दिव्यता कण-कण में है चाहे वह जड़ हो या चेतन। उस दिव्यता को हम पहचानें और आत्मसात् करें। एक बार निर्णय हो जाए तो उसी पथ पर चलें। एक मार्ग हो, उसे पकड़ कर राही को चलते जाना है। माना जंगल भी हैं सुंदर, पर दृष्टि को नहीं भटकाना है। नहीं कोई बाधा बन रोके, नहीं कोई जीवन को बहने से टोके । हमारी वाणी के दोष हमें अपनी मंज़िल पर जाने से रोकते हैं। वाणी शुद्द्ध हो, कल्याणकारी हो, रूक्ष ना हो, दोहरे अर्थों वाली न हो।उसमें लोच हो पर स्थिरता भी हो। वाणी में मिठास हो, दूसरों के दोष देखने वाली ना हो। व्याकरण का नियम विचलित न होता हो, भाषा की त्रुटि न हो। उसमें दिखावा न हो, पाखंड न हो, सत्य की अन्वेषी हो। व्यर्थ के कार्यों में न लगती हो। अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो। ईश्वर का हाथ पकड़कर चलना है, इसका पूरा विश्वास हो। देह, मन, बुद्धि सभी दिव्य बनें।
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Wednesday, October 12, 2022
Monday, August 6, 2018
भीतर बाहर एक हुआ जो
६ अगस्त २०१८
संत कहते हैं, मनसा, वाचा, कर्मणा हमें एक होना है, जैसा हम सोचते हैं, वैसा ही
वाणी में प्रकटे, उसी के अनुसार हमारे कृत्य हों. तभी जीवन में सच्चा योग फलित
होता है. हो सकता है हमारे भाव शुद्ध हों पर वाणी कठोर हो जाती हो, अथवा जितना
कार्य हम करना चाहते हों, उतना करते न हों. हमारे संकल्प जब तक पूर्णता को प्राप्त
नहीं हो जाते तब तक योग जीवन में नहीं उतरा. कोई व्यक्ति बहुत श्रम करता है किंतु
करते समय प्रसन्न नहीं है, अर्थात उसका मन कार्य के साथ एक नहीं हुआ. कोई ऊपर से
बहुत मधुर बोलता है पर मन से उसके विपरीत सोचता है, तब भी भीतर संघर्ष बना ही
रहेगा. जिस क्षण हम पूर्ण सकारात्मक हो जाते हैं, बाहर कैसी भी परिस्थिति हो मन
में एक शांति का अनुभव करते हैं, तब बोलते समय वाणी की सजगता बनी रहेगी, कृत्य
करने में त्रुटियाँ भी कम होंगी. जीवन का हर दिन एक नयी चुनौती लेकर आता है, बल्कि
हर क्षण ही हमारे सामने एक अवसर होता है, जिसमें हम योग के पद पर स्थित रह सकते
हैं अथवा उससे नीचे उतर सकते हैं.
Monday, May 21, 2018
मनसा, वाचा, कर्मणा भजे एक को जो
२२ मई २०१८
महात्मा गाँधी के प्रसिद्ध वचन हैं, ख़ुशी तब मिलेगी जब आप जो सोचते
हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, तीनों में सामंजस्य हो. मन और वाणी एक दूसरे के
विपरीत न हों, हमारे वचन और कर्म भी एक दूसरे की गवाही बनें. किन्तु अक्सर ऐसा
होता है कि भाव शुद्ध होते हुए भी वाणी कठोर हो जाती है, अथवा वाणी अत्यंत मधुर
है, मानो शहद में डूबी हो, पर कर्म स्वार्थ से भरे होते हैं. जब तक ऐसा है, ख़ुशी
टिकने वाली नहीं है. साधक को तो अति सजग रहना होगा, उसका आचरण परमार्थ के लिए हो,
वाणी में कोई दोष न हो, और भाव पवित्र हों. परमात्मा के पथ का जो राही है, उसे यदि
स्वयं के कुशल-क्षेम की चिंता स्वयं ही करनी है तो उसकी श्रद्धा सच्ची नहीं. उसे भी
यदि सम्मान पाने की आकांक्षा है तो उसने परमात्मा को सर्वोत्तम माना ही नहीं. कबीर
दास ने कहा है, जो शीश कटाने को तैयार हो वही इस पथ पर चल सकता है. स्वयं को बचाते
हुए बल्कि और भी सजाते हुए इस पथ पर नहीं
चला जा सकता. निष्कामता और निस्वार्थता साधे बिना अनंत के द्वार तक नहीं पहुंचा जा
सकता.
