प्रारब्ध ने हमें जो भी दिया है उसे सहर्ष स्वीकार करके हम जीवन को जीते हैं तो कई मुश्किलों से सहज ही बचे रहते हैं। जो भी बीज हमने अतीत में बोए हैं उनकी फसल हमें ही काटनी होगी। जिस मन में राग जगाया था, उसी में द्वेष की दीवार भी अपने आप खड़ी हो जाती है, जिसे हमें ही पाटना होगा। कोई भी कर्म देर-सवेर अपना फल दिए बिना नहीं मिटता है। जो भी हमें मिला है यदि उसे सबके साथ साझा करने की मंशा के साथ जीवन को जिएँ तो यह स्वतः ही सुंदर बन जाता है। एक परम शक्ति जो परम ज्ञानमयी भी है सदा ही इस सृष्टि का लालन-पालन कर रही है, उसका हाथ सदा ही हमारे सिर पर है, वह हमसे दूर नहीं है, इतना भरोसा मन में रखकर यदि हम जीवन के पथ पर कदम रखते हैं तो हर बाधा अपने आप ही मिट जाती है। अपने अंतर की गहराई में जाकर ही सच्चे जीवन से परिचय होता है और तब यह ज्ञान होता कि दुःख के बीज बोना या सुख के बीज बोना हमारे अपने हाथ में है। सजग होकर जीने की कला जिसने सीख ली है वही योग को प्राप्त हो सकता है।
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Sunday, July 11, 2021
Monday, February 11, 2019
रस का स्रोत मिलेगा भीतर
११ फरवरी २०१९
जन्म, आयु व भोग हमें
प्रारब्ध के अनुसार मिलते हैं, इनके द्वारा हमें सुख-दुःख दोनों मिल सकते हैं किन्तु
हम कितना सुख-दुःख भोगते हैं, यह वर्तमान के पुरुषार्थ पर निर्भर करता है. हमें
सुख-दुःख दोनों में जागना है. अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष व अभिनिवेश, ये पांच
क्लेश जब तक हैं, तभी तक कर्म हमें बांधते हैं. हमें क्लेश के संस्कारों को दग्ध
बीज करना है. अविद्या अर्थात अज्ञान का अर्थ है हमें स्वयं के सत्य स्वरूप का
ज्ञान न होना. अस्मिता का अर्थ है स्वयं को बुद्धि के साथ एक मानना. सुख की
अभिलाषा ही राग है और दुःख से बचने की आकांक्षा ही द्वेष है. मृत्यु का भय ही
अभिनिवेश है. यदि हम दुःख का भी स्वागत करें तो उसका प्रभाव कैसे हमें दुखी कर
सकता है. स्वयं को जान कर हम आनंद के स्रोत से जुड़ जाते हैं, सो सुख की चाह अपने
आप ही गिर जाती है. बुद्धि के पार जाकर ही कोई भावना के अमृत को चख सकता है. ऐसे
साधक को मृत्यु का भय भी नहीं सताता.
Thursday, November 16, 2017
वर्तमान में सजग रहे जो
१६ नवम्बर २०१७
वर्तमान के कर्मों द्वारा हम
प्रारब्ध के कर्मों को बदल सकते हैं. जन्म, आयु, और भोग हमें प्रारब्ध के अनुसार
मिलते हैं, किन्तु हम कितना सुख-दुःख भोगते हैं, वह वर्तमान के पुरुषार्थ पर
निर्भर करता है. किसी व्यक्ति को छोटा सा कष्ट भी अत्यधिक दुःख दे सकता है, और कोई
बड़ा रोग होने पर भी शांति से उसे दूर करने की चेष्टा करता है. हमारे हर कर्म का फल
किसी न किसी रूप में सम्मुख आने ही वाला है, यह जानते हुआ साधक वर्तमान के कर्मों
के प्रति सजग रहता है. प्राप्त हुए दुःख को अपने ही किसी पूर्व कर्म के कारण आया
जानकर वह अपने दुःख के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराता.
Tuesday, August 4, 2015
सुख सपना दुःख बुलबुला
प्रारब्ध वश सुख-दुःख तो हमें मिलने ही वाले हैं, सुख आने पर यदि अभिमान आ गया तो नया
कर्म बना लिया जिसका फल भविष्य में दुःख रूप में आएगा, दुःख आने पर यदि दुखी हो
गये तो भी नया बीज डाल दिया जिसका परिणाम दुख आने ही वाला है. साधक को चाहिए कि
दोनों ही स्थितियों में सम रहे, वे जैसे आये हैं वैसे ही चले जायेंगे, नया कर्म बंधेगा
नहीं, वर्तमान भी सुधर गया और भविष्य भी. समता का अभ्यास नियमित ‘ध्यान’ करके किया
जा सकता है.
Thursday, December 11, 2014
भीतर जिसको मिला ठिकाना
जुलाई २००७
‘रहो भीतर, जीओ बाहर’ यह ध्यान का
सूत्र है. आत्मज्ञान होने पर साधक भीतर रहना सीख जाता है. ‘भीतर’ हमें सारे दुखों
से मुक्त करके आश्रय देता है. जब तक भीतर कोई केंद्र नहीं है, कोई वहाँ टिके भी तो
कैसे. हम वास्तव में परमात्मा का अंश हैं इसे भुलाकर मन, बुद्धि तथा देह को ही
सत्य मानकर उनके सुख-दुःख में लिप्त होते रहते हैं. वे हमें साधन रूप में मिले
हैं, पर हम इन्हें ही साध्य मान लेते हैं, उनको संतुष्ट करना ही अपना लक्ष्य बना
लेते हैं. जबकि आत्मा ही साध्य है. इस संसार में जो कुछ भी हमें मिला है, कर्मों
के अनुसार ही मिला है, उनमें राग-द्वेष करने से हम नये कर्म बांधेंगे, यदि समता में
रहेंगे तो शांति से उन कर्मों को करेंगे जो हमारे प्रारब्ध में हैं तथा नये कर्म
करने पर कर्ता भाव से मुक्त रहेंगे.
