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Tuesday, July 14, 2020

जीवन का जो पाठ पढ़ेगा

जीवन एक पाठशाला ही तो है, यहाँ हर दिन, हर किसी को, कोई न कोई परीक्षा देनी होती है. जब कोई देख न रहा हो तब भी कोई देखता है कि जब करुणा दिखाने का वक्त था तो हम कितने उदार थे. अचानक कोई विपदा आ पड़ी तो हमने कितनी शीघ्रता से उसका समाधान ढूंढ लिया. सामने वाला हमसे सहमत न हो रहा हो तो झट उसके दृष्टिकोण से हम वस्तुओं को भांप सकते हैं या नहीं इसकी भी परख होती है. जब देह को कोई रोग सताये तो हम कितनी जल्दी साक्षी भाव में आकर स्वयं को दर्द से बचा ले जाते हैं. जीवन में आ रहे परिवर्तन को कितनी आसानी से हम स्वीकार कर लेते हैं और दृढ़ता से उसका सामना करते हैं. कुछ भी हो जाये हमारी आशा की डोर टूटी तो नहीं, इसकी भी परीक्षा होती है. परमात्मा के प्रति आस्था और श्रद्धा में रंच मात्र भी कमी तो नहीं आती, कृतज्ञता की भावना ने हमारे अंतर को आप्लावित तो कर दिया है न. असीम धैर्य और आत्मविश्वास की पूंजी घट तो नहीं रही. जैसा जीवन  हम चाहते हैं उसी के अनुरूप हमारे कर्म भी हो रहे हैं या नहीं. ये सभी छोटी-छोटी बातें यदि जीवन में हैं तो अवश्य ही हम जीवन की पाठशाला से सफल होकर जाने वाले हैं. 

Monday, October 27, 2014

बल, बुद्धि, विद्या देहूं


हम हनुमान जी से बल, बुद्धि व विद्या का वर मांगते हैं किन्तु यदि बुद्धि में धैर्य न हो, बल के साथ विवेक न हो और विद्या में नम्रता न हो तो यही वरदान शाप भी बन सकते हैं. मन तो शिशु के समान है और बुद्धि उसकी बड़ी बहन, पर दोनों का आधार तो आत्मा है. आत्मा यदि स्वस्थ हो, सबल हो, सजग हो तो अधैर्य, अविवेक और उद्दंडता के साथ तादात्म्य नहीं करेगी. वह अपनी गरिमा में रहेगी. 

Saturday, August 30, 2014

पाना तो उसका ही है

फरवरी २००७ 
श्वास रुक जाएगी चलते चलते, शमा बुझ जाएगी जलते-जलते” भक्त जानता है, आज सेवा का अवसर मिला है कल जाने मिले या न मिले और मिले भी तो हम रहें या न रहें यह भी नहीं जानते. जब हम अपनी भावनाओं को कोमल और मृदु बना लेते हैं तो हम सहज रह सकते हैं. जिसके भीतर धैर्य रूपी रत्न और शौर्य रूपी आभूषण है वह इस जगत को और सुंदर बना सकता है. यह सारी सृष्टि उसी एक का रूप है, सभी प्राणी उसी के अंश हैं. हानि-लाभ की बात तब रहती ही नहीं, सर्वोच्च लाभ तो भक्त पहले ही पा चुका होता है  


Wednesday, January 8, 2014

वंशीधर घट घट का वासी

जून २००५ 
धैर्य खोकर हम हमारे छोटे से दुःख को भी बड़ा बना लेते हैं और धैर्य रखकर बड़े दुःख को तिलमात्र का ! हम लोगों के बारे में एकतरफा राय बना लेते हैं और उसी के अनुसार उनसे व्यवहार करते हैं, यही माया है, चीजें जैसी हैं वैसी ही दिखने लगें तभी समझना चाहिए कि माया से मुक्त हुए. हम स्वयं को कुछ ज्यादा ही महत्व देते हैं, यह दुनिया हमारे बिना भी बेहतर ढंग से चल रही थी और हमारे न होने पर भी चलती रहेगी. जब तक हमें अपना पता नहीं है तब तक जो कुछ भी हमारे साथ होता है वह हमारे लिए उस परमपिता परमेश्वर ने ही ही रच है, इस भावना से यदि हम भावित रहें तो कोई द्वंद्व नहीं होगा. मृत्यु से पहले हमें खुद को जानना है यह लक्ष्य याद रहे तो समय का सदुपयोग होगा. हमारा जीवन प्रभु की अनमोल देन  है उसी की धरोहर है यह भाव दृढ होते ही वह हमारे, प्राणों में अपनी बांसुरी के स्वर भर देता है. नयनों में अपना प्रकाश. उससे मिले कई युग बीत गये हों पर वह कभी दूर गया ही नहीं. 