Thursday, May 10, 2018
भीतर के पट खोल
११ मई २०१८
संत कहते हैं, मानव जन्म दुर्लभ है, हमें इसका भरोसा नहीं होता
और छोटी-छोटी बातों में स्वयं को डुबा कर हम इस बहुमूल्य जीवन को किसी न किसी तरह व्यतीत
करते रहते हैं. आधि, व्याधि और उपाधि के चक्र से कभी बाहर ही निकल पाते. एक समस्या
से दूसरी समस्या में जाने का नाम ही हमने जीवन समझ लिया है. सुख का स्वाद अभी मुख
से गया भी नहीं होता कि दुःख की रोटी थाली में पड़ी दिखाई देती है. हम रुककर यह भी
नहीं पूछते, कि आखिर इस दुःख का कारण क्या है ? मानव जीवन में ही हम इस सत्य से
परिचित हो सकते हैं. स्वयं के सच्चे स्वरूप का अज्ञान हमें मन और बुद्धि में ही
उलझाये रखता है. संस्कारों के कारण पूर्व के किये गये कृत्य पुनः-पुनः करके हम
बार-बार उसी दुविधा में पड़ते हैं. कितना अच्छा हो यदि हम संत वाणी पर पूर्ण
विश्वास करके अपने भीतर जायें और मानव जीवन की दिव्यता का स्वयं अनुभव करें.
Friday, September 22, 2017
मन, वाणी के पार हुआ जो
२३ सितम्बर २०१७
जीवन कितना अबूझ है और कितना
सरल भी. हरियाली का आंचल ओढ़े माँ के समान पोषण करती यह धरती, जिसका अन्न और जल
पाकर हमारा तन बनता है. पिता के समान प्राण भरता आकाश जिससे यह काया गतिशील होती
है. अन्न और प्राण के संतुलन का नाम ही तो जीवन का आरम्भ है. इसके बाद वह पुष्पित
और पल्लवित होता है शब्दों और विचारों में, वाणी का अद्भुत वरदान मानव जीवन को
विशिष्ट बनाता है. वाणी के भी पार है वह परम तत्व जिसे जानकर जीव पूर्णता का अनुभव
करता है. साधक पहले तन को साधता है, फिर मन को, पश्चात वाणी को, जिसके बाद चेतना
स्वयं में ठहर जाती है. स्वयं के पार जाकर ही परम चैतन्य का अनुभव होता है.
Sunday, December 11, 2016
पूज्य सदा हो कण-कण जग का
११दिसम्बर २०१६
हम जिस वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति का हृदय से सम्मान करते हैं, उससे मुक्तता का अनुभव करते हैं अर्थात उनके अवाँछित प्रभाव या अभाव का अनुभव नहीं करते। सम्मानित होते ही वे हमारे भीतर लालसा का पात्र नहीं रहते। यदि हम सभी का सम्मान करें तत्क्षण मुक्ति का अनुभव होता है. इसीलिए ऋषियों ने सारे जगत को ईश्वर से युक्त बताया है. अन्न में ब्रह्म को अनुभव करने वाला व्यक्ति कभी उसका अपमान नहीं कर सकता, भोजन में पवित्रता का ध्यान रखता है. शब्द में ब्रह्म को अनुभव करने वाला वाणी का दुरूपयोग नहीं करेगा। स्वयं को समता में रखने के लिए, वैराग्य के महान सुख का अनुभव करने के लिए, कमलवत जीवन के लिए आवश्यक है इस सुंदर सृष्टि और जगत के प्रति असीम सम्मान का अनुभव करना।
Tuesday, April 21, 2015
भीतर अमृत घट झरता है
जनवरी २००९
संतजन कहते
हैं, पत्थर, वनस्पति, पशुओं की दुनिया को पार कर हम मानव बने हैं. मानव के पास मन
है, वाणी है ! वाणी से ही मनुष्य की पहचान होती है. परमात्मा भी शब्द के माध्यम से
प्रकट हुआ है. इस शब्द को जब हम भीतर सुनते हैं तो मानो परमात्मा के द्वार पर
पहुंच गये हैं. संगीतमयी वह परमात्मा की धुन अनवरत हमारे भीतर गूँज रही है. बाहर
का संगीत भीतर से ही उपजा है. भीतर अमृत के झरने बह रहे हैं. मनुष्य का जन्म इसी
को सुनने के लिए हुआ है. मनुष्य परमात्मा में ही जन्मा है, जीता है व विलीन होता
है, लेकिन वह जानता नहीं. उसका मन विकसित हुआ है पर अचेतन मन अभी भी पाशविक
वृत्तियों का शिकार बना है. भक्त अपने मन के भीतर परमात्मा को प्रकट करता है.