Thursday, August 28, 2014
कर्मों का जो राज जान ले
फरवरी २००७
कर्म से जन्म होता है, कर्म से मृत्यु होती है. कर्म ही हमें चलाता
है. हमारा मन कल्पना से ही अपने दुःख के लिए दूसरों को दोषी मान लेता है, कभी हम
भाग्य को दोष देते हैं पर कर्म का सिद्धांत कहता है कि हमें इस जन्म में जो भी
परिस्थिति मिली है वह प्रारब्ध कर्मों का फल है. जो नए कर्म हम करते हैं वे भी
संचित कर्मों में जमा हो जाते हैं. आत्मा अकर्ता है जब हम उसमें स्थित हो जाते हैं
तो नये कर्म होते ही नहीं, पुराने भी ज्ञानाग्नि में जल जाते हैं. प्रारब्ध कर्मों
का फल अवश्य मिलता है पर हम उसके भोक्ता नहीं होते. भीतर समरसता बनी रहती है बाहर
चाहे जैसी परिस्थिति हो. कितना अद्भुत है ज्ञान का यह पथ. आत्मा में स्थित होने के
बाद उस परम का भी ज्ञान होता है जिसका यह अंश है. सारा विषाद खो जाता है. तब असली
भक्ति यानि परा भक्ति का उदय होता है. प्रेम प्रकट होता है, ऐसा प्रेम जो सारी
सृष्टि की ओर बहने लगता है. सभी के भीतर तो एक ही सत्ता है, सारा जगत उसी का रचाया
खेल है यह ज्ञात होने पर ही जगत निर्दोष दिखाई देने लगता है.
Sunday, January 5, 2014
तेरा तुझको अर्पण
जून २००५
ईश्वर
प्राप्ति के लिए हमारे मन में जब दृढ़ता नहीं रहती, तभी नियम में हम स्थिर नहीं हो
पाते. मन में तड़प हो, छटपटाहट हो तभी उसका स्मरण सदा रहेगा. मोह-ममता मिटाने के
लिए ईश्वर हमारे जीवन में कई परिस्थितयों का निर्माण करते हैं. हमें अपने मन की
समता बनाये रखनी है, हर सुख-दुःख को समर्पित करना है. तीनों तापों से बचने का यही
उपाय है. जो अपने भीतर संतुष्ट रहता है, उसकी समस्त कामनाओं का स्वतः ही परिमार्जन
हो जाता है अर्थात अनावश्यक जीवन से झर जाता है. वह इस जीवन में फिर सहज हुआ प्रारब्ध
के अनुसार अपना समय बिताता है. उसकी दौड़ समाप्त हो जाती है, कुछ करने व पाने की
आशा उसे अब नचाती नहीं. वह जीते जी मुक्त हो जाता है. उसका न कोई शत्रु है न कोई
मित्र, सारे द्वन्द्वों से पार हुआ वह अपने आप में अर्थात आत्मा में ही तुष्ट रहता
है. जगत उसके लिए स्वप्न वत् अथवा क्रीडांगन हो जाता है. वह जीवभाव से मुक्त होकर
आत्मभाव में निमग्न रहता है.
Tuesday, November 19, 2013
भाव शुद्धि सत्व शुद्धि....
अप्रैल २००५
संचित कर्म,
प्रारब्ध कर्म तथा क्रियमाण कर्म, ये तीन प्रकार के कर्म हैं जो जीव के साथ सदा
रहते हैं जब तक उसे भगवद् प्राप्ति न हो जाये. संचित कर्म वे हैं जो हमने जन्मों-जन्मों
में एकत्र किये हैं, उन्हीं में से कुछ कर्मों को प्रारब्ध बनाकर हम इस दुनिया में
भेजे जाते हैं, क्रियमाण वे कर्म हैं जो जन्म से मृत्यु तक हम अपनी इच्छा से करते
हैं. इन कर्मों को करते हुए हम पुनः संचित कर्म एकत्र करते जाते हैं. किसी कार्य
को करते समय हमारी भावना जैसी होगि वही उसका वास्तविक रूप होगा, बाहरी रूप से चाहे
हम कितना भी अच्छा व्यवहार दिखाएँ पर यदि भावना बिगड़ी हुई है तो हमारा कर्म अशुद्ध
ही माना जायेगा. भीतर का भाव बिगड़ते ही हम स्वयं को कर्म बंधन में बांध लेते हैं.
बाहर तो परिणाम नजर आता है कारण भीतर होता है. परिणाम तो नष्ट हो जाता है पर कारण बीजरूप
में बना रहता है, फिर वह प्रारब्ध कर्म बन कर कभी भी आ सकता है. हम क्रियमाण
कर्मों को करने में स्वतंत्र हैं, अपने मन, बुद्धि, विचारों, भावनाओं तथा वाणी को
पवित्र रखने में स्वतंत्र हैं, हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं. सजग व्यक्ति कभी भी खुद को कर्म बंधन में नहीं
बांधते. जब हमारा लक्ष्य मुक्ति है तो अपने ही हाथों स्वयं को क्यों बाँधें.
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