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Tuesday, September 20, 2022

लक्ष्य साध ले जो जीवन का

जीवन में किसी भी कर्म को करने का निर्णय लेने से पहले हमें यह ध्यान रखना होगा कि क्या इस कर्म का परिणाम हमें केवल अल्पकालीन आनंद देगा । यदि थोड़े से सुख के लिए हम भविष्य के लिए दुःख का इंतज़ाम कर रहे हैं तो ऐसा कर्म किसी भी तरह करणीय नहीं है। यदि किसी कर्म से हमें थोड़ा कष्ट भी उठाना पड़े किंतु उसका परिणाम बाद में अच्छा हो तो वह कर्म अवश्य करना चाहिए। सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए जीवन को स्वीकार भाव से जीना हमें सफलता के मार्ग पर ले जाता है।एक बार जब हम किसी भी लक्ष्य को तय कर लें अथवा किसी कार्य के प्रति प्रतिबद्ध हों तो उसे प्राप्त किए बिना छोड़ना नहीं चाहिए। जीवन का मार्ग अपने उत्तरदायित्वों पर आधारित हो न कि भावनाओं पर, जो सदा बदलती रहती हैं। उत्तरदायित्व के प्रति निष्ठा से आत्मिक शक्ति प्रकट होती है। भावनाओं से मुक्ति मन को स्वतंत्रता का आभास कराती है। जीवन अनिश्चितताओं से भरा है। यहाँ सदा उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इनके मध्य भी जो सदा आनंदित व  उत्साहित रहना सीख ले वही सफल कहा जाता है। 


Friday, March 9, 2018

..तेरे नाल सरोवर पानी


१० मार्च २०१८ 
बचपन से एक भिखारी की हम कहानी सुनते आ रहे हैं, जिसके मरने पर उस जगह को स्वच्छ किया गया जहाँ वह बैठा करता था. थोड़ी से खुदाई के बाद ही वहाँ एक खजाना मिला. जीवन भर वह व्यक्ति औरों से माँगता रहा, उसे ज्ञात ही नहीं था कि उसके नीचे इतना खजाना है कि वह कितनों को बाँट सकता है. हमारा मन भी ऐसा ही मंगता बना रहता है और आत्मा रूपी खजाने से वंचित रहता है. मन सदा किसी न किसी तलाश में व्यस्त रहता है, उसे सुख, यश, सम्मान, प्रेम, वैभव, शांति सब चाहिए, जिसके लिए वह अनथक प्रयत्न करता है. नाम के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं, यहाँ तक कि गलत काम भी, ताकि अख़बारों में नाम तो आएगा. सद्गुरू इसी खजाने की बात सुनाते हैं. जिसमें प्रेम, शांति, आनंद, सुख, पवित्रता, ज्ञान और शक्ति के बहुमूल्य रत्न हैं. जिसे पाकर जगत के सारे सुख फीके जान पड़ते हैं. जिनका अनुभव करके व्यक्ति संसार में सफल भी हो सकता है और अन्यों को भी सफलता के मार्ग पर ला सकता है.

Wednesday, January 4, 2017

एक तलाश परम पद की

४ जनवरी २०१७ 
 हम सब सफल होना चाहते हैं. सबसे आगे भी रहना चाहते हैं. मानव  स्वभाव में ही यह गुंथा हुआ है कि वह थोड़े से संतुष्ट नहीं होता. सब कुछ पाकर भी उसे ऐसा लगता है कि कुछ अधूरा सा है. ऐसे में क्या जरूरी नहीं है कि हम थोड़ी देर थमकर गहराई से इसका कारण सोचें. जब हमसे काफी आगे वाला भी संतुष्ट नहीं है तो  वहाँ पहुच कर क्या हम संतुष्ट हो जायेंगे. इसका उत्तर भीतर से ही मिलेगा. संत कहते हैं हमारी तलाश तब तक जारी रहेगी जब तक हम उस पद को नहीं पा लेते जहाँ पूर्ण संतुष्टि है. वह पद अनंत है जिस पर हर कोई हर वक्त बैठ सकता है, उस की अभीप्सा हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. किन्तु हम उस मार्ग को नहीं जानते जिससे वहाँ जाया जा सकता है. ध्यान ही वह मार्ग है, इस मार्ग पर चलने वाला यात्री किसी से आगे जाना नहीं चाहता वह अपनी यात्रा भीतर ही भीतर करता है और उस तक पहुँच जाता है. 

Thursday, December 17, 2015

निज हाथों में भाग्य हमारा


हम देह को स्वस्थ रखने के लिए पौष्टिक भोजन ग्रहण करते हैं, व्यायाम और योग साधना करते हैं. मन के विश्राम के लिए हम निद्रा की शरण लेते हैं, उसे प्रसन्न रखने के लिए मनोरंजन के साधन का उपयोग करते हैं. भावनात्मक आवश्यकताओं के लिए परिवार, समाज और रिश्तों का आश्रय लेते हैं. हर क्षेत्र में सफलता पाने के लिए हर कोई अपने तौर पर किसी न किसी प्रयास में लगा है. यह सब करते हुए हम एक आवश्यक बात भुला देते हैं कि हमारे हर विचार का असर हमारे भाग्य पर पड़ता है. विचारों से हमारा दृष्टिकोण तथा मान्यतायें बनती हैं, जिससे हमारी आदते विकसित होती हैं, तथा व्यक्तित्त्व बनता है. प्रतिदिन कुछ समय निकाल कर अपने भविष्य की कल्पना करने तथा उसके अनुरूप चिन्तन करने से हम अपना भाग्य स्वयं ही बदल सकते हैं. 

Sunday, September 9, 2012

कृष्ण से कोई दूर नहीं है


अगस्त २००३ 
कृष्ण की वाणी अमोघ है, अमूल्य है, वह हमें ज्ञान का उपहार देते हैं, जिसे पाकर हम कृतकृत्य हो जाते हैं, कितने सरल शब्दों में कितनी उच्च बात वह कह जाते हैं, उनका प्रेम अनंत है, वह प्रेमस्वरूप हैं, तभी वह संसार के हर प्राणी से प्रेम करते हैं, हित चाहते हैं सभी का और जो भी उनकी शरण में जाता है, उसके कुशल क्षेम की रक्षा का भार वह स्वयं ले लेते हैं. वह जानते हैं हमारे लिये क्या उचित है क्या नहीं, वह हमारी भौतिक और आध्यात्मिक दोनों मांगों को स्वीकारते हैं, वह हमें पूरा का पूरा अपनाते हैं और स्वयं को भी पूरा का पूरा दे डालते हैं, वह कुछ शेष नहीं रखते, वह दूरी नहीं चाहते. वह प्रेम के बदले मात्र प्रेम ही चाहते हैं. वह सफलता असफलता को संसार के नजरिये से नहीं देखते. वह हमारे मन को पढ़ना जानते हैं और उसी के अनुरूप ज्ञान देते हैं. कृष्ण से हमारी निकटता भावना के स्तर पर है और आत्मिक स्तर पर भी, बल्कि वह स्वयं ही हमारी आत्मा है, तभी वह इतना अपना लगता है. उसकी आँखें देखना चाहें तो मीरा की आँखें देखनी होंगी, वह और हमारा अपना आप एक ही है, इस एकता की अनुभूति में अनोखा आनंद है, शांति है और प्रेम है. यहाँ कोई भेद नहीं, यह सहना है उस अथाह प्रेम को जो भक्त के भीतर उमड़ता है तो कचोट कर रख देता है.