अनगढ़ा मन भगवान को नहीं जान पाता, जैसे जैसे मन जगता जायेगा परमात्मा प्रकट होता
जायेगा. जैसे एक संगतराश पत्थर से मूर्ति को तराशता है वैसे ही साधक अपने मन में
से एक ज्योतिस्वरूप परमात्मा को गढ़ता है. मन को मथ कर वह अमृत कुम्भ प्रकट करता
है.
Thursday, November 27, 2014
चलो चलें अब निज देश में
मई २०१४
बोलते
समय हमारी वाणी के साथ हमारे भीतर की तरंगे भी प्रभावित करती हैं, वाणी यदि मधुर
होगी तो तरंगे प्रेम लेकर वाणी से पहले ही पहुंच जायेंगी और भीतर यदि कटुता है,
खीझ है, क्रोध है, अहंकार है तो वाणी से पहले वही सब तरंगें लेकर जाएँगी, बात का
असर नहीं होगा बल्कि हमारी बात अभी कही भी नहीं गयी उसके प्रति नकारात्मक भाव पहले
ही जग उठा होगा. भीतर का वातावरण शांत हो, मधुर हो तभी तो तरंगे ऐसी होंगी और ऐसा
तभी सम्भव हो सकता है जब हम भीतर उस जगह रहना सीखें जहाँ कोई विक्षेप नहीं है,
जहाँ एक सी सौम्यता है, जहाँ न अतीत का दुःख है न भविष्य का डर, जहाँ निरंतर
वर्तमान की सुखद वायु बहती है. मन से परे आत्मा के उस आंगन में हम अपना निवास
बनाएं जहाँ प्रेम, आनंद, शान्ति के कुछ है ही नहीं. हम जब जरूरत हो तभी चित्त,
बुद्धि, मन तथा अहंकार के क्षेत्र में जाएँ अपना काम करके तत्क्षण अपने घर में लौट
आयें तब मन में उठे विचार भी शुद्ध होंगे, बुद्धि भी पावन होगी तथा स्मृतियाँ भी
सुखद बनेंगी और शुद्ध अहंकार होगा. वाणी तथा कर्मों की शुद्धता अपने आप आने लगेगी,
ऐसे में हमारी वह शक्ति जो अभी व्यर्थ चिन्तन, वाचन में चली जाती है बचेगी, ध्यान
में लगेगी तथा लोकसंग्रह भी स्वतः ही होने लगेगा.
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Sunday, November 16, 2014
कहत कबीर सुनो भई साधो
अप्रैल २००७
सद्गुरू
हमें वाणी के द्वारा ज्ञान देते हैं, सही-सोच बनाने में सहायता करते हैं. एक साधक
को चेतना के विकास के लिए श्रवण करना चाहिए. शास्त्रों को सुनने से जीवन में सुखद
परिवर्तन आता है. अच्छा सुनना साधना की पहली सीढ़ी है. नितांत एकांत में भी हम
सुनते हैं, प्रकृति से भी हम सुनते हैं. भद्र सुनने से हम भद्रता को संग्रहित करते
हैं, अपने को सही रखना सीखते हैं. निर्विषयता, निर्विकारता तभी आती है, भ्रम और भय
से मुक्ति मिलती है, जब हम सही सुनते हैं. जीवन में रस तभी आता है, उत्साह आता है,
हमारा चिन्तन सकारात्मक होता है, मोह नष्ट होता है और अपने स्वरूप की झलक मिलती है,
बोध जगता है. वाणी भगवान का बीज है, जो समय आने पर भक्ति का वृक्ष बनता है. जिसमें
प्रेम के सुंदर फल लगते हैं, उन फलों में सेवा की मिठास होती है. चेतना को संकीर्णता
से ऊपर उठाकर परमात्मा के निकट ले जाना सीखते हैं जो उस पर कृपा का जल बरसाते हैं,
ज्ञान की खाद देते हैं और हृदय सुंदर भावनाओं का उपवन बन जाता है, वहाँ जाकर मन को
विश्राम मिलता है, बुद्धि भी वहाँ शांत होकर सजगता को प्राप्त होती है.
