जीवन का हर पक्ष सुंदर हो, साधक को सदा इस बात का बोध रहना चाहिए। सौंदर्य की परख भी प्रेम, शांति तथा आनंद की भाँति मन की गहराई में जाकर मिलती है। शुद्ध चैतन्य को 'सत्यं शिवं सुंदरं' कहा गया है, जिससे जुड़कर साधक को सूक्ष्म व अरूप सौंदर्य की झलक मिलती है। जो अपने भीतर गया है वही प्रकृति के भीतर छिपे उस अनाम सौंदर्य से जुड़ सकता है। वायु का स्पर्श, आकाश की अनंतता, अग्नि की लपटों का आकर्षक रूप, बहाते हुए जल का कलकल नाद, उसमें उठती हुई तरंगें, धरती पर पर्वत, घाटियाँ, जंगल, आदि उसे सौंदर्य की ख़ान के रूप में दिखायी देते हैं। इस असीम सुंदरता को संरक्षित व सुरक्षित रखने की भावना सहज ही भीतर जगती है। उन्हें प्रदूषित करने का विचार भी उसके मन में नहीं आ सकता। यदि नई पीढ़ी को बचपन से ही ध्यान सिखाया जाये तो वे इस गुण को सहज ही अपना लेंगे और अपने आस-पास एक सुंदर वातावरण का निर्माण करेंगे।
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Tuesday, July 11, 2023
Monday, April 6, 2020
अल्प से ही जो तुष्ट रहेगा
एक मुठ्ठी अन्न, अंजुरी भर जल और थोड़ी सी प्राणवायु क्या इतना ही पर्याप्त नहीं एक जीव को मानव की देह धारण के लिए. धरती पर वायु का अकूत भंडार है पर हम एक बार में कितनी श्वास ले सकते हैं ? जल के कितने स्रोत हैं पर प्यास बुझाने के लिए एक बार में अल्प ही चाहिए. इसी तरह धरती पर अनाज के भंडार भरे पड़े हैं पर थोड़ा सा भोजन ही प्राणी की भूख मिटाने के लिए पर्याप्त है. सन्त कहते हैं जीव परमात्मा का अविनाशी अंश है, जब वह मानव देह लेता है तो उससे क्या सिद्ध करना चाहता है. हर कोई ख़ुशी ही तो चाहता है, जो परमात्मा का स्वभाव है, अर्थात परमात्मा के गुणों का प्रकाश उसके माध्यम से फैले, उसका प्रेम और आनंद जगत में प्रकाशित व प्रसारित हो, इतना ही तो उसका अभिप्राय है. सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ कहे गए हैं, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. धर्म की स्थापना के लिए अर्थ हो और मोक्ष की कामना जगे यही उनका अभिप्राय है. धर्म का अर्थ है किसी को दुःख देने की तिलमात्र भी भावना भीतर न हो, बल्कि दूसरों का भला चाहें. मोक्ष का अर्थ है तन या मन की गुलामी न करें. आत्मा जब धर्म के पथ पर होगी यानि मन का भाव शुद्ध होगा तो स्वतन्त्रता का अनुभव करेगी, यही तो मोक्ष है और हर जीव की यही आंतरिक पुकार है. हम थोड़े में सन्तुष्ट रहना सीखें, इस विपदा से यही सीखना है और यह समय बीत जाने पर भी इसी का पालन करना है, तब कोई भारतवासी गरीब नहीं रहेगा.
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Saturday, July 20, 2019
बार-बार खुद को पाना है
जीवन एक अनवरत बहती धारा की तरह एक चक्र में प्रवाहित हो रहा है. सागर में मिलने
की लालसा लिए नदी दौड़ती जाती है पर वायु उसे आकाश को लौटा देता है, बादलों के रूप
में बरसती है तो फिर नदी बनकर एक यात्रा पर निकल जाती है. सागर में खुद को खोकर
बादलों के द्वारा पुनः खुद को पाना क्या यही नदी का लक्ष्य नहीं है. मन रूपी धारा
भी आत्मा के सागर में लौटना चाहती है,
सुख-दुःख के दो किनारों के मध्य से बहती हुई स्वयं तक लौटने की उसकी यात्रा ही तो
जीवन है. कोई स्वयं तक पहुँच भी जाता है तो किसी न किसी कामना की वायु उसे पुनः एक
नयी यात्रा पर ले जाती है. इस तरह न जाने कितने ही जन्मों में मानव ने संतों के
चरणों में बैठकर आत्मअनुभव किया होगा, किंतु इस धरती का आकर्षण उसे हर बार मुक्ति
के द्वार से यहीं लौटा लाया होगा. आत्मा में स्वयं को खोकर जगत में खुद को पाने की
यात्रा क्या यही तो जीवन का रहस्य नहीं है ?
