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Sunday, October 16, 2022

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:


संत कहते हैं, इस जगत के और हमारे भी केंद्र में जो होना चाहिए, वह ईश्वर है. असल में वह जगह तो भगवान की है; किंतु आज उसकी जगह को अहंकार ने घेरा हुआ है.  मुल्कों के अहंकार ने, शासकों के अहंकार ने। अहंकर केवल सेवक है, पर मानव भूल गया है कि वह ईश्वर  की सत्ता के कारण अपना काम कर रहा है. मानव इस मूलभूत तथ्य को भूल गया है और मनमानी करता है; तब उसे लगता है कि जगत सुंदर नहीं है, जगत में कितने अत्याचार हो रहे हैं. जबकि मानव ने स्वयं प्रकृति को स्वयं कितना नुक़सान पहुँचाया है. कुछ लोग यह सोच कर कि इस कष्ट का अंत कभी नहीं होगा;  जीवन से  भाग जाते हैं,  आत्महत्या तक कर लेते हैं। वे जगत को सुंदर बनाने का कोई प्रयत्न नहीं करते. जो सत्य के पथ पर चलेगा उसका कल्याण होगा, उसे ही सौंदर्य की अनुभूति होगी। सत्यं शिवं सुंदरं के इस छोटे से सूत्र में यह संदेश चिरकाल  से  मानव को दिया गया है। विध्वंस तब होता है जब मानव कुछ और करना नहीं चाहता तब भगवान  के पास कोई विकल्प नहीं रहता. युद्ध कोई समाधान नहीं है, यह मानव की अंतिम मंज़िल नहीं हो सकती, इसके बाद शांति और मेल-मिलाप की सारी यात्रा पुनः करनी होगी। हमें अहिंसा को पुनः परम धर्म के रूप में स्थापित करना है। लक्ष्य यदि सम्मुख हो तो हमें राह मिलने लगती है। धरती को मानव ने दूषित किया है अब उसे ही सुधारना है। आज भारत के ज्ञान के प्रभाव से विश्व में परिवर्तन हो रहा है, अब ईश्वर के बताये मार्ग पर अनेक लोग चलने को उत्सुक हैं. वह दिन दूर नहीं जब भारत की बात सुनी जाएगी और सतयुग का सब जगह दर्शन होगा। 


Monday, March 21, 2022

आख़िर कब यह युद्ध थमेगा

रूस और यूक्रेन के मध्य हो रहे युद्ध का आज सत्ताईसवां दिन है। विनाश की इस लीला को सारा विश्व देख रहा है पर कोई भी कुछ कर नहीं पा रहा है। इसे रोकना तो दूर समझौते की बात भी कहीं चल नहीं रही है। इससे बड़ी मानवीय त्रासदी भला क्या होगी ? दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सरकारों को यह समझ में आया था कि युद्ध कितने भयावह हो सकते हैं, इतने वर्षों तक सभी देशों ने संयम से काम लिया किंतु आज कुछ देशों की विस्तारवाद,साम्राज्यवाद और प्रभुत्व वाद की नीतियों के कारण भय, आशंका और संदेह  के बादल सब ओर घिर गए हैं। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ भी मूक दर्शक की तरह देख रही हैं। एक ही धरती के बाशिंदे होकर दो देश इस तरह लड़ रहे हैं जैसे जन्मों के दुश्मन हों। यूक्रेन के शहरों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया है।एक करोड़ से अधिक लोग अपने घरों से विस्थापित हो गये हैं। आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अधर में है, जब वे आज के हालातों के बारे में जानेंगे, क्या उनके भीतर प्रतिशोध की भावना का जन्म नहीं होगा? प्रेम की जगह हिंसा की भावना से ही उनका पोषण हो रहा है। यूक्रेन के राष्ट्रपति को राजनीति और राजधर्म की समझ होती तो अपनी निर्दोष जनता को इस तरह नरक में ना धकेलते। इंटरनेट नहीं दिया जा रहा यह कहकर मानवाधिकारों की बात करने वाले लोग आज चुप बैठे हैं जबकि लाखों लोगों के मानवाधिकारों का हनन हो रहा है।युद्ध धरती के किसी भी भाग में हो उसकी आँच से कोई भी नहीं बचा रह सकता। हम अंधे, बहरे हो जाएँ शतुर्मुर्ग की तरह आँखें मूँद ले या रेत में मुँह छिपा लें तब ही इसकी भीषणता से मुख मोड़ सकते हैं। फिर यही कहकर मन को समझा लेते हैं कि जब से दुनिया बनी है, युद्ध होते रहे हैं, यह कोई अनहोनी तो नहीं हो रही, अर्थात मानव ने न सीखने की क़सम खा ली है। हर दिन जो इतने हथियारों का निर्माण होता है उनके उपयोग के लिए भी तो कोई स्थान और समय चाहिए, कभी न कभी उनका इस्तेमाल होगा यही सोच कर हथियार बनाए जाते हैं। इक्कीसवीं सदी में इतनी बर्बरता को देखकर मानवीय मूल्यों की सब बातें कितनी खोखली लगती हैं। 

Wednesday, July 22, 2020

सार-सार को गहि रहे

कोरोना का कहर जारी है. पूरा विश्व इस कठिन दौर से गुजर रहा है. साथ ही कहीं बाढ़, कहीं भूकम्प तो कहीं बादल फटने या बिजली गिरने जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी मानव की परीक्षा ले रही हैं. इसी आपदकाल में कहीं युद्ध के अभ्यास भी चल रहे हैं, आतंकवाद भी जारी है और राजनीतिज्ञ भी अपनी चालों से बाज नहीं आ रहे हैं. यानि ऊपर-ऊपर से लगता है, दुनिया जैसी चल रही है उसमें किसी का भला होता नहीं दीख रहा. किन्तु सिक्के का दूसरा पहलू भी है, लोग एक दूसरे के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो रहे हैं, परिवार जो वर्षों से अलग अलग थे एक छत के नीचे रह रहे हैं. घर से काम करने से ट्रैफिक की समस्या घट गयी है, सड़क दुर्घटनाएं बन्द हो गयी हैं. प्रदूषण बहुत कम हो गया है.  वातावरण शुद्ध हो रहा है. बच्चों पर पढ़ाई का दबाव नहीं है, वे बुरी संगत से बच रहे हैं. बाहर खाना खाने  की प्रथा बढ़ती जा रही थी, उसकी बजाय लोग घर पर पारंपरिक भोजन बना रहे हैं. योग साधना का समय मिल रहा है. जीवन के प्रति सजगता बढ़ रही है. प्रकृति को शायद विश्राम चाहिए था इसलिए वह फल-फूल रही है. नदियां साफ हो गयी हैं. हवा शुद्ध हो गयी है. क्यों न हम सकारात्मकता का दामन पकड़ें और इस समय को गुजर जाने दें. 

Monday, February 3, 2020

समझबूझ कर चलना होगा



युद्ध के प्रति जहाँ मन में उन्माद जगाया जाता हो. हिंसा के प्रति आकर्षण को वीरता का प्रतीक मान लिया जाता हो, अहंकार का झूठा प्रदर्शन किया जाता हो. ये सभी एक दिशाहीन समाज की निशानियाँ हैं. जहाँ नेतृत्व खोखला है, कोई आदर्श भी सम्मुख नहीं है, अजीब सी रिवायतें और दकियानूसी विचारधारा को प्रश्रय दिया जाता हो, वह समाज दया का पात्र है. भारत की हजारों साल पुरानी संस्कृति और अनमोल साहित्य का अकूत भंडार होते हुए भी जब सत्य और अहिंसा को भुलाकर नफरत की आग को हवा दी जाती हो तो उसे विडंबना ही कहा जा सकता है. हजार दरिया भी मिलकर नफरत की आग को बुझा नहीं सकते, जब समझ का पानी सूख जाता है तो वहां कोई चमत्कार ही अमन की बारिश कर सकता है. जब मंशा सँवारने की होती है तो लोग व्यर्थ पड़े पत्थरों और ठीकरों से भी बगीचे बना लेते हैं लेकिन जहाँ इरादा ही अलगाव का हो तो अमृत भी विष बन जाता है. जब रिश्तों की बुनियाद ही खोखली होती है तो तथाकथित मित्रों को शत्रु बनते देर नहीं लगती. आज आवश्यकता है  आपसी सौहार्द को जगाने के लिए सार्थक संवाद हो, विश्वास कायम करने के लिए भावनाओं की जगह समझदारी को प्राथमिकता दी जाये.  

Friday, August 2, 2019

प्रेम और शांति



'युद्ध और शांति' इन शब्दों से हम सभी परिचित हैं, कोई राष्ट्र अथवा उसकी सेना के लिए काल को दो खंडों में परिभाषित किया जाता है, एक युद्ध काल तथा दूसरा शांति काल, दोनों एक साथ नहीं होते. एक के बाद एक आते हैं. किंतु हम यहाँ बात कर रहे हैं प्रेम और शांति की जो साथ-साथ होते हैं. प्रेम होता है तो वातावरण शांत हो जाता है अथवा जब शांति होती है तो प्रेम भीतर से फूटने लगता है. रात्रि की नीरवता में ओस की बूंदों के रूप में प्रेम ही बरसता है, तथा जब बादल बरस कर जल के रूप में प्रेम बरसा रहे हों तो बाद में वातावरण कितना शांत व शुभ्र प्रतीत होता है. धरा की गहराई में पूर्ण नीरवता में बीज प्रेम में ही मिटता है और नये अंकुर का जन्म होता है. परिवार के सदस्यों के मध्य यदि प्रेम सहज रूप से विद्यमान रहे तो घर में शांति रहती है. यदि प्रेम की उस धारा में कोई रुकावट आ जाये तो घर की शांति भंग हो जाती है. प्रेम और शांति हमारा मूल स्वभाव है, हमारा निर्माण इनसे ही हुआ है. हम मानवों ने तन तो ऊपर से ओढा हुआ है. मन व बुद्धि जहाँ से उपजे हैं, वह स्रोत प्रेम ही है और वहाँ गहन शांति है.

Wednesday, February 27, 2019

देश के लिए जिए देश के लिए मरे


२७ फरवरी २०१९ 
अन्याय का सामना करना और उसका प्रतिकार करना एक सैनिक का धर्म है. हमारे देश की सेना अपने शौर्य और पराक्रम के लिए सारे विश्व में जानी जाती है. यह सेना संयुक्त राष्ट्र संघ की शांति सेनाओं का अनेक बार अंग रही है और देश में अनेक आपदाओं से नागरिकों की रक्षा करने में इसने अपना योगदान दिया है. आज भारत के इतिहास में एक यादगार दिवस है जब भारतीय वायु सेना ने बड़ी बहादुरी से पड़ोसी देश में स्थित आतंक के ठिकानों को नष्ट किया है. देश आज एक राहत की साँस ले रहा है और यह बात उसे भरोसा देती है कि भविष्य में होने वाली आतंकवादी घटनाओं के स्रोत को ही नष्ट कर दिया गया है. आजादी के बाद से ही कश्मीर को हथियाने के लिए पड़ोसी देश ने कितने युद्ध किये लेकिन एक में भी सफल नहीं हुआ, तब उसने छद्म युद्ध का सहारा लिया और आतंकवादियों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने लगा. आज भी सारे विश्व में अलग-थलग हुआ वह देश आतंकवादियों के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाने से इंकार कर रहा है, इसका अर्थ है कि कहने को वे आतंकवादी हैं वास्तव में वे उसकी सेना का एक भाग ही हैं.   

Thursday, February 14, 2019

जो लौट के फिर न आये


१५ फरवरी २०१९ 
पुलवामा में हुए आतंकी हमले से पूरा राष्ट्र व्यथित है. देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों को बलिदान करने वाले इन बहादुर सनिकों को हर कोई सारे भेदभाव भुलाकर हृदय से श्रद्धांजलि दे रहा है. क्रूरता की इस घटना ने सबके हृदयों को झकझोर कर रख दिया है. ऐसे में यह विचार कि उन परिवारों पर क्या बीत रही होगी जिनके प्रिय जन वैमनस्य की इस आग में झुलस गये, भीतर पीड़ा को गहरा कर जाता है. कल की रात उनके लिए कितनी भारी पड़ी होगी, और न जाने कितनी आने वाली रातों को उन्हें जागना पड़ेगा. हर भारतवासी इस दुःख की घड़ी में शहीदों के परिवारों के साथ है. अब समय आ गया है कि इस छद्म युद्ध को आमने-सामने लड़ा जाये, इस अपरोक्ष युद्ध की बजाय मामला आर-पार की लड़ाई से हल किया जाये. भारत ने कभी युद्ध के लिए पहले कदम नहीं उठाया, किन्तु जब दुश्मन को दूसरी भाषा नहीं आती हो तो उसे उसकी ही भाषा में जवाब देना होगा.

Thursday, September 20, 2018

भक्ति करे कोई सूरमा


 २२ सितम्बर २०१८ 
भारत का सर्वपूज्य ग्रन्थ भगवद् गीता कृष्ण और अर्जुन के संवाद पर आधारित है, जो युदद्ध क्षेत्र में घटा था. इसके पीछे एक रहस्य है. वास्तव में एक साधक का जीवन योद्धा की भांति होता है. एक योद्धा अनुशासित, वीर, निर्भय और स्वालम्बी होता है, युद्ध करते समय उसे तत्काल निर्णय लेने होते हैं. उसे प्रतिपल सजग रहना होता है, वह अपने शत्रुओं को पहचानता है और उसे अपनी क्षमता का भी भान होता है. युद्ध क्षेत्र में उसकी छोटी सी असावधानी भारी पड़ सकती है. एक साधक को भी जीवन के कर्मक्षेत्र में सजग रहकर आलस्य, प्रमाद, पंच विकार अदि शत्रुओं से युद्ध लड़ना होता है. जो वस्तुएं उसके मार्ग में बाधक हैं, उनका प्रबल विरोध करके ही वह अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है. हम सभी किसी न किसी रूप में ईश्वर की भक्ति, आराधना, योग, ध्यान आदि करते हैं, किन्तु अंतिम लक्ष्य हमसे दूर ही बना रहता है. इसका सबसे बड़ा कारण है हम अपने शत्रुओं को अपना निजी संबंधी मानकर उन्हें नष्ट करने से मना कर देते हैं. जैसे अर्जुन अपने गुरुजनों, पितामह आदि को मारना नहीं चाहता था, जबकि वह भली-भांति जानता था कि वे उसके शत्रुओं से मिले हुए हैं. जब तक हम शुभ को पूर्ण स्वीकार कर अशुभ को अपने जीवन से पूर्ण तिलांजलि नहीं दे देते, हमारा जीवन पूर्ववत् ही बना रहता है, चाहे हम कितने ही जप-तप कर लें.