Tuesday, July 29, 2014
पल पल उसकी याद रहे
जनवरी २००७
सन्त
कहते हैं, सृष्टि और परमात्मा अलग-अलग नहीं हैं. परमात्मा हमारे भीतर उसी तरह समाया
हुआ है जैसे फूल में खुशबू ! हमारे भीतर जब उसकी उपस्थिति महसूस होने लगती है तब
ज्ञान केवल शब्दों तक सीमित नहीं रह जाता. साधक को प्रतीत होता है उसे अपने लिए अब
कुछ पाना नहीं, कुछ करना नहीं, कुछ जानना नहीं. वह कृत-कृतव्य, ज्ञात-ज्ञातव्य,
प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है. हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण जगत के लिए सुखकर हो,
शुभ हो, वाणी सौम्य हो तथा कर्म बंधनकारी न हों, पूर्वजों को सुख देने वाले हों तथा
प्रियजनों के लिए हितकारी हों, हमारी हर श्वास नाम से युक्त हो, पवित्र आत्मा में
सदा हमारी स्थिति हो, ऐसी ही प्रार्थना जब फलित होती है तब परमात्मा की अनुभूति
घटती है.
Tuesday, February 4, 2014
मन तू ज्योति समान अपना मूल पिछान
जुलाई २००५
हमारा
जीवन जिन वस्तुओं से महत्वपूर्ण बनता है, उनमें सबसे प्रमुख है प्रेम ! भीतर जब
प्रेम भरा रहता है तो बाहर सभी कुछ सरल हो जाता है और प्रेम जब हृदय का वासी बन
जाता है तो बाहर एक शांति स्वतः ही प्रकट होती रहती है. हमारा मन तब समाधान पाना
सीख लेता है. नम्रता से अहंता को, क्रोध को अक्रोध से, हिंसा को अहिंसा से जीतने
की कला सीख लेता है. सार्थक चेष्टा से व्यर्थ अपने आप गिर जाता है, सार्थक चिन्तन
से विषाद दूर हो जाता है. जो मन असत्य, परदोष दृष्टि तथा आत्मप्रशंसा को त्याग
देता है, उसकी वाणी के दोष भी समाप्त होने लगते हैं. भ्रम दोष, प्रमाद दोष और
लिप्सा दोष वाणी के दोष हैं. जिसके बारे में पूर्ण जानकारी न हो, ऐसी वाणी बोलना
ही भ्रम दोष है, असजग होकर कहे गये वाक्य भूल से भरे होंगे. लोभ बढ़े तो वाणी का
असर नहीं होता. ऐसा मन ही हमें भगवद्प्रेम का अनुभव करा सकता है, आत्मा को प्रकट
करने के लिए सहायक हो सकता है. वह अपने मूल को पहचानने लगता है, वह भीतर जाने लगता
है.
Wednesday, January 1, 2014
शुभता का ही वरण करें हम
जून २००५
हमारे
भीतर का ज्ञान, व्यवहार तथा वाणी से ही प्रकट होता है, हम यदि झुंझला जाते हैं,
खिन्न हो जाते हैं अथना टेढ़ा बोलते हैं तो हम हिंसा कर रहे होते हैं, जिसका पहला
शिकार हम स्वयं होते हैं. वाणी के साथ-साथ हमारे हाव-भाव तथा व्यवहार की सूक्ष्म
तरंगें भी सामने वाले व्यक्ति को छूती है. हमारे भीतर क्रोध, भय आदि के संस्कार
हैं, परिस्थिति आने पर यदि हम भय अथवा क्रोध के शिकार नहीं होते उससे बच निकलते
हैं तो वह संस्कार नष्ट होने लगता है अन्यथा उर्वरक भूमि पाते ही जमने लगता है और
वृक्ष रूप में बढ़ने लगता है, भविष्य में उसमें अनेकों फल लगने ही वाले हैं तथा
अनेकों बीज बनने वाले हैं, जिससे दुःख ही दुःख मिलने वाले हैं. इसी तरह भीतर प्रेम
व शांति के संस्कार भी छुपे हैं हैं. प्रेम की तरंगे शब्दों से पहले ही सम्मुख उपस्थित व्यक्ति के हृदय को छू
लेती हैं, वे निशब्द होकर भी बहुत कुछ व्यक्त कर देती हैं. प्रेम का एक बीज भविष्य में वट वृक्ष बनने वाला है.
