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Saturday, September 15, 2018

ढाई आखर प्रेम का


१५ सितम्बर २०१८ 
जगत का आधार है प्रेम, अपने शुद्ध रूप में प्रेम ही परमात्मा है. जीव जगत में प्रेम के कितने ही अनुपम रूप देखने को मिलते हैं. चकोर का चाँद के प्रति प्रेम, चातक का स्वाति नक्षत्र में गिरने वाली वर्षा की बूंद के प्रति प्रेम, पतंगे का दीपक के प्रति प्रेम और सूर्यमुखी का सूर्य के प्रति प्रेम का बखान करते हुए गीत कवियों ने गाये हैं. जैसे परमात्मा अनंत है वैसे ही प्रेम की गहराई को कोई माप नहीं सकता. हर आत्मा में वह प्रेम छुपा है जो वह कितना ही लुटाये समाप्त नहीं होने वाला, फिर भी हम अपने आसपास हिंसा और शोषण होते हुए देखते हैं. अपने भीतर के हीरे को जिसने तराशा नहीं वह उसे कोयला समझ कर व्यर्थ ही जलता और जलाता है. प्रेम की यह अनमोल संपदा जिसके पास है वह अकिंचन होते हुए भी तृप्त रहता है.

Friday, August 17, 2012

सदगुरु ज्ञान है


जुलाई २००३ 
जैसे चन्द्रमा की ओर चकोर देखता है एक निष्ठ होकर, उसी तरह साधक ज्ञान की ओर चित्त को लगाता है. ज्ञान सारे धोखे हर लेता है, संसार की पोल खुल जाती है. भक्त वही है जो विभक्त न हो, हम केवल परमात्मा से ही विभक्त नहीं हो सकते, संसार से कितना भी जुड़ें अलग होना ही पड़ेगा. संसार हर पल बदल रहा है. सदगुरु का ज्ञान हमारे भीतर बादल बन कर बरसता है, सभी कुछ स्वच्छ करते हुए अंतरात्मा को भिगोता है, भीतर रस उत्पन्न होता है. अब संसार सत्य प्रतीत नहीं होता है, परमात्मा निकट आ गया है ऐसा प्रतीत होता है. मन रूपी पक्षी तभी पूर्ण शांति का अनुभव कर सकता है जब वह गुरु ज्ञान रूपी दानों को चुगे. परमात्मा रूपी खजाना जब भीतर है तो क्यों मन भिक्षु बन संसार से सुख माँगे, क्यों न उस खजाने को लुटाए.