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Friday, March 8, 2024

शुभता को मन करे वरण

संतजन कहते हैं, जो अपने लिये सत्यं, शिवं और सुन्दरं के अलावा कुछ नहीं चाहता, प्रकृति भी उसके लिये अपने नियम बदलने को तैयार हो जाती है. जो अपने ‘स्व’ का विस्तार करता जाता है, जैसे-जैसे अपने निहित स्वार्थ को त्यागता जाता है, वैसे-वैसे उसका सामर्थ्य बढ़ता जाता है. अस्तित्त्व पर निर्भर रहें तो कोई फ़िक्र वैसे भी नहीं रह जाती क्योंकि वह हर क्षण हमारे कुशल-क्षेम का भार वहन करता है. जैसे एक नन्हा बालक अपनी सुरक्षा के लिये माँ पर निर्भर करता है, हमारे सभी कार्य यदि हम उस पर निर्भर रहते हुए करेंगे तो उनके परिणाम से बंधेंगे नहीं. हम जो भी करें उसका हेतु सत्य प्राप्ति हो तो सामान्य कार्य भी भक्ति ही बन जाते हैं. एक मात्र ईश्वर ही हमारे प्रेम का केन्द्र हो, जो कहना है उसे ही कहें. अन्यों से प्रेम हो भी तो उसी के प्रति प्रेम का प्रतिबिम्ब हो. परमात्मा की कृपा जब हम पर बरसती है तो अपने ही अंतर से बयार बहती है. तब अंतर में तितलियाँ उड़ान भरती हैं. अंतर की खुशी बेसाख्ता बाहर छलकती है. ऐसा प्रेम अपनी सुगन्धि अपने आप बिखेरता है. दुनिया का सौंदर्य जब उसके सौंदर्य के आगे फीका पड़ने लगे, उस “सत्यं शिवं सुन्दरं” की आकांक्षा इतनी बलवती हो जाये, उसके स्वागत के लिए तैयारी अच्छी हो तो उसे आना ही पडेगा. अंतर की भूमि इतनी पावन हो कि वह उस पर अपने कदम रखे बिना रह ही न पाए. रामरस के बिना हृदय की तृष्णा नहीं मिटती. परम प्रेम हमारा स्वाभाविक गुण है, उससे च्युत होकर हम संसार में आसक्त होते हैं. कृष्ण का सौंदर्य, शिव की सौम्यता, और राम का रस जिसे मिला हो वही धनवान है. जिस प्रकार धरती में सभी फल, फूल व वनस्पतियों का रस, गंध व रूप छिपा है वैसे ही उस परमात्मा में सभी सदगुण, प्रेम, बल, ओज, आनंद व ज्ञान छिपा है, संसार में जो कुछ भी शुभ है वह उस में है तो यदि हम स्वयं को उससे जोड़ते हैं, प्रेम का संबंध बनाते हैं तो वह हमें इस शुभ से मालामाल कर देता है, दुःख हमसे स्वयं ही दूर भागता है, मन स्थिर होता है. धीरे धीरे हृदय समाधिस्थ होता  है. एक बार उसकी ओर यात्रा शुरू कर दी हो तो पीछे लौटना नहीं होता...दिव्य आनंद हमारे साथ होता है और तब यह जीवन एक उत्सव बन जाता है.