Tuesday, November 19, 2013
भाव शुद्धि सत्व शुद्धि....
अप्रैल २००५
संचित कर्म,
प्रारब्ध कर्म तथा क्रियमाण कर्म, ये तीन प्रकार के कर्म हैं जो जीव के साथ सदा
रहते हैं जब तक उसे भगवद् प्राप्ति न हो जाये. संचित कर्म वे हैं जो हमने जन्मों-जन्मों
में एकत्र किये हैं, उन्हीं में से कुछ कर्मों को प्रारब्ध बनाकर हम इस दुनिया में
भेजे जाते हैं, क्रियमाण वे कर्म हैं जो जन्म से मृत्यु तक हम अपनी इच्छा से करते
हैं. इन कर्मों को करते हुए हम पुनः संचित कर्म एकत्र करते जाते हैं. किसी कार्य
को करते समय हमारी भावना जैसी होगि वही उसका वास्तविक रूप होगा, बाहरी रूप से चाहे
हम कितना भी अच्छा व्यवहार दिखाएँ पर यदि भावना बिगड़ी हुई है तो हमारा कर्म अशुद्ध
ही माना जायेगा. भीतर का भाव बिगड़ते ही हम स्वयं को कर्म बंधन में बांध लेते हैं.
बाहर तो परिणाम नजर आता है कारण भीतर होता है. परिणाम तो नष्ट हो जाता है पर कारण बीजरूप
में बना रहता है, फिर वह प्रारब्ध कर्म बन कर कभी भी आ सकता है. हम क्रियमाण
कर्मों को करने में स्वतंत्र हैं, अपने मन, बुद्धि, विचारों, भावनाओं तथा वाणी को
पवित्र रखने में स्वतंत्र हैं, हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं. सजग व्यक्ति कभी भी खुद को कर्म बंधन में नहीं
बांधते. जब हमारा लक्ष्य मुक्ति है तो अपने ही हाथों स्वयं को क्यों बाँधें.
Sunday, October 13, 2013
मौन हुआ जब मन का पंछी
“मने
मने थाके” अर्थात please keep quite कितना सुंदर सूत्र है यह, पर हमसे बिना बोले
नहीं रहा जाता. हमारी ऊर्जा सबसे अधिक बोलने में ही खर्च होती है. हम बेवजह बोलते
हैं, बढ़ा -चढ़ा कर बोलते हैं, कुछ का कुछ बनाकर बोलते हैं तथा अपने अहंकार को पोषने
के लिए बोलते हैं. हम ज्यादातर समय सुने हुए को दोहराते हैं अथवा तो बोले हुए को
भी दोबारा बोलते हैं. वाणी का यदि सदुपयोग हो तो हमारे वचनों में जान आ जाये, बल आ
जाये, सत्य का बल. चुप रहने में ही सबसे बड़ा सुख है, कम बोलने वाला कभी मुसीबत में
नहीं फंसता. संतजन भी कहते हैं, जब भीतर ईश्वरीय प्रेम की महक भरी हो तो उसे भीतर
ही भीतर जज्ब होने दो, जैसे इत्र का ढक्कन धीरे से खोला जाता है फिर बंद कर दिया
जाता है. वैसे ही मुंह का ढक्कन जब जरूरी हो तभी खोलना चाहिए, वरना सारी महक उड़
जाएगी तथा संसार की गंध उसमें भर जाएगी. साधक को विशेष सतर्क रहने की आवश्यकता है.
