अप्रैल २००५
प्रभु प्रेम
का महासागर है और मन उस प्रेम की एक लहर है, एक बूंद है, यह मन परमात्मा से मिलकर
ही संतुष्टि का अनुभव करता है. जब तक वह उससे दूर है, तो भीतर एक कचोट है उठती है,
वह विरह की पीड़ा है, जब वह विरह बढ़ने लगता है, प्रभु को पाने की चाह हमारे भीतर
बढ़ने लगती है. जब यह चाह पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है तो परम अपने को प्रकट कर देता है. तब हमें अपनी आत्मा का परिचय होता है,
स्वयं से मिलने के बाद साधक के जीवन में केवल एक ही कार्य शेष रह जाता है, वह है
प्रेम, उसके लिए जगत में एक ही वस्तु रह जाती है वह है परमात्मा, ईश्वर और प्रेम
दो नहीं हैं, एक के ही दो नाम हैं ठीक उसी तरह जैसे भाग्य और पुरुषार्थ दो नहीं
हैं एक हैं, हमारे पूर्व में किया गया कार्य यानि पुरुषार्थ ही वर्तमान में भाग्य
बनकर सामने आ जाता है. वैसे ही जीवन में ईश्वर हो तो प्रेम स्वतः ही पनपता है और
प्रेम प्रकट हो जाये तो ईश्वर स्वयं ही खींचे चले जाते हैं. मन मयूर तब नृत्य कर
उठता है, भीतर कोई रस फूट पड़ता है, मस्ती की लहर हिलोरे लेती है. रोम-रोम में उस
राम का नाम प्रतीत होता है. जीवन का शुभारम्भ वास्तव में तभी से होता है, उसके
पूर्व तो मन, इन्द्रियों का गुलाम था, सदा अधीन रहता था, पराधीन को सुख कहाँ,
जोमुक्त है वही सुखी है, मुक्ति ही भक्ति है.