Wednesday, August 23, 2023

पुरुषार्थ का करे जो साधन

भारतीय प्राचीन शास्त्रों के अनुसार मानव के चार पुरुषार्थ हैं, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। चारों की प्राप्ति के लिए किए गये प्रयत्न हमें परमात्मा की ओर ले जाते हैं। भगवान कृष्ण ने गीता में ज्ञान को भगवद प्राप्ति का एक मार्ग बताया है। धर्म का पालन करते हुए ही मानव अंततः ज्ञान का अधिकारी बनता है।परमात्मा आनंद स्वरूप है और ज्ञान से बढ़कर आनंद का प्रदाता और कौन हो सकता है। ज्ञान चाहे जगत के रहस्यों का हो या मन की गहराई में छिपे अपने स्वरूप का हो, दोनों ही मन को प्रेम और शांति से भर देते हैं। दूसरा पुरुषार्थ है अर्थ,  जिसकी प्राप्ति श्रम पूर्वक कर्म करने से होती है। यह कर्मयोग का मार्ग बन सकता है। यदि मानव धर्म पूर्वक अर्थ का उपार्जन करे तो समाज-संसार में अन्यों के लिए व अपने लिए भी वह आनंद प्राप्ति का कारण बन सकता है। बड़े-बड़े धनपति हों या कोई भी व्यक्ति जो अपने भीतर जिस विशालता का अनुभव करते हैं, और अपने धन का उपयोग समाज की भलाई के लिए करते हैं, वह उन्हें परम की  निकटता अनुभव कराता है। उन्हें लगता है सारा संसार ही उनका अपना हो गया है। तीसरे पुरुषार्थ काम का मार्ग भक्ति का मार्ग है। यहाँ साधक प्रकृति के सृष्टि चक्र में सहायता करने हेतु गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए सात्विक उपायों से धन का उपार्जन करता है।एक ऐसा घर जहां सन्तान वात्सलय, प्रेम, स्नेह, आदर सभी का अनुभव करते हुए बड़ी होती है, भक्ति के पथ पर अपने आप ही पहुँच जाती है।अपने व दूसरों के हित के लिए की गई कामनाओं की पूर्ति आनंद प्रदान करती है, और परमात्मा आनंद स्वरूप है। कोई भी व्यक्ति अंतिम साधन मोक्ष तक तभी पहुँचता है जब पहले के तीनों का अनुभव कर चुका हो।जीवन में रहते हुए भी कमलवत् साक्षी भाव में रहना ही जीते जी मोक्ष प्राप्त करना है। यह आनंद की सहज अवस्था है।   


Sunday, July 2, 2023

गुरु ज्ञान जीवन में आये

सद्गुरु कहते हैं जीवन गुरूतत्व से सदा ही घिरा है. गुरु ज्ञान का ही दूसरा नाम है. अपने जीवन पर प्रकाश डालकर हमें ज्ञान का सम्मान करना है, अर्थात सही-गलत का भेद जानकर जीवन में आने वाले दुखों से सीखकर ज्ञान को धारण करना है, ताकि पुनः वे दुःख न झेलने पड़ें. मन ही माया को रचता है और अपने बनाये हुए लेंस से दुनिया को देखता है. साधक वह है जो कोई आग्रह नहीं रखता न ही प्रदर्शन करता है. देने वाला दिए जा रहा है, झोली भरती ही जाती है. हमें वाणी का वरदान भी मिला है और मेधा भी बांटी है उसने. यदि उसे सेवा में लगायें जीवन तब सार्थक होता जाता है. भक्ति और कृतज्ञता के भाव पुष्प जब भीतर खिलते हैं, मन चन्द्रमा सा खिल जाता है, गुरु पूर्णिमा तब मनती है. 

Tuesday, May 24, 2022

भक्ति करे कोई सूरमा

 हृदय में परम भक्ति का उदय होना एक अनोखी घटना है. जो भी किसी कामना से भगवान की पूजा करते हैं, मन्दिर जाते हैं, वे यदि सोचें कि उनके भीतर ईश्वर के प्रति भक्ति है तो यह गौणी भक्ति कही जा सकती है. एक और भक्ति है जो उस अनुभव के बाद उत्पन्न होती है जब भक्त और भगवान आत्मिक स्तर पर जुड़ जाते हैं. भौतिक दूरी तब कोई महत्व नहीं रखती. मीरा हजारों साल के अंतराल के बाद भी कृष्ण का दर्शन कर लेती है. शिष्य हजारों मील दूर होते हुए भी गुरू की कृपा का अनुभव करते हैं. बुद्धि और भावनाओं से भी परे जाकर उस अलौकिक भक्ति को पाया जा सकता है. मानव देह में घटने वाली यह सर्वोत्तम घटता कही जा सकती है. कृष्ण कहते हैं, मुझे ज्ञानी भक्त प्रिय है क्योंकि वह मेरा ही स्वरूप है. ऐसा महात्मा साक्षात ईश्वर स्वरूप ही हो जाता है. वह संसार को अपने जीवन से अनमोल ज्ञान, प्रेम और शांति देता है. वह दुखी, तनाव ग्रस्त लोगों को जीने का मार्ग दिखाता है. उसका होना ही जगत के लिए एक वरदान बन जाता है. जब मन हर तरह के स्वार्थ से ऊपर उठ चुका हो और केवल लोक संग्रह ही एक मात्र उद्देश्य रह जाये तब इस भक्ति का जन्म होता है. भरत देश में समय-समय पर ऐसी महान आत्माएं जन्म लेती हैं जो भक्ति के परम स्वरूप को प्रकट करती हैं. 

