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Friday, March 29, 2019

पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते,


अल्प से हमें सुख नहीं मिलता, हमें अधिक की चाह है, किन्तु अधिक मिलने पर और अधिक की चाह खत्म नहीं होती. इसलिए संत कहते हैं हम अल्प से संतुष्ट होना सीख जाएँ तो अधिकतम से मिलने वाले आनंद को महसूस कर सकते हैं. जीवन का गणित भौतिक गणित से उल्टा है. यहाँ सब कुछ छोड़कर हम सब कुछ पा सकते हैं. संसार में बहुत कुछ पाकर भी कुछ नहीं पाया, ऐसा भी अनुभव कर सकते हैं. मानव के लिए जीवन में सबसे बड़ी संपदा है मन का उत्साह, उत्साहित व्यक्ति अपना रास्ता खोज ही लेता है और जगत को उससे क्या लाभ मिल सकता है, इसके विषय में चिन्तन करता है. जिसके जीवन में जड़ता है, वह स्वयं का लाभ भी नहीं कर पाता, वह लोभी हो जाता है. लोभ ही हिंसा को जन्म देता और अंततः दुःख में ले जाता है. अंतर में सेवा का भाव ही व्यक्ति को उदार बनता है और एक दिन अनंत प्रेम का फल उसके जीवन में लगता है. ऐसा साधक अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञ होकर उसके साथ एकत्व का अनुभव भी कर सकता है.


Saturday, September 15, 2018

ढाई आखर प्रेम का


१५ सितम्बर २०१८ 
जगत का आधार है प्रेम, अपने शुद्ध रूप में प्रेम ही परमात्मा है. जीव जगत में प्रेम के कितने ही अनुपम रूप देखने को मिलते हैं. चकोर का चाँद के प्रति प्रेम, चातक का स्वाति नक्षत्र में गिरने वाली वर्षा की बूंद के प्रति प्रेम, पतंगे का दीपक के प्रति प्रेम और सूर्यमुखी का सूर्य के प्रति प्रेम का बखान करते हुए गीत कवियों ने गाये हैं. जैसे परमात्मा अनंत है वैसे ही प्रेम की गहराई को कोई माप नहीं सकता. हर आत्मा में वह प्रेम छुपा है जो वह कितना ही लुटाये समाप्त नहीं होने वाला, फिर भी हम अपने आसपास हिंसा और शोषण होते हुए देखते हैं. अपने भीतर के हीरे को जिसने तराशा नहीं वह उसे कोयला समझ कर व्यर्थ ही जलता और जलाता है. प्रेम की यह अनमोल संपदा जिसके पास है वह अकिंचन होते हुए भी तृप्त रहता है.

Friday, August 1, 2014

चलो घर चलें

जनवरी २००७ 
कृष्ण हमारा सखा है और वह हमसे कहता है जैसे मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ वैसे ही तुम मुझसे करो और मेरे नाते जगत से करो. जैसे मैं आनंद हूँ, वैसे ही तुम्हें भी जीना चाहिए. हमें अपना परिक्षण नहीं करना है बल्कि वीक्षण करना है, जीवन जीना कोई गम्भीर कार्य नहीं है, ईश्वर को पाना भी कोई गम्भीर कार्य नहीं है. हमें उस क्षण की प्रतीक्षा नहीं करनी है जब हमें पूर्ण आनंद मिलेगा बल्कि इसी क्षण उसे पाना है. ईश्वर की समीक्षा करनी है, वह जो सदा हमारे साथ है. हम उसके उत्तराधिकारी हैं, उसका सब कुछ हमारा है, हम विशाल संपदा के अधिकारी हैं, यह सारा ब्रह्मांड हमारा घर है. न जाने कितने जन्मों से हम घर से बाहर थे, अपने विरसे को हमने खो दिया था पर घर लौट कर आने पर वह हमारा ऐसे स्वागत करता है जैसे हम उसके प्रियतम हों.