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Sunday, January 17, 2021

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

 

जिस सृष्टि का निर्माण हमने ही किया है, हम उसे ही न जानें और उससे ही प्रभावित हो जाएं, यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है ! बाहर की तरह अपने भीतर हर पल हम एक वातावरण का निर्माण करते हैं जो विचारों और भावनाओं से बना है। हम ही उसका संवर्धन भी करते हैं और कुछ समय बाद उसका संहार भी कर देते हैं। हमारी सृष्टि हमारी आशाओं और आकांक्षाओं को ही तो प्रदर्शित करती है। यदि यह सुखद नहीं है तो भी हम ही इसके लिए उत्तरदायी हैं। जिसे भाग्य कहा जाता है वह एक दिन हमारे ही द्वारा किए गए पुरुषार्थ से जन्मा है।

Thursday, August 23, 2018

सुख-दुःख मन की ही कलियाँ हैं


२३ अगस्त २०१८ 
कितनी बार हमने ये शब्द नहीं सुने हैं, ‘हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं’. भाग्य का अर्थ जीवन में केवल सुखद परिस्थितियाँ आना ही तो नहीं है. जो भी हमारे साथ घट रहा है, वह सब हमारे ही द्वारा रचा गया है. सुख को तो हम स्वयं की कृति मान सकते हैं, पर दुःख का कारण  स्वयं को नहीं मानते. यही बात है कि दुःख जीवन से कभी विदा ही नहीं लेता. अनजाने में हम स्वयं ही रोज-रोज इसकी नई-नई फसल बोते रहते हैं और हर बार इसका कारण किसी न किसी पर डाल देते हैं. जीवन में किसी ने कामयाबी हासिल की तो हम उसकी मेहनत और कठोर परिश्रम के कारण उसे बधाई देते हैं, इसी तरह जब कोई अपने जीवन में असफल हुआ, अस्वस्थ हुआ और दुखी हुआ, यदि उसी क्षण वह इसकी जिम्मेदारी भाग्य पर न डालकर स्वयं पर लेने की हिम्मत दिखाए, उसी क्षण से उसका भाग्य बदलने लगता है. हमारे मन का तनाव भी खुद का बनाया हुआ है और हमारे मन का उल्लास भी हमारी ही रचना है. जीवन हर क्षण एक सा है, हमारी दृष्टि जैसी होगी वह वैसा ही दिखाई देने वाला है. किसी के पास कुछ भी न हो पर उसका मन प्रसन्न रहने की कला जानता हो तो वह अभाव का अनुभव ही नहीं करेगा. किसी के पास सब कुछ हो और मन को खिलने की कला नहीं आती हो तो वह उस सुख को भी पीड़ा में बदल सकता है.

Friday, June 2, 2017

भाग्य सदा हम स्वयं ही रचते

३ जून २०१७ 
यह जगत हमें अपनी आशाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप ही मिलता है. मन की गहराई में जैसा हम चाहते हैं, यह सृष्टि वैसा ही रूप धर कर हमारे सामने प्रस्तुत होती रहती है. हर आत्मा के पास यह क्षमता है किन्तु मानव योनि में आकर ही वह इसका लाभ उठा सकती है. भाग्य का अर्थ बस इतना सा ही है कि अतीत में हमने कुछ चाहा था, वर्तमान में वह हमें मिल रहा है.

Sunday, September 18, 2016

वर्तमान गर जाये संवर

१८ सितम्बर २०१६ 
जीवन में अगले पल क्या घटने वाला है, हमें इसकी खबर नहीं है. यही अनिश्चितता इसे अनुपम बनाती है. वास्तव में जो कुछ भी हमें मिलता है कभी न कभी हमने ही उसकी तैयारी की थी. समय के भेद के कारण हम उस वक्त समझ नहीं पाते और भाग्य मानकर कभी ख़ुशी-ख़ुशी और कभी मन मसोसकर स्वीकार कर लेते हैं. क्या ही अच्छा हो आज के बाद हम स्वयं अपने भविष्य की तस्वीर गढें, और अपनी आँखों के सामने उसे सच होता हुआ देखें. सारा अस्तित्त्व हमारी राह देख रहा है इसमें हमारा सहयोगी बनने के लिए. हर अगला पल पिछले पल से ही उपजा है हर कल आज से ही उपजने वाला है. आज इतना मधुर बना लें कि कल मधुमास बन कर सामने आये.

Thursday, August 28, 2014

कर्मों का जो राज जान ले

फरवरी २००७ 
कर्म से जन्म होता है, कर्म से मृत्यु होती है. कर्म ही हमें चलाता है. हमारा मन कल्पना से ही अपने दुःख के लिए दूसरों को दोषी मान लेता है, कभी हम भाग्य को दोष देते हैं पर कर्म का सिद्धांत कहता है कि हमें इस जन्म में जो भी परिस्थिति मिली है वह प्रारब्ध कर्मों का फल है. जो नए कर्म हम करते हैं वे भी संचित कर्मों में जमा हो जाते हैं. आत्मा अकर्ता है जब हम उसमें स्थित हो जाते हैं तो नये कर्म होते ही नहीं, पुराने भी ज्ञानाग्नि में जल जाते हैं. प्रारब्ध कर्मों का फल अवश्य मिलता है पर हम उसके भोक्ता नहीं होते. भीतर समरसता बनी रहती है बाहर चाहे जैसी परिस्थिति हो. कितना अद्भुत है ज्ञान का यह पथ. आत्मा में स्थित होने के बाद उस परम का भी ज्ञान होता है जिसका यह अंश है. सारा विषाद खो जाता है. तब असली भक्ति यानि परा भक्ति का उदय होता है. प्रेम प्रकट होता है, ऐसा प्रेम जो सारी सृष्टि की ओर बहने लगता है. सभी के भीतर तो एक ही सत्ता है, सारा जगत उसी का रचाया खेल है यह ज्ञात होने पर ही जगत निर्दोष दिखाई देने लगता है.