Friday, October 11, 2013

यह तेरा घर यह मेरा घर

मार्च २००५ 
पांच तत्वों से मिलकर हमारा भौतिक घर बना है तथा पांच ही तत्वों से मिलकर शरीर का घर  भी बना है पर जैसे भौतिक घर स्थायी नहीं है, वैसे ही शरीर भी स्थायी नहीं है. हमारी मृत्यु के समय वह छूट जाने वाला है, हमें अपने लिए एक ऐसा घर बनाना है जो सदा उपलब्ध हो, जहाँ जीवन का कोई तूफान हिला न सके. वह घर बनाने के लिए चार तत्वों की आवश्यकता होगी, पांचवा आकाश तो अपने आप ही आ जायेगा. सर्वप्रथम मिटटी अथवा पृथ्वी होनी चाहिए सहिष्णुता की, दूसरा तत्व है जल, उसकी निर्मलता, एक प्रसन्नता जो निर्मलता से उत्पन्न हुई है. तप से प्राप्त तेज व ओज की अग्नि भी हमें चाहिए ताकि पुराने अवांछित कर्म संस्कार उसमें जल जाएँ. अनासक्ति की वायु सदा प्रवाहित हो, अनासक्त होकर हम समता को प्राप्त होते हैं, स्थिरता को प्राप्त होते हैं. ऐसे घर का निर्माण जब भीतर हम कर लेते हैं तो जीवन के झंझावातों का सामना खुले दिल से कर सकते हैं. तब भीतर समाधान मिल जाता है, भीतर कोई प्रश्न नहीं रह जाता, एक विस्मय से मन भर जाता है. 

Wednesday, February 29, 2012

मन ही तीर्थ है


जनवरी २००३ 
जहाँ धैर्य रूपी कुंड में समता रूपी जल भरा हो ऐसे मानस तीर्थ में जाने से सत्व शुद्धि होती है. बाहरी शुद्धि तो हम प्रतिदिन करते हैं, अंतर शुद्धि के लिये प्रतिदिन इस मानस तीर्थ में जाना है, जहाँ स्वयं परमात्मा हैं, संतों की वाणी है, सदगुरु का प्रेम है. मन तीर्थ हो तो तन भी मंदिर बन जाता है और तब हम मुक्ति का अनुभव करते हैं, विदेह भाव को प्राप्त होते हैं. इस क्षण भंगुर संसार की वास्तविकता खुल जाती है, मन के खेल अब लुभाते नहीं. अपेक्षा नहीं रहती, जो जीवन से मिलता है सहज स्वीकार होता है, जहाँ सर्वोपरि एक वही हो जाता है, जो इस जीवन को सुंदर बनाता है. वहीं विश्रांति है...आनंद है...प्रेम है..शुद्ध निस्वार्थ, एकांतिक, अहैतुक  प्रेम....ज्ञान है, शाश्वतता है. 

Friday, February 3, 2012

नारायण और अष्ट लक्ष्मी-साध्य और साधन



धैर्य लक्ष्मी यदि हमारे पास हो तो आध्यात्मिक मार्ग में हम विचलित नहीं होते. विद्या, धन, धैर्य, धान्य, राज, साहस, भाग्य व संकल्प ये आठ लक्ष्मियाँ हैं, हममें से सभी के पास जिनका कुछ न कुछ अंश रहता ही है. किन्तु लक्ष्मी लक्ष्य नहीं है, नारायण तक पहुंचने का साधन मात्र है. हमें लक्ष्मी को प्राप्त करना ही है यदि नारायण के पास पहुंचना है. नारायण पूर्ण है, तभी वह प्रेमस्वरूप है, उन्हें कुछ पाना नहीं है, कुछ होना नहीं है. जब हमारी चेतना पूर्ण होती है भीतर कृतज्ञता की भावना उठती है. चेतना की पूर्णता को अहंकार ही ढकता है. जब तक हम अपनी वास्तविक स्थिति से परिचित नहीं होते, कुछ न कुछ पाने की चाह बनी ही रहती है. हृदय की संपदा को भुला कर स्वयं को सुखी-दुखी करते रहते हैं. विपरीत तभी तक हमें प्रभावित करते हैं जब तक यह ज्ञान नहीं होता.