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Tuesday, June 27, 2023

जिसने भेद स्वयं का जाना

संत व शास्त्र कहते हैं, विद्यामाया  विशिष्ट चेतन के कारण ब्रह्म ईश्वर की उपाधि  ग्रहण करता है और अविद्यामाया विशिष्ट चेतन के कारण ब्रह्म जीव की उपाधि ग्रहण करता है। जीव और ईश्वर का एकत्व उनके ब्रह्म होने में है और भेद विद्या और अविद्या के कारण है। ईश्वर माया का अधिपति है और जीव माया का सेवक है। ईश्वर योगमाया  का उपयोग करके जगत का कल्याण करता है, जीव महामाया के वशीभूत होकर विकारों से ग्रस्त हो जाता है। ईश्वर सदा अपने चैतन्य स्वरूप को जानता है, जीव स्वयं को जड़ देह और मन आदि मान लेता है। जिस क्षण जीव को अपने ब्रह्म होने का भान हो जाता है, वह ईश्वर से जुड़ जाता है।  


Sunday, July 12, 2020

निज स्वरूप को जाना जिसने

अविद्या का आवरण हमारे स्वरूप को हमें देखने नहीं देता. देह, मन, बुद्धि को ‘मैं’ मानना ही अविद्या है. हम स्वयं को जैसा मानेंगे वैसा ही अपना स्वरूप हमें प्रतीत होगा. यदि हम देह को ही मैं मानते हैं तो सदा ही भयभीत रहेंगे, क्योंकि देह निरन्तर बदल रही है और एक दिन मिट जाएगी. यदि मन को अपना स्वरूप मानते हैं तो सदा ही कम्पित होते रहेंगे क्योंकि मन भी इस निरंतर बदलते हुए संसार से ही बना है, जैसा वातावरण, जैसे शिक्षा उसे मिलती है वह उसी को सत्य मानकर उसी के अनुसार चलता है. जब हम बुद्धि को ही अपना स्वरूप मानेंगे तो सदा ही मान-अपमान के द्वंद्व में फंसे रहेंगे क्योंकि अपनी बुद्धि से उपजे विचार, धारणा आदि को ही हम सत्य मानेंगे और दूसरों के विचारों से मतभेद पग-पग पर होता ही रहेगा. इसके साथ-साथ ही देह, मन और बुद्धि से किये गए कार्यों का हमें अभिमान भी बना रहेगा. 

Monday, February 11, 2019

रस का स्रोत मिलेगा भीतर


११ फरवरी २०१९ 
जन्म, आयु व भोग हमें प्रारब्ध के अनुसार मिलते हैं, इनके द्वारा हमें सुख-दुःख दोनों मिल सकते हैं किन्तु हम कितना सुख-दुःख भोगते हैं, यह वर्तमान के पुरुषार्थ पर निर्भर करता है. हमें सुख-दुःख दोनों में जागना है. अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष व अभिनिवेश, ये पांच क्लेश जब तक हैं, तभी तक कर्म हमें बांधते हैं. हमें क्लेश के संस्कारों को दग्ध बीज करना है. अविद्या अर्थात अज्ञान का अर्थ है हमें स्वयं के सत्य स्वरूप का ज्ञान न होना. अस्मिता का अर्थ है स्वयं को बुद्धि के साथ एक मानना. सुख की अभिलाषा ही राग है और दुःख से बचने की आकांक्षा ही द्वेष है. मृत्यु का भय ही अभिनिवेश है. यदि हम दुःख का भी स्वागत करें तो उसका प्रभाव कैसे हमें दुखी कर सकता है. स्वयं को जान कर हम आनंद के स्रोत से जुड़ जाते हैं, सो सुख की चाह अपने आप ही गिर जाती है. बुद्धि के पार जाकर ही कोई भावना के अमृत को चख सकता है. ऐसे साधक को मृत्यु का भय भी नहीं सताता.

Tuesday, April 18, 2017

जीवन का जो मर्म जान ले

१९ अप्रैल २०१७ 
यह संसार हमें मिला है ताकि हम त्रिविध दुखों से बच सकें. आदिभौतिक, आदिदैविक व आध्यात्मिक दुखों से पूर्ण मुक्ति के लिए ही यह जीवन हमें मिला है. जब तक यह ज्ञान हमें नहीं है, तब तक हम नये-नये दुखों का निर्माण करते रहते हैं. पतंजलि के अनुसार अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश इन पंच क्लेशों से घिरे रहकर हम कभी भी दुखों से मुक्त नहीं हो सकते. अविद्या का अर्थ है अनात्म को आत्म मानना, अर्थात जो हम नहीं हैं उसे अपना स्वरूप मानना. अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध मानना, दुःख को सुख मानना भी अविद्या है. अविद्या सभी क्लेशों का मूल कारण है। दूसरे शब्दों में अविद्या भ्रांत ज्ञान है. अस्मिता का अर्थ है स्वयं को अर्थात्‌ अहंकार बुद्धि और आत्मा को एक मान लेना. ‘मैं’ और ‘मेरा’ की अनुभूति का ही नाम अस्मिता है। सुख और उसके साधनों के प्रति आकर्षण, तृष्णा और लोभ का नाम राग है. चौथा क्लेश द्वेष है। दु:ख या दु:ख जनक वृत्तियों के प्रति क्रोध की जो अनुभूति होती हैं उसी का नाम द्वेष है। क्रोध की भावना तभी जाग्रत होती है जब किसी व्यक्ति अथवा वस्तु को अनुचित अथवा अपने प्रतिकूल मान लेते हैं। जो सहज अथवा स्वाभाविक क्लेश सभी को समान रूप से होता है वह पाँचवा क्लेश अभिनिवेश है। सभी की आकांक्षा रही है कि उसका नाश न हो, वह चिरंजीवी रहे। इसी जिजीविषा के वशीभूत होकर हम न्याय अन्याय, कर्म कुकर्म सभी कुछ करते है और विचार न कर पाने के कारण नित्य नए क्लेशों में बँधते जाते हैं।



Thursday, December 15, 2016

कर्म बनें न बन्धनकारी


१६ दिसंबर २०१६ 

अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष  और अभिनिवेश ये पंच क्लेश हैं जो हमें बांधते हैं. मन जब इनमें से किसी भी वृत्ति में रहता है तो कर्माशय बनता है अर्थात उस समय किये जाने वाला हर कर्म बन्धन का कारण होता है. यहाँ कर्म मनसा, वाचा, कर्मणा कोई भी हो सकता है. कर्म पाप अथवा पुण्य कारी  कोई भी हो सकता है. जिस तरह पाप कर्म बन्धन कारी हैं उसी तरह पुण्य कर्म भी हमें सुख भोग के लिए जगत में लाते हैं. हर वृत्ति संस्कार को जन्म देती है और फिर उसी संस्कार से उसी तरह की वृत्ति का जन्म होता है और हम एक चक्र में फंस जाते हैं, इसे ही जन्म-मरण के चक्र के रूप में शास्त्रों में कहा गया है. मन यदि एकाग्र अवस्था में रहे अथवा तो निरुद्ध अवस्था में तब ही मन क्लेशों से उत्पन्न वृत्ति से रहित होता है, अर्थात कर्माशय नहीं बनता। नियमित ध्यान करने से ही इस स्थिति तक पहुँचा जा सकता है. 

Friday, December 27, 2013

सत्यं परम धीमही

जून २००५ 
हमारा भीतर जब तक बिगड़ा है, बाहर भी बिगड़ा रहेगा. झुंझलाहट, अहंकार, कठोर वाणी, अवमानना तथा प्रमाद ये सारे अवगुण बाहर दिखाई देते हैं पर इनका स्रोत भीतर है, भीतर का रस सूख गया है, सत्संग का पानी डालने से भक्ति की बेल हरी-भरी होगी फिर रसीले फल लगेंगे ही. संसार का चिन्तन अधिक होगा तो उसी के अनुपात में तीन ताप भी अधिक जलाएंगे. प्रभु का चिन्तन होगा तो माधुर्य, संतोष, ऐश्वर्य तथा आत्मिक सौन्दर्य रूपी फूल खिलेंगे. कितना सीधा-सीधा हिसाब है. अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष तथा अभिनिवेश आदि क्लेश हमें सताते हैं. आत्मज्ञान न होना, अहंकार, मृत्यु से भय तथा मोह इन्हीं के कारण हैं. बुद्धि जब तक सात्विक नहीं होगी, दृढ निश्चय वाली नहीं होगी तब तक इनके शिकार हम होते ही रहेंगे. ईश्वर से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे.

Wednesday, March 6, 2013

जो तुझ भावे सो भली


मई २००४ 
विद्या माया से अविद्या माया तो नष्ट हो जाती है, पर सत्वगुण विद्या माया में ही छिपा है, उसे नष्ट करने के लिए ज्ञान पर्याप्त नहीं है, वह केवल ईश्वर की शरण में जाकर ही नष्ट हो सकती है, उसकी कृपा हम पर हर क्षण बरस रही है. हमारे मन में न जाने कितने-कितने संस्कार दबे हैं, जो वक्त आने पर प्रकट होते हैं यदि हम शरणागत हैं तो प्रारब्ध को हँसते-हँसते स्वीकार करते हैं. स्वीकार करते ही उसका अहैतुक, निस्वार्थ प्रेम हमें छू जाता है. धर्म के अनुभव का एक ही अर्थ है कि परमात्मा है और हमसे बहुत प्रेम करता है, यह अस्तित्त्व हमारा अपना है, सदा हमें प्रसन्न देखना चाहता है. प्रतिपल जीवन उत्सव तभी बन सकता है, जब यह सारा जगत अपना लगता है.