Thursday, March 6, 2014

सदा सजग हो करें साधना

सितम्बर २००५ 
भाग्य क्या है ? जो कर्म हम पहले कर चुके हैं उनका फल ही भाग्य के रूप में हमारे सामने आता है. अभी जो कर्म हम कर रहे हैं वही भविष्य में हमारे सामने आएंगे. प्रारब्ध में जो है वह तो हमें स्वीकारना होगा पर हम इस क्षण से सजग हो जाएँ कि नये कर्मों की फसल नहीं बोयेंगे. सर्वप्रथम तो स्वयं को देह मानने की भूल से मुक्त होना है, मन व बुद्धि के द्वार से और भीतर जाना है, स्वयं में स्थित होकर किया गया कर्म हमें बांधता नहीं है. आत्मा की अनुभूति हो जाने के बाद इस जगत से इतना ही प्रयोजन रह जाता है जितना भूख मिटने के बाद भोजन से. तब निज सुख के लिए करने जैसा कोई काम रह ही कहाँ जाता है. तब तो सहज ही कर्त्तव्य पालन होता है तथा देह को टिकाये रखने के लिए आवश्यक कर्म होते हैं. ये दोनों ही बाँधने वाले नहीं हैं. मानव की देह लेकर आना हुआ तो एक उद्देश्य था स्वयं की अनन्तता का अनुभव करना, इस उद्देश्य को पाने का साधन है देह, जगत भी साधन है. इन साधनों का उपयोग करके जिसने अपने आप को जान लिया, अपने शुद्ध, बुद्ध, मुक्त शाश्वत स्वरूप को देखकर जिसे लगा कि यही तो वह है, वही तो यह है...भीतर बाहर एक ही चेतना के दर्शन वह करता है.  


Monday, November 11, 2013

मुक्त हुआ मन भजे परम को

अप्रैल २००५ 
प्रभु प्रेम का महासागर है और मन उस प्रेम की एक लहर है, एक बूंद है, यह मन परमात्मा से मिलकर ही संतुष्टि का अनुभव करता है. जब तक वह उससे दूर है, तो भीतर एक कचोट है उठती है, वह विरह की पीड़ा है, जब वह विरह बढ़ने लगता है, प्रभु को पाने की चाह हमारे भीतर बढ़ने लगती है. जब यह चाह पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है तो परम अपने को प्रकट कर  देता है. तब हमें अपनी आत्मा का परिचय होता है, स्वयं से मिलने के बाद साधक के जीवन में केवल एक ही कार्य शेष रह जाता है, वह है प्रेम, उसके लिए जगत में एक ही वस्तु रह जाती है वह है परमात्मा, ईश्वर और प्रेम दो नहीं हैं, एक के ही दो नाम हैं ठीक उसी तरह जैसे भाग्य और पुरुषार्थ दो नहीं हैं एक हैं, हमारे पूर्व में किया गया कार्य यानि पुरुषार्थ ही वर्तमान में भाग्य बनकर सामने आ जाता है. वैसे ही जीवन में ईश्वर हो तो प्रेम स्वतः ही पनपता है और प्रेम प्रकट हो जाये तो ईश्वर स्वयं ही खींचे चले जाते हैं. मन मयूर तब नृत्य कर उठता है, भीतर कोई रस फूट पड़ता है, मस्ती की लहर हिलोरे लेती है. रोम-रोम में उस राम का नाम प्रतीत होता है. जीवन का शुभारम्भ वास्तव में तभी से होता है, उसके पूर्व तो मन, इन्द्रियों का गुलाम था, सदा अधीन रहता था, पराधीन को सुख कहाँ, जोमुक्त है वही सुखी है, मुक्ति ही भक्ति है.


Friday, February 3, 2012

नारायण और अष्ट लक्ष्मी-साध्य और साधन



धैर्य लक्ष्मी यदि हमारे पास हो तो आध्यात्मिक मार्ग में हम विचलित नहीं होते. विद्या, धन, धैर्य, धान्य, राज, साहस, भाग्य व संकल्प ये आठ लक्ष्मियाँ हैं, हममें से सभी के पास जिनका कुछ न कुछ अंश रहता ही है. किन्तु लक्ष्मी लक्ष्य नहीं है, नारायण तक पहुंचने का साधन मात्र है. हमें लक्ष्मी को प्राप्त करना ही है यदि नारायण के पास पहुंचना है. नारायण पूर्ण है, तभी वह प्रेमस्वरूप है, उन्हें कुछ पाना नहीं है, कुछ होना नहीं है. जब हमारी चेतना पूर्ण होती है भीतर कृतज्ञता की भावना उठती है. चेतना की पूर्णता को अहंकार ही ढकता है. जब तक हम अपनी वास्तविक स्थिति से परिचित नहीं होते, कुछ न कुछ पाने की चाह बनी ही रहती है. हृदय की संपदा को भुला कर स्वयं को सुखी-दुखी करते रहते हैं. विपरीत तभी तक हमें प्रभावित करते हैं जब तक यह ज्ञान नहीं होता.