Showing posts with label संतुष्टि. Show all posts
Showing posts with label संतुष्टि. Show all posts

Friday, March 29, 2019

पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते,


अल्प से हमें सुख नहीं मिलता, हमें अधिक की चाह है, किन्तु अधिक मिलने पर और अधिक की चाह खत्म नहीं होती. इसलिए संत कहते हैं हम अल्प से संतुष्ट होना सीख जाएँ तो अधिकतम से मिलने वाले आनंद को महसूस कर सकते हैं. जीवन का गणित भौतिक गणित से उल्टा है. यहाँ सब कुछ छोड़कर हम सब कुछ पा सकते हैं. संसार में बहुत कुछ पाकर भी कुछ नहीं पाया, ऐसा भी अनुभव कर सकते हैं. मानव के लिए जीवन में सबसे बड़ी संपदा है मन का उत्साह, उत्साहित व्यक्ति अपना रास्ता खोज ही लेता है और जगत को उससे क्या लाभ मिल सकता है, इसके विषय में चिन्तन करता है. जिसके जीवन में जड़ता है, वह स्वयं का लाभ भी नहीं कर पाता, वह लोभी हो जाता है. लोभ ही हिंसा को जन्म देता और अंततः दुःख में ले जाता है. अंतर में सेवा का भाव ही व्यक्ति को उदार बनता है और एक दिन अनंत प्रेम का फल उसके जीवन में लगता है. ऐसा साधक अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञ होकर उसके साथ एकत्व का अनुभव भी कर सकता है.


Wednesday, January 4, 2017

एक तलाश परम पद की

४ जनवरी २०१७ 
 हम सब सफल होना चाहते हैं. सबसे आगे भी रहना चाहते हैं. मानव  स्वभाव में ही यह गुंथा हुआ है कि वह थोड़े से संतुष्ट नहीं होता. सब कुछ पाकर भी उसे ऐसा लगता है कि कुछ अधूरा सा है. ऐसे में क्या जरूरी नहीं है कि हम थोड़ी देर थमकर गहराई से इसका कारण सोचें. जब हमसे काफी आगे वाला भी संतुष्ट नहीं है तो  वहाँ पहुच कर क्या हम संतुष्ट हो जायेंगे. इसका उत्तर भीतर से ही मिलेगा. संत कहते हैं हमारी तलाश तब तक जारी रहेगी जब तक हम उस पद को नहीं पा लेते जहाँ पूर्ण संतुष्टि है. वह पद अनंत है जिस पर हर कोई हर वक्त बैठ सकता है, उस की अभीप्सा हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. किन्तु हम उस मार्ग को नहीं जानते जिससे वहाँ जाया जा सकता है. ध्यान ही वह मार्ग है, इस मार्ग पर चलने वाला यात्री किसी से आगे जाना नहीं चाहता वह अपनी यात्रा भीतर ही भीतर करता है और उस तक पहुँच जाता है. 

Tuesday, November 15, 2016

जब आवे संतोष धन

१५ नवम्बर २०१६ 
भक्ति, युक्ति, शक्ति और मुक्ति, ये चारों जीवन में हों तो जीवन सफल होता है. वास्तव में देखा जाये तो भक्ति और मुक्ति आत्मा का मूल स्वभाव है, शक्ति उसका गुण और यदि ये तीनों हों तो युक्ति खोजने कहीं जाना नहीं पड़ता. चेतना में सहज ही ज्ञान है. ध्यान में न जानने की इच्छा हो न कुछ पाने की तो जो संतुष्टि सहज ही प्राप्त होती है, उसी से भक्ति का पोषण होता है.