युद्ध के प्रति जहाँ मन में उन्माद जगाया जाता हो. हिंसा के प्रति आकर्षण को वीरता का प्रतीक मान लिया जाता हो, अहंकार का झूठा प्रदर्शन किया जाता हो. ये सभी एक दिशाहीन समाज की निशानियाँ हैं. जहाँ नेतृत्व खोखला है, कोई आदर्श भी सम्मुख नहीं है, अजीब सी रिवायतें और दकियानूसी विचारधारा को प्रश्रय दिया जाता हो, वह समाज दया का पात्र है. भारत की हजारों साल पुरानी संस्कृति और अनमोल साहित्य का अकूत भंडार होते हुए भी जब सत्य और अहिंसा को भुलाकर नफरत की आग को हवा दी जाती हो तो उसे विडंबना ही कहा जा सकता है. हजार दरिया भी मिलकर नफरत की आग को बुझा नहीं सकते, जब समझ का पानी सूख जाता है तो वहां कोई चमत्कार ही अमन की बारिश कर सकता है. जब मंशा सँवारने की होती है तो लोग व्यर्थ पड़े पत्थरों और ठीकरों से भी बगीचे बना लेते हैं लेकिन जहाँ इरादा ही अलगाव का हो तो अमृत भी विष बन जाता है. जब रिश्तों की बुनियाद ही खोखली होती है तो तथाकथित मित्रों को शत्रु बनते देर नहीं लगती. आज आवश्यकता है आपसी सौहार्द को जगाने के लिए सार्थक संवाद हो, विश्वास कायम करने के लिए भावनाओं की जगह समझदारी को प्राथमिकता दी जाये.
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Monday, February 3, 2020
Saturday, September 15, 2018
ढाई आखर प्रेम का
१५ सितम्बर २०१८
जगत का आधार है
प्रेम, अपने शुद्ध रूप में प्रेम ही परमात्मा है. जीव जगत में प्रेम के कितने ही
अनुपम रूप देखने को मिलते हैं. चकोर का चाँद के प्रति प्रेम, चातक का स्वाति
नक्षत्र में गिरने वाली वर्षा की बूंद के प्रति प्रेम, पतंगे का दीपक के प्रति
प्रेम और सूर्यमुखी का सूर्य के प्रति प्रेम का बखान करते हुए गीत कवियों ने गाये
हैं. जैसे परमात्मा अनंत है वैसे ही प्रेम की गहराई को कोई माप नहीं सकता. हर
आत्मा में वह प्रेम छुपा है जो वह कितना ही लुटाये समाप्त नहीं होने वाला, फिर भी
हम अपने आसपास हिंसा और शोषण होते हुए देखते हैं. अपने भीतर के हीरे को जिसने
तराशा नहीं वह उसे कोयला समझ कर व्यर्थ ही जलता और जलाता है. प्रेम की यह अनमोल
संपदा जिसके पास है वह अकिंचन होते हुए भी तृप्त रहता है.
Friday, August 25, 2017
अँधा अंधे ठेलिए दोनों कूप पडंत
२६ अगस्त २०१७
अंधश्रद्धा मानव को किस कदर
विवेकहीन बना देती है इसका उदाहरण हरियाणा और पंजाब में हो रहे घटनाक्रम को देख कर
मिल रहा है. राष्ट्र की सम्पत्ति को हानि पहुँचाने वाले इतना सा सच भी नहीं देख पा
रहे हैं कि अंततः वे अपनी ही सम्पत्ति को नष्ट कर रहे हैं. जो साधना उनमें इतना सा
भी विवेक जागृत नहीं कर सकी, उसका न होना ही अच्छा है. गुरू का काम है शिष्यों के
जीवन से अज्ञान का अन्धकार दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाये, किंतु आज तथाकथित
गुरू लोगों की श्रद्धा का लाभ उठाकर अपने स्वार्थ के लिए उनका उपयोग करते हैं.
आश्चर्य होता है जब पढ़े-लिखे लोग भी उनकी चाल में फंस जाते हैं. आज भारत के लिए
कितना दुखद दिन है जब हिंसा और आगजनी की घटनाएँ एक अपराधी को बचाने के लिए हो रही
हैं. सभी जागरूक लोगों को ऐसे अंधभक्तों से भारत को बचाना होगा.
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Wednesday, August 21, 2013
अभय हुये जो बनें अहिंसक
जनवरी २०१३
भय और हिंसा समानार्थी शब्द हैं, अभय और अहिंसा का एक ही अर्थ
है. यदि हमें रोग, बुढ़ापे तथा मृत्यु का भय है तो हम हिंसक हैं, किसी भी प्रकार का
तनाव हिंसा ही है, यदि हम मन को समत्व भाव स्थित नहीं रख पाते, अनुकूल परिस्थिति
में प्रसन्न तथा प्रतिकूल परिस्थिति में दुखी हो जाते हैं तो भी हम हिंसा में
विश्वास रखते हैं. अहिंसा का पालन करने वाला कभी भयभीत नहीं होता. पूर्णता में
जीना और पूर्णता में मरना उसके लिए सहज होता है.
Wednesday, January 23, 2013
त्रितापों से मुक्त करेगा
फरवरी २००४
दुखों का कारण हिंसा है, संसार जो तीनों तापों से पीड़ित है, वह हिंसा के कारण ही,
हम मानसिक, वाचिक और कायिक तीनों प्रकार की हिंसा के शिकार होते हैं तथा दूसरों को
करते हैं. परिवार में दुःख का कारण वाचिक हिंसा है पर इसका आरम्भ तो मन से ही होता
है तथा अंत भी मानसिक संताप में होता है. विरोध, द्वंद्व, आग्रह तथा अपेक्षा सभी
सूक्ष्म हिंसा का रूप हैं. शरणागत होकर हम इनसे मुक्त हो सकते हैं. हमारा मन एक
क्षण के लिए भी विक्षुब्ध होता है या झुंझलाता है तो हम हिंसा कर ही रहे होते हैं.