Wednesday, October 9, 2013
छुप गया कोई रे
मार्च २००५
ईश्वर प्रेम
स्वरूप है, आनन्द स्वरूप है, ज्ञान स्वरूप है. वही सबमें है सब उसमें हैं अथवा तो
वही सब है. हम एक क्षण के लिए भी बल्कि एक क्षण के शतांश के लिए भी उससे पृथक नहीं
हो सकते, वह है तो हम हैं फिर भी वह हमें दिखाई नहीं देता. हरेक कण में परमात्मा सुप्त
अवस्था में है, इसे जगाना ही साधना है. सब जगह व्याप्त चैतन्य को रिझाना और
आत्मसात करना है. जो प्रकट न हो फिर भी उससे प्रेम करना, यही तो श्रद्धा है. प्रेम
भाव से तल्लीन हो जाना ही चैतन्य को कण-कण में जगाना है. वह तो पहले से है ही, पर
हमें जब तक अनुभव न हो तब तक हमें उसे पुकारना है. हम जैसे सोये हुए से सचेत हो
जाते हैं. भीतर की चेतना यदि पूर्ण जागृत न हो तो इन्सान सोया हुआ ही कहा जायेगा.
जगा हुआ ही अपनी पूर्ण जिम्मेदारी ले सकता है, अपने कर्मों, वाणी तथा विचारों के
प्रति सावधान होता है.
Tuesday, April 9, 2013
सूक्ष्म ही पा सकता सूक्ष्म को
जुलाई २००४
हमसे सुबह से शाम तक न जाने
कितने अपराध होते रहते हैं, वाणी का अपराध उनमें सबसे ज्यादा होता है, हम स्वभाव
वश कटु भाषा का प्रयोग करते हैं, अप्रिय बात भी बोल देते हैं, असत्य तथा बढा-चढ़ा
कर भी बोलते हैं. जो जैसा है वैसा का वैसा प्रकट नहीं करते. व्यर्थ ही हम जोर से
बोलते हैं, बिना आवश्यकता के बोलते हैं, और अपनी बहुमूल्य ऊर्जा का अपव्यय होने
देते हैं. यह सभी तब होता है जब हम खुद की याद भुला देते हैं, हमें यह बोध नहीं
रहता कि वास्तव में हम पावन ऊर्जा हैं, जिसकी एक-एक बूंद अनमोल है, अपने शुद्ध
स्वरूप में होने पर कोई कभी भी असत्य का आश्रय नहीं ले सकता. मन के स्तर पर होने
से हम उसी के धर्म का शिकार हो जाते हैं. मन चंचल है, वह हमें भी अस्थिर कर देता
है, संसार को जिस रूप में दिखाता है, बाध्य होकर हम उसी रूप में देखते हैं. साधना
में हम इसी मन को यहाँ-वहाँ से, इधर-उधर से, पचासों जगहों से जहाँ-जहाँ यह अटका है,
वहाँ-वहाँ से लाकर अपने भीतर लाना सिखाते हैं, जहाँ परमात्मा का वास है, ऐसा मन
सौम्यता धारण करता है, ईश्वरीय प्रसाद पाने लगता है. सूक्ष्म को पाकर वह स्थूल से
मोह नहीं कर सकता. सूक्ष्म को पाने की
क्षमता यदि एक बार मन विकसित कर ले तो वह एकाकी नहीं रह जाता, वह तत्व सदा उसके
साथ रहता है. मन आत्मारामी हो जाता है. मन की धारा संसार से उलट कर राधा हो जाती है, कृष्ण का आश्रय जिसे सदा ही
प्राप्त है.
Tuesday, February 26, 2013
मन जब चुप होना सीखेगा
मौन में शांति है. जब अति
आवश्यक हो तभी बोला जाये, तो हम वाणी के कई अपराधों से बच सकते हैं. अधिक बोलने से
हम असत्य भी बोल सकते हैं, पर मन का मौन भी इतना ही आवश्यक है, जितना वाणी का. मन
आखिर सुनाता ही किसको है ? स्वयं को ही सुनाता रहता है. सुने हुए को, कहे हुए को
बार-बार दोहराता है. आत्मा तो उसको सुनना नहीं चाहता, अहंकार को ही सुनाता होगा,
तो यदि भीतर शांति चाहिए तो अहंकार रूपी श्रोता को भगा देना होगा. ध्यान में जैसे-जैसे
हम गहरे जाते हैं, अहंकार से मुक्त होते जाते हैं, तभी शांति का अनुभव होता है.