Monday, June 11, 2018
खिले सुमन सा मन जिस क्षण
११ जून २०१८
प्रकाश, हवा और जल के बिना एक नन्हा सा फूल भी आँखें नहीं खोल पाता, साथ ही उसे धरती
का आधार भी चाहिए और बढ़ने के लिए आकाश भी. मानव मन के संबंध में प्रकाश ज्ञान का प्रतीक
है, वायु सजगता का और जल प्रेम का, धरती है देह और आकाश है आत्मा. मन को यदि उड़ान
भरनी है तो देह को स्वस्थ व सबल रखना होगा. शास्त्रों और गुरुजनों द्वारा बताए गये
ज्ञान का अनुसरण करना होगा, अंतर में प्रेम को पनपने का अवसर देना होगा, यानि
भावपक्ष भी सबल हो और बुद्धि पक्ष भी तभी मन आत्मा के आकाश में ऊपर और ऊपर जा सकता
है, जहाँ जाकर सारे भेद समाप्त हो जाते हैं. जैसे एक बीज फूल बनकर तृप्त होता है,
मन भी जब पूरा खिल जाता है, तभी तृप्ति का अनुभव करता है.
Wednesday, April 11, 2018
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा
1२ अप्रैल २०१८
जीवन जिन तत्वों से मिलकर बना है, वे हैं पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश. तीन तत्व स्थूल हैं और दो सूक्ष्म. पृथ्वी, वायु व जल से देह बनी है, अग्नि यानि ऊर्जा है मन अथवा विचार शक्ति, और आकाश में ये दोनों स्थित हैं. शास्त्रों में परमात्मा को आकाश स्वरूप कहा गया है, जो सबका आधार है . परमात्मा के निकट रहने का अर्थ हुआ हम आकाश की भांति हो जाएँ. आकाश किसी का विरोध नहीं करता, उसे कुछ स्पर्श नहीं करता, वह अनन्त है. मन यदि इतना विशाल हो जाये कि उसमें कोई दीवार न रहे, जल में कमल की भांति वह संसार की छोटी-छोटी बातों से प्रभावित न हो, सबका सहयोगी बने तो ही परमात्मा की निकटता का अनुभव उसे हो सकता है. मन की सहजावस्था का प्रभाव देह पर भी पड़ेगा. स्व में स्थित होने पर ही वह भी स्वस्थ रह सकेगी. मन में कोई विरोध न होने से सहज ही सन्तुष्टि का अनुभव होगा.
Monday, March 5, 2018
जलवायु का हो सरंक्षण
५ मार्च २०१८
जल, वायु, प्रकाश, वृक्ष के रूप में प्रकृति के वरदानों का हम
प्रतिदिन उपयोग करते हैं. इनके बिना हमारा अस्तित्त्व ही सम्भव नहीं है. वैज्ञानिकों
के अनुसार आज जल के स्रोत घटते जा रहे हैं, दूषित हो चुके हैं. वायु में भी अनेकों
विषैले तत्व घुल गये हैं. विकास के नाम पर जंगल काटे जा रहे हैं. अर्थात मानव अपने
ही पांवों पर कुल्हाड़ी मार रहा है. वैदिक संस्कृति में हमें पंच तत्वों का सम्मान
करना सिखाया गया था, इन्हें देवता का सम्मान दिया गया था. वायु को देवता मानने
वाला समाज उसे प्रदूषित नहीं कर सकता था, हवन और यज्ञ द्वारा उसे पवित्र करता था. हम
मूल संस्कृति से दूर होते गये और धर्म के नाम पर कर्मकांड को अपना लिया. आज पुनः
जन-जन को उन्हीं आदर्शों को अपनाने की जरूरत है जिनमें प्रकृति को माँ का दर्जा
दिया गया था. माँ का दोहन नहीं किया जाता, उससे वरदान पाए जाते हैं. जल सरंक्षण
दिवस, पर्यावरण दिवस आदि यदि होली व दीपावली की तरह उत्सव का रूप ले लें तो जल के
स्रोत पुनर्जीवित किये जा सकते हैं, हर वर्ष लाखों वृक्ष लगाये जा सकते हैं.