हमरा मूल स्वरूप प्रेममय है, आनंद हमारा वस्त्र है और शांति हमारा आश्रय. फिर दुःख
से हमारा परिचय कौन कराता है, दुःख जो बाहर से हमें खोजता है, भीतर तो दुःख कहीं
नहीं है. मन जो बाहर से आया है, अधैर्य सिखाता है, असहिष्णु बनाता है, हमें स्वयं
से दूर करता है, स्वयं को अच्छा मानने के कारण अन्यों को बुरा मानता है. अपने
दोषों को नजरंदाज करके अन्यों के दोषों को बढ़-चढ़ा कर देखता है. अपने ही बनाये
सपनों के महल का राजा बन बैठता है. ज्ञान हमें इसकी दासता से बचने का उपाय बताता
है. ज्ञान से ही हिंसामुक्त समाज की रचना हो सकती है, इसकी शुरुआत स्वयं से ही
करनी होगी.
Wednesday, January 16, 2013
प्रेम से प्रकट होए मैं जाना...
जनवरी २००४
हमारी जीवन शैली हिंसात्मक है या अहिंसात्मक इसका पता हमें दो-तीन बातों से लग जाता
है, हम स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं या परतंत्रता का, सापेक्षता का अथवा
निरपेक्षता का, अशांति का अथवा शांति का. हमारा मन यदि क्षोभ से भर जाता है तो हम
हिंसा के शिकार हैं, हम विरोध करते हैं, द्वंद्व का शिकार होते हैं तो भी हिंसा
अपना कार्य कर रही है, हम असंवेदनशील हो रहे हैं, क्षमा नहीं कर पाते तो हिंसा ही है. यही वह सूक्ष्म पर्दा है
जो हम परमात्मा से अलग करता है. हम उसके प्रति प्रेम तो अनुभव करते हैं पर स्थिर
नहीं रख पाते क्योंकि अब तक मन विरोध के भाव में आ चुका है. प्रेम में कोई विरोध
नहीं होता, प्रेम सभी कुछ स्वीकारता है, अच्छा-बुरा सभी कुछ, विष-अमृत सभी कुछ !
Wednesday, June 27, 2012
महाजीवन की ओर
अप्रैल २००३
सदगुरु कहते हैं कि युग परिवर्तन चाहते हो तो स्वयं को बदलो, हिंसा का युग है, सही
है, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. पर न हम हिंसा को रोकने में समर्थ हैं न भ्रष्टाचार को,
सामर्थ्य है तो इतनी ही कि हमारे मन में हिंसा न हो, मनसा, वाचा, कर्मणा ऐसा कुछ
भी न हो जो किसी को दुःख दे, न तो हम खुद भ्रष्टाचार को प्रश्रय दें न अपने आचरण
में कोई ढील दें. एक-एक व्यक्ति स्वयं को दीप बनाता चले तो उजाला होने में देर
नहीं हो सकती. हमें खुद को बदलना है, यह जगत ऐसा क्यों है इसकी परवाह किये बिना.
कृष्ण को अपना आदर्श बनाना है जो सारे संकटों के मध्य भी विचलित नहीं होते. वह
हमें आवाहन देते हैं कि स्वयं को जानकर सन्तोष, पूर्णता, रस, आनंद व प्रेम का
अनुभव करें. इंसान की सारी दौड़ इसीलिये तो है कि इतना कुछ पा ले कि भीतर शांति
महसूस करे, उसे सुख मिले. तो इस दौड़ का अंत तभी हो जाता है जब हमें खुद में
विश्रांति पाने की कला आ जाती है. हम अपने घर लौटना सीख जाते हैं. जीने की इच्छा के कारण हमें तन मिला, फिर
कर्मों के बंधन के कारण विभिन्न जन्म मिले. स्वयं में स्थित होने पर पुराने कर्मों
के बीज नष्ट हो जाते हैं, और तब महाजीवन का आरम्भ होता है.
Tuesday, May 24, 2011
वाणी
मार्च २०००
मन यूँ तो शांत रहना चाहता है किन्तु उसे उद्वगिन बनाने के लिये पल भर की असजगता पर्याप्त है. वाणी का दोष सचेत न रहने पर ही घटता है, बिना किसी कारण के अभ्यास वश हुआ असत्य भाषण मन को दूषित कर जाता है, चाहे कितना ही छोटा या निर्दोष झूठ भी हो, हमारे मन की बेहोशी की खबर देता है. टीवी पर जागरण में सुधांशु जी महाराज बता रहे हैं कि “सबसे भयंकर हिंसा वाणी की हिंसा है. अपनी जिह्वा रूपी गाय को खूंटे से बांध कर रखना चाहिए क्योंकि यह दूसरों के हरे-भरे, मान रूपी बगीचे को तहस-नहस कर सकती है”. भाषा रुखी भी नहीं होनी चाहिए, नहीं तो मौन व्रत ही भला, इससे कितनी परेशानियों से हम बच सकते हैं.
मानव मन शरीर के सुख-दुःख से ऊपर उठना ही नहीं चाहता, इसीलिए मन से परे बुद्धि, बुद्धि से परे आत्मा को जानने की बात हमारे पूर्वजों ने की.
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