जुलाई २००३
हमारे भीतर ही गंगा है और सागर भी, मानसतीर्थ में यदि प्रवेश हो गया तो ही बाहरी
तीर्थों पर जाना सफल हुआ मानना चाहिए, तीर्थ दर्शन, व्रत आदि से अंत करण की शुद्धि
होती है, तभी भीतर ज्ञान टिकता है. यही ज्ञान हमें परमसत्ता से मिलाता है, जो
हमारे भीतर है. जब मन नहीं रहता अर्थात राग-द्वेष नहीं रहते, तो बुद्धि शुद्ध हो
जाती है, अहंकार खो जाता है तब वह परमात्मा हमें अपनी आत्मा के दर्पण में नजर आता
है. हमें अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव होता है. यह जगत एक नाटकशाला की तरह लगता
है अथवा तो स्वप्न की तरह. जो जितनी जल्दी इस परमसुख का अनुभव कर लेता है वह उतनी
ही शीघ्रता से समाज के लिये हितकारी बन सकता है, उसे तब सारे अपने ही लगते हैं.
शुद्ध प्रेम का वास उसके हृदय में होता है ऐसा प्रेम जो कभी घटता बढ़ता नहीं, वह
प्रेम भिक्षुक नहीं दाता होता है.