Thursday, November 27, 2014
चलो चलें अब निज देश में
मई २०१४
बोलते
समय हमारी वाणी के साथ हमारे भीतर की तरंगे भी प्रभावित करती हैं, वाणी यदि मधुर
होगी तो तरंगे प्रेम लेकर वाणी से पहले ही पहुंच जायेंगी और भीतर यदि कटुता है,
खीझ है, क्रोध है, अहंकार है तो वाणी से पहले वही सब तरंगें लेकर जाएँगी, बात का
असर नहीं होगा बल्कि हमारी बात अभी कही भी नहीं गयी उसके प्रति नकारात्मक भाव पहले
ही जग उठा होगा. भीतर का वातावरण शांत हो, मधुर हो तभी तो तरंगे ऐसी होंगी और ऐसा
तभी सम्भव हो सकता है जब हम भीतर उस जगह रहना सीखें जहाँ कोई विक्षेप नहीं है,
जहाँ एक सी सौम्यता है, जहाँ न अतीत का दुःख है न भविष्य का डर, जहाँ निरंतर
वर्तमान की सुखद वायु बहती है. मन से परे आत्मा के उस आंगन में हम अपना निवास
बनाएं जहाँ प्रेम, आनंद, शान्ति के कुछ है ही नहीं. हम जब जरूरत हो तभी चित्त,
बुद्धि, मन तथा अहंकार के क्षेत्र में जाएँ अपना काम करके तत्क्षण अपने घर में लौट
आयें तब मन में उठे विचार भी शुद्ध होंगे, बुद्धि भी पावन होगी तथा स्मृतियाँ भी
सुखद बनेंगी और शुद्ध अहंकार होगा. वाणी तथा कर्मों की शुद्धता अपने आप आने लगेगी,
ऐसे में हमारी वह शक्ति जो अभी व्यर्थ चिन्तन, वाचन में चली जाती है बचेगी, ध्यान
में लगेगी तथा लोकसंग्रह भी स्वतः ही होने लगेगा.
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सुख. शांति
Saturday, February 22, 2014
सुंदर सूत्र - शरीरं दृश्यं
“शरीरं दृश्यम” जिस
तरह प्रकृति दृश्य है उसी तरह देह तथा मन भी साधक के लिए दृश्य हो जाता है. शरीर,
मन, विचारों तथा भावनाओं से परे वह भीतर साक्षी रूप का अनुभव करता है अथवा तो यह
सारा दृश्य ही हमारा शरीर है, हम सर्व व्यापक हैं, हवा, पानी और धूप हमारे ही अंग
हैं. सीमित होते हुए भी हम असीमित हैं. भीतर का वायु तत्व बाहर के वायु तत्व से जुड़ा
है. पृथ्वी तत्व अभी पैरों के नीचे है, मृत्यु के बाद ऊपर हो जायेगा. जब यह भाव
जगता है तो कोई भी भेद नहीं रहता, अभेद में ही प्रेम है. पहले उपाय से सबसे पृथक
होकर जो बचता है वह प्रेम है और दूसरे अर्थ में सबसे जुडकर जो मिलता है वह प्रेम
है. यह इतनी पवित्र, सूक्ष्म, और अद्भुत अनुभूति है कि शब्दों की पकड़ में नहीं आती
!
Friday, October 11, 2013
यह तेरा घर यह मेरा घर
मार्च २००५
पांच
तत्वों से मिलकर हमारा भौतिक घर बना है तथा पांच ही तत्वों से मिलकर शरीर का घर भी बना है पर जैसे भौतिक घर स्थायी नहीं है,
वैसे ही शरीर भी स्थायी नहीं है. हमारी मृत्यु के समय वह छूट जाने वाला है, हमें
अपने लिए एक ऐसा घर बनाना है जो सदा उपलब्ध हो, जहाँ जीवन का कोई तूफान हिला न
सके. वह घर बनाने के लिए चार तत्वों की आवश्यकता होगी, पांचवा आकाश तो अपने आप ही
आ जायेगा. सर्वप्रथम मिटटी अथवा पृथ्वी होनी चाहिए सहिष्णुता की, दूसरा तत्व है जल,
उसकी निर्मलता, एक प्रसन्नता जो निर्मलता से उत्पन्न हुई है. तप से प्राप्त तेज व ओज
की अग्नि भी हमें चाहिए ताकि पुराने अवांछित कर्म संस्कार उसमें जल जाएँ. अनासक्ति
की वायु सदा प्रवाहित हो, अनासक्त होकर हम समता को प्राप्त होते हैं, स्थिरता को
प्राप्त होते हैं. ऐसे घर का निर्माण जब भीतर हम कर लेते हैं तो जीवन के झंझावातों
का सामना खुले दिल से कर सकते हैं. तब भीतर समाधान मिल जाता है, भीतर कोई प्रश्न
नहीं रह जाता, एक विस्मय से मन भर जाता है.
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