Thursday, February 21, 2013
जरा मीठा मीठा बोलो
अप्रैल २००४
साधक को वाणी के दोष एक-एक
करके दूर करने हैं, पहला दोष है कठोर वाणी, दूसरा है अप्रसंग बात करना, बिना
जानकारी के बात करना, अधिक बात करना, असत्य वचन बोलना. हमारे जीवन में जो भी
कठिनाईयाँ आती हैं उनमें वाणी का बहुत बड़ा योगदान है. वाणी ऐसे भी न हो जिसमें
परनिंदा हो, चुगली हो अथवा तो स्वयं को दुखी करने या होने की बात हो. हमारी वाणी
कौशल्या रूपी बुद्धि से उपजी हो, तभी राम रूपी आनंद का प्राकट्य होगा. रावण रूपी अहंकार
से उपजी वाणी अपने विनाश का ही कारण बनती है.
Sunday, September 9, 2012
कृष्ण से कोई दूर नहीं है
अगस्त २००३
कृष्ण की वाणी अमोघ है, अमूल्य है, वह हमें ज्ञान का उपहार देते हैं, जिसे पाकर हम
कृतकृत्य हो जाते हैं, कितने सरल शब्दों में कितनी उच्च बात वह कह जाते हैं, उनका
प्रेम अनंत है, वह प्रेमस्वरूप हैं, तभी वह संसार के हर प्राणी से प्रेम करते हैं,
हित चाहते हैं सभी का और जो भी उनकी शरण में जाता है, उसके कुशल क्षेम की रक्षा का
भार वह स्वयं ले लेते हैं. वह जानते हैं हमारे लिये क्या उचित है क्या नहीं, वह
हमारी भौतिक और आध्यात्मिक दोनों मांगों को स्वीकारते हैं, वह हमें पूरा का पूरा
अपनाते हैं और स्वयं को भी पूरा का पूरा दे डालते हैं, वह कुछ शेष नहीं रखते, वह
दूरी नहीं चाहते. वह प्रेम के बदले मात्र प्रेम ही चाहते हैं. वह सफलता असफलता को
संसार के नजरिये से नहीं देखते. वह हमारे मन को पढ़ना जानते हैं और उसी के अनुरूप
ज्ञान देते हैं. कृष्ण से हमारी निकटता भावना के स्तर पर है और आत्मिक स्तर पर भी,
बल्कि वह स्वयं ही हमारी आत्मा है, तभी वह इतना अपना लगता है. उसकी आँखें देखना
चाहें तो मीरा की आँखें देखनी होंगी, वह और हमारा अपना आप एक ही है, इस एकता की अनुभूति
में अनोखा आनंद है, शांति है और प्रेम है. यहाँ कोई भेद नहीं, यह सहना है उस अथाह
प्रेम को जो भक्त के भीतर उमड़ता है तो कचोट कर रख देता है.
Thursday, May 10, 2012
वह मौन में मिलने आता है
मार्च २००३
जीवन में सतोगुण कैसे आये, इसका वर्णन करते हुए संत कहते हैं कि संयम और सेवा यह
दो ही सूत्र हैं, अर्थात मन पर नियंत्रण और हाथ से कर्म, ऐसे कर्म जो हितकारी हों.
ईश्वर का सुमिरन भी तभी होगा. अनियंत्रित भोग और स्वार्थ ही हमें उससे दूर ले जाता
है. वह हमसे हमारी भलाई की अपेक्षा के अतिरिक्त कुछ भी अपेक्षा नहीं रखता. वह हमें
कदम-कदम पर चेताता है कि अपनी ऊर्जा को व्यर्थ न गवाएं. मौन केवल वाणी का हो तो
उससे लाभ नहीं है, भीतर का मौन होना चाहिए. इसी मौन में चिदाकाश का दर्शन होता है.
शुभ्र, अनंत, स्वच्छ नीले आकाश की तरह. जिसमें कोई तरंग न उठ रही हो ऐसी झील कई
तरह ! कोई द्वंद्व नहीं, कोई अंतर विरोध नहीं, कोई कामना भी नहीं, बस अपना होना ही
जहाँ पर्याप्त होता है. ‘हम हैं’ यह अनुभूति, ‘हम परमात्मा के अंश हैं’ यह ज्ञान
और इस ज्ञान से उत्पन्न सहज आनंद !
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