Monday, February 21, 2022

भक्ति करे कोई सूरमा

संत कहते हैं, मानव के मन के भीतर आश्चर्यों का खजाना है, हजारों रहस्य छुपे हैं आत्मा में. जो कुछ बाहर है वह सब भीतर भी है. मानव यदि परमात्मा को भूल भी जाये तो वह किसी न किसी उपाय से याद दिला देता है. एक बार कोई उससे प्रेम करे तो वह कभी साथ नहीं छोड़ता. वह असीम धैर्यवान है, वह सदा सब पर नजर रखे हुए है, साथ है, उन्हें बस नजर भर कर देखना है. उसे देखना भी हरेक के लिए बहुत निजी है, बस मन ही मन उसे चाहना है, कोई ऊपर से जान भी न पाए और उससे मिला जा सकता है. उसके लिए अनेक शास्त्रों को पढ़ने की जरूरत नहीं, कठोर तप करने की जरूरत नहीं, बस भीतर प्रेम जगाने की जरूरत है. सच्चा प्रेम, सहज प्रेम, सत्य के लिए, भलाई के लिए, सृष्टि के लिए, अपने लिए और परमात्मा के लिए..जिस प्रेम में कभी परदोष देखने की भावना नहीं होती, कोई अपेक्षा नहीं होती, जो सदा एक सा रहता है, वह शुद्ध प्रेम है, वही भक्ति है. जिस प्रेम में अपेक्षा हो वह सिवाय दुःख के क्या दे सकता है ? दुःख का एक कतरा भी यदि भीतर हो, मन का एक भी परमाणु यदि विचलित हो तो मानना होगा कि मूर्छा टूटी नहीं है, मोह बना हुआ है. इस जगत में किसी भी मानव को जो भी परिस्थिति मिली है, उसके ही कर्मों का फल है. राग-द्वेष के बिना यदि उसे वह स्वीकारे तो कर्म कटेंगे वरना नये कर्म बंधने लगेंगे. 


Thursday, November 11, 2021

थिरता जब मन में आएगी

अध्यात्म का सबसे बड़ा चमत्कार सबसे बड़ी सिद्धि तो यही है कि हम अपने बिखरे हुए मन को समझ  लें, चित्त को देख लें. मानव होने का यही तो लक्षण है कि साधना के द्वारा मन को इतना केंद्रित कर लें कि मन के परे जो शुद्ध, बुद्ध आत्मा है वह उसमें प्रतिबिम्बित हो उठे. ज्ञान के द्वारा उस आत्मा के बारे में  जानना है, फिर योग और ध्यान के द्वारा उसका अपने भीतर अनुभव करना है तथा भक्ति के द्वारा उसका आनंद सबमें बांटना है. योग अतियों का निवारण है, जो मन व तन को जो प्रसन्न रखता है  तथा भीतर ऐसा प्रेम प्रकटाता है, जिससे जीवन सन्तुलित हो. जब तक अपने लिए कुछ पाने  की वासना बनी है मन स्थिर व ख़ाली नहीं हो सकता, जब सारी इच्छाएं पहले ही पूर्ण हो चुकी हों तो कोई चाहे भी क्या ? व्यवहार जगत में दुनियादारी के लिए लेन-देन चलता रहे पर भीतर हर पल यह जाग्रति रहे कि वे आत्मा हैं, जो अपने आप में पूर्ण है ! ज्ञान के वचनों को समझ लेने मात्र से ही कोई बुद्ध नहीं हो जाता, