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Thursday, December 15, 2016

कर्म बनें न बन्धनकारी


१६ दिसंबर २०१६ 

अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष  और अभिनिवेश ये पंच क्लेश हैं जो हमें बांधते हैं. मन जब इनमें से किसी भी वृत्ति में रहता है तो कर्माशय बनता है अर्थात उस समय किये जाने वाला हर कर्म बन्धन का कारण होता है. यहाँ कर्म मनसा, वाचा, कर्मणा कोई भी हो सकता है. कर्म पाप अथवा पुण्य कारी  कोई भी हो सकता है. जिस तरह पाप कर्म बन्धन कारी हैं उसी तरह पुण्य कर्म भी हमें सुख भोग के लिए जगत में लाते हैं. हर वृत्ति संस्कार को जन्म देती है और फिर उसी संस्कार से उसी तरह की वृत्ति का जन्म होता है और हम एक चक्र में फंस जाते हैं, इसे ही जन्म-मरण के चक्र के रूप में शास्त्रों में कहा गया है. मन यदि एकाग्र अवस्था में रहे अथवा तो निरुद्ध अवस्था में तब ही मन क्लेशों से उत्पन्न वृत्ति से रहित होता है, अर्थात कर्माशय नहीं बनता। नियमित ध्यान करने से ही इस स्थिति तक पहुँचा जा सकता है. 

Monday, January 19, 2015

झूठे हैं ये सारे बंधन

सितम्बर २००७ 
हम स्वयं ही अपने दुखों का विस्तार करते हैं. यदि हम संसार को छोड़ने पर राजी हो जाएँ तो मुक्त तो हैं ही. हमें भ्रम होता है कि जगत ने बाँध रखा है, यदि एक बार तोड़ दें उस काल्पनिक बंधन को तो हम मुक्त हो सकते हैं. हमें डर लगता है कि संसार को छोड़ दें तो कहाँ जायेंगे. हमें पकड़े रहने में जगत को प्रयोजन भी क्या है, हम क्या इतने मूल्यवान हैं कि दुःख हमारी ओर आयें. यह जगत की व्यवस्था हमारे लिए तो नहीं चल रही है, भ्रान्ति है और यह भ्रान्ति होती है मानव को. मानव शिशु जब जन्मता है कमजोर होता है, माँ-बाप तथा परिवार के सभी सदस्य उसके आगे-पीछे घूमते हैं. इस बच्चे को सिखाना पड़ता है, संस्कार देने पड़ते हैं. उस पर सभी ध्यान देते हैं तो उसके भीतर एक भ्रम पैदा हो जाता है कि वही केंद्र है. सारी व्यवस्था उसके ही लिए रची गयी है, लेकिन बड़े होने तक यही भ्रान्ति चलती रहती है. यही अहंकार है. अहंकार को छोड़ने पर ही आत्मज्ञान पाया जा सकता है. जो एक झूठे केंद्र को मानकर चलता है वह भीतर के सच्चे केंद्र को पाने से वंचित रह जाता है. अहंकार दूसरों पर आधारित है, दूसरों का मत उसका ही संग्रह हमारी अस्मिता है. दूसरे कभी अच्छा कहते हैं, कभी बुरा, अहंकार वश हम जीते चले जाते हैं.