भारत में ऋषियों द्वारा की गयी है, यह परम कामना है। इसका अर्थ है छोटे संकीर्ण मन की दासता से मुक्ति और विशाल मन के साथ एक होने की कला या विज्ञान; यह व्यक्ति को पूर्ण बनाती है।   


Thursday, November 12, 2020

दीप जले दीवाली के

 धनतेरस से आरम्भ होकर  भाईदूज पर समाप्त होने वाला ज्योतिपर्व दीपावली आशा और उमंग का उत्सव है. इसका हर पक्ष जीवन को एक नया अर्थ प्रदान करता है. धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की महत्ता को बताने वाला यह पर्व हमें प्रकाश के रूप में बिखर कर स्वयं का और अन्यों का पथ प्रज्ज्वलित करने का संदेश देता है. ज्ञान के देवता गणपति और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की आराधना कर हम जीवन को अर्थवान और कामनाओं की पूर्ति के लिए सक्षम बनाते हैं. घर-बाहर की स्वच्छता और रंगोली, दीपदान, बन्दनवार आदि से शुभता का प्रसरण धर्म की वृद्धि में सहायक है. जिस प्रकार बाहर के दीपक का प्रकाश वातावरण को पवित्र करता है, अंतर्ज्योति का प्रकाश हमारे अज्ञान को हरता है. आत्मज्योति के दर्शन करने की प्रेरणा मोक्ष की ओर ले जाती है. मिष्ठानों व पकवानों को न केवल अपने परिवार के लिए बनाना बल्कि उनका वितरण समाज में मधुरता को बढ़ाता है. धनतेरस के दिन व्यापारियों की चाँदी है तो छोटी दीवाली के दिन हलवाइयों की, दीपावली के दिन मूर्तिकारों और दिए बनाने वाले कुम्हारों के श्रम का प्रतिदान मिलता है तो उसके अगले दिन किसानों के लिए लाभकारी है जब घर-घर में अन्नकूट का भोज बनता है. भाईदूज पर बहन-भाई के स्नेह का प्रतीक टीका केसर उत्पादकों के लिए फायदेमंद है. नए वस्त्र, नए बर्तन और भी न जाने कितनी खरीदारी दीपावली को सभी के लिए शुभ और लाभ देती है. आप सभी को असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक इस उत्सव पर हार्दिक शुभकामनायें ! 


Tuesday, November 3, 2020

उस अज्ञेय से प्रेम करे जो

 

जीवन बहुआयामी है। यहाँ हर किसी को अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का सुअवसर है। ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। एक छोटे से कण का पूरा ज्ञान भी आजतक कोई नहीं जान पाया। अंतरिक्ष की कौन कहे अभी भी धरती पर ऐसे कई स्थान हैं जहाँ मानव नहीं पहुंचा है। कुछ ऐसा है जो हमने जान लिया है, कुछ ऐसा है जो आज नहीं कल हम जान लेंगे पर कुछ ऐसा तब भी बच जाएगा जिसे हम कभी भी जान नहीं पाएंगे। वह अज्ञेय ही सारे रहस्यों का कारण है और उस आनंद का स्रोत भी वही  है जिसके कारण हर सुबह पंछी चहचहाते हैं, खरगोश दौड़ते-भागते हैं, फूल खिलते हैं, बच्चे मुसकुराते हैं और जिन्हें देखकर माँ के हृदय में वात्सल्य भरे प्रेम का अनुभव होता है। जहाँ से सारा शुभ जन्मता है और यदि अशुभ न हो तो शुभ का महत्व ही क्या रह जाएगा, अशुभ भी वहीं से उपजता है, जैसे माँ की फटकार में भी प्रेम छुपा है; पर वह दोनों से परे स्वयं में स्थित है। सारी ऊर्जा का स्रोत भी वही है।

Monday, February 25, 2019

सकल पदारथ हैं जग माहीं


२६ फरवरी २०१९ 
संत कवि तुलसीदास ने कहा है, ‘सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्महीन नर पावत नाहीं’. इसका एक अर्थ यह भी है कि एक कर्मशील व्यक्ति को, जो भी वह चाहे मिल सकता है. हम सभी ने कभी जो चाहा था वह आज हमें मिला है, यदि हम अपनी वर्तमान स्थति से प्रसन्न नहीं है तो इसका अर्थ हुआ हमने ही कुछ ऐसा चाहा था जो उपयुक्त नहीं था. हमें क्या चाहना है यदि इसकी समझ ही नहीं होगी तो भविष्य में भी हम अपनी प्राप्ति से संतुष्ट नहीं हो सकते. हर मनुष्य के भीतर तीन शक्तियाँ प्रतिपल काम करती हैं, जानने की शक्ति, इच्छा करने की शक्ति और कर्म करने की शक्ति. हमारा बुद्धि पक्ष अर्थात जानने की क्षमता यदि सही नहीं है, तो हम गलत इच्छा का चुनाव कर लेते हैं और फिर उसी दिशा में हमारे कर्म भी होने लगते हैं. जानकारी और सूचना को ही हम यदि ज्ञान समझते हैं तो यह भी भूल है. ज्ञान का अर्थ है सही-गलत का विवेक, सत्य-असत्य का विवेक और शाश्वत–नश्वर का विवेक. हमारी दृष्टि यदि शुभ, सत्य और शाश्वत का वरण करती है तो जीवन में आनंद के फूल सहज ही खिलेंगे.

Wednesday, September 26, 2018

शुभ कर्मों से सजा हो जीवन


२७ सितम्बर २०१८ 
भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं, कर्म पर हमारा अधिकार है, फल पर नहीं. इसका एक अर्थ यह भी है कि हमें सदा कर्मशील रहना है. शास्त्रों में नियत कर्म, नियमित कर्म, निमित्त कर्म आदि की चर्चा की गयी है. नियत कर्म के अनुसार प्रत्येक मानव का पहला कर्त्तव्य है स्वयं के तन की समुचित देखभाल. उसकी शुद्धि, उचित आहार व व्यायाम के द्वारा उसे स्वस्थ रखना. दूसरा है आजीविका के लिए कर्म करना, जो बच्चे अथवा वृद्ध हैं और जो गृहणियाँ हैं, क्रमशः उनका कर्त्तव्य है शिक्षा प्राप्त करना, समाज को सही मार्गदर्शन देना और घर चलाना. नियमित कर्म के अनुसार सभी का कर्त्तव्य है परमेश्वर के प्रति धन्यवाद और कृतज्ञता का ज्ञापन करना. इसमें प्रार्थना, ध्यान, जप, योग, साधना व्रत, उपवास, उत्सव आदि सभी उपाय समयानुसार समाहित हो जाते हैं. इन्हें त्रिकाल संध्या के रूप में हमारे शास्त्रों में नियमित करने का विधान है. हम देह रूप से परमात्मा से पृथक हैं पर आत्मा रूप से उससे अभिन्न हैं, इस भाव का अनुभव किये बिना प्रार्थना पूर्ण नहीं होती. निमित्त कर्मों में जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक के संस्कार तथा श्राद्ध आदि आ जाते हैं. यदि हमारा जीवन इन शुभ कर्मों से भरा रहे तो व्यर्थ के कर्म अपना आप ही विदा ले लेंगे और दुखरूप फल से हम मुक्त हो जायेंगे. धर्म के द्वारा अर्थ और कामनाओं की सिद्धि में ही मोक्ष का अनुभव छिपा है.

Thursday, September 20, 2018

भक्ति करे कोई सूरमा


 २२ सितम्बर २०१८ 
भारत का सर्वपूज्य ग्रन्थ भगवद् गीता कृष्ण और अर्जुन के संवाद पर आधारित है, जो युदद्ध क्षेत्र में घटा था. इसके पीछे एक रहस्य है. वास्तव में एक साधक का जीवन योद्धा की भांति होता है. एक योद्धा अनुशासित, वीर, निर्भय और स्वालम्बी होता है, युद्ध करते समय उसे तत्काल निर्णय लेने होते हैं. उसे प्रतिपल सजग रहना होता है, वह अपने शत्रुओं को पहचानता है और उसे अपनी क्षमता का भी भान होता है. युद्ध क्षेत्र में उसकी छोटी सी असावधानी भारी पड़ सकती है. एक साधक को भी जीवन के कर्मक्षेत्र में सजग रहकर आलस्य, प्रमाद, पंच विकार अदि शत्रुओं से युद्ध लड़ना होता है. जो वस्तुएं उसके मार्ग में बाधक हैं, उनका प्रबल विरोध करके ही वह अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है. हम सभी किसी न किसी रूप में ईश्वर की भक्ति, आराधना, योग, ध्यान आदि करते हैं, किन्तु अंतिम लक्ष्य हमसे दूर ही बना रहता है. इसका सबसे बड़ा कारण है हम अपने शत्रुओं को अपना निजी संबंधी मानकर उन्हें नष्ट करने से मना कर देते हैं. जैसे अर्जुन अपने गुरुजनों, पितामह आदि को मारना नहीं चाहता था, जबकि वह भली-भांति जानता था कि वे उसके शत्रुओं से मिले हुए हैं. जब तक हम शुभ को पूर्ण स्वीकार कर अशुभ को अपने जीवन से पूर्ण तिलांजलि नहीं दे देते, हमारा जीवन पूर्ववत् ही बना रहता है, चाहे हम कितने ही जप-तप कर लें.

Sunday, May 20, 2018

सुख-दुःख के जो पार हो गया


२१ मई २०१८ 
संत कहते हैं, जीवन में शुभ और अशुभ दोनों हैं, रात और दिन की तरह सुख और दुःख की तरह विपरीत सदा साथ-साथ चलते हैं. सच्चा साधक वही है जो दोनों को देखता है, और दोनों से ही प्रभावित नहीं होता. उसे तो वहाँ पहुंचना है जहाँ दो नहीं हैं, अद्वैत ही उसकी मंजिल है. पोखर में जल भी है और कीचड़ भी, कमल दोनों से ऊपर है, अछूता ! यदि सुख की तृष्णा बनी रही तो दुःख की राह सामने ही खड़ी है. यदि अच्छा ही अच्छा चाहा तो बुरा कोई न कोई रूप धरकर डराएगा ही. जीवन जैसा भी दिखाए साक्षी भाव से देखने की कला ही अध्यात्म है. देह जब तक है जरा और मृत्यु का भय बना ही है, प्राण जब तक हैं, भूख-प्यास लगते ही रहेंगे. मन जब तक है, शोक-मोह से छुटकारा नहीं. स्वयं आत्मा में स्थित होकर इन तीनों को देखना है, जहाँ एकरस शांति के अलावा कुछ भी नहीं. देह, प्राण, मन तभी तो हैं जब आत्मा स्वयं है, वही उनका आधार है. जिसने इस रहस्य को समझ लिया वह सदा के लिए मुक्त है.  

Tuesday, May 5, 2015

होना ही जब शुभ हो जाये

जनवरी २००९ 
भगवान बुद्ध कहते हैं वह कार्य करने के लायक नहीं जिसे करके पीछे पछताना पड़े. हमारा कृत्य हमारे होने के विपरीत भी हो सकता है. हमारे होने का ढंग शुभ हो न कि हमारे कर्म शुभ हों. हम जो भीतर हैं उससे डरते हैं इसलिए बाहर विपरीत करते हैं. भीतर पतझड़ हो तो हम बाहर उधार वसंत की अफवाह फैला देते हैं. अपने कृत्यों से हम हमारे होने पर पर्दा डालते हैं. अगर दुर्जन शुभ कर्म भी करे तो उसका परिणाम अच्छा नहीं हो सकता ! सज्जन अगर शुभ करता है तो उसके भीतर आनंद का अनुभव होता है. उससे यदि अशुभ भी हो जाये तो वह उसके भीतर की समरसता को दिखाने के लिए ही है न कि कुछ छिपाने के लिए.

Monday, February 2, 2015

आँख जगे तो प्रीत लगे

जनवरी २००८ 
हमारे जीवन का हर पल भय और शंका से रहित हो, तृप्ति भरा हो, आनंदमय हो, इसके लिए जरूरी है कि हम धर्म का आश्रय लें. ज्ञान पाकर ही ऐसा सम्भव है. ज्ञान की प्राप्ति कैसे हो, इसका जवाब हरेक को खुद ही खोजना होगा, सत्य का आचरण हो तो ज्ञान अपने आप प्रकट होने लगता है. ज्ञान का अंत भक्ति में होता है. भक्ति का प्राकट्य जीवन में हो जाये तो जगत से कुछ प्रयोजन कहाँ रह जाता है. भक्ति का आरम्भ होता है शुभ के प्रति लगाव से, सबके प्रति मंगल की कामना से,, सत्य की राह पर चलने की भीतरी आकांक्षा से. जब हम स्वयं की नजरों में ऊपर उठते हैं तभी भीतर वाला परमात्मा हमें स्नेह करता सा लगता है. उसकी कृपा तो अनवरत बरस ही रही है. परमात्मा के प्रति श्रद्धा भाव उसके प्रति हमारी आँखें खोल देता है.

Tuesday, July 10, 2012

पल पल जागा रहता साधक


मई २००३ 
साधक का लक्ष्य है पल-पल सचेत रहना, क्योंकि सचेत मन स्वयं को स्पष्ट देखता है, हमें हमारी बड़ी कमियां भी जब छोटी सी भूल मालूम होती हैं तो मन सोया हुआ है. वह पीड़ा जो कठोर वाणी के बाद स्वयं को ही दंश देती है परमेश्वर की कृपा ही है, यह असंतोष की भावना जो साधक को कचोटती है परम सत्य को पाने के लिए तत्पर होने का संदेश ही देती है. साधना का पथ कभी-कभी सांप-सीढी के खेल की तरह प्रतीत होता है, मंजिल तक पहुंचने का आनंद मिलने ही वाला होता है कि हम गहरे गड्ढ में धकेल दिए जाते हैं. किसी संत से सुना कि जब शुभकर्मों का उदय होता है तो ईश्वर का अनुग्रह होता है और उसकी निकटता मिलती है जब अशुभ कर्मों का उदय होता है तो उसकी कृपा होती है अर्थात उसका वियोग होता है. जैसे रात और दिन का क्रम चलता है वैसे ही साधना में जब तक पूर्व जन्मों के बंधन नहीं कटते सुख-दुःख लगे ही रहेंगे. पर नए कर्मों के बंधन न बनें, नयी गांठ न पड़े इसके लिये तो सजग रहना होगा. पूरी तरह शरणागत हो जाएँ तो पुराने कर्मों के बंधन भी धीरे-धीरे कटने लगते हैं.


Wednesday, December 7, 2011

सत्य और शुभ

जुलाई २००२ 
ईश्वर हमारा अंतरंग है. उसकी उपासना करने के लिये विधि-विधान की नहीं भाव भरे हृदय की आवश्यकता है. सहज रूप से जब अंतर में उसके प्रति प्रेम की हिलोर उठे तो उसी क्षण पूजा हो गयी, फिर धीरे-धीरे यह प्रेम उसकी सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के प्रति उत्पन्न होने लगता है. शुद्ध प्रेम के कारण ही परमात्मा भक्त के कुशल-क्षेम का वहन करते हैं. मन विश्रांति का अनुभव करता है, हमारा सामर्थ्य बढ़ता है. सत्य और शुभ के प्रति सहज प्रेम ही ईश्वर की राह में उठाया पहला कदम है. 

Friday, November 4, 2011

अनन्तता


जून २००२ 

ईश्वर हर क्षण हमारे साथ है. वह कितने विभिन्न उपायों से अपनी उपस्थिति जता रहा है. प्रेरणादायक वचन सुनने को मिलते हैं, सारी बातें जैसे किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हमारे जीवन में सही समय पर आने लगती हैं. वस्तुएं अपने वास्तविक रूप में प्रकट होना चाहती हैं. आवरण हटता जा रहा है. हमें पूर्ण सहयोग देना है. शुभ संकल्प करके मन को स्थिर रखना है. सत्य को धारण करने के लिये मन को खाली रखना है. कामनाएं कम हों और धीरे-धीरे समाप्त होती चली जाएँ, क्योंकि इनमें सार नहीं है. जो सुख इनसे हमें मिलता है वह क्षणिक होता है. किन्तु आध्यात्मिक सुख अनंत है. वह हमारे निकट से भी निकटतर है, केवल मिथ्या अहंकार का आवरण हमारे और उसके बीच है. हमने अपनी जो छवि अपनी दृष्टि में बना ली है वह असत् है. देह, मन, बुद्धि व अहंकार से परे हम शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मा हैं जिसमें हमें स्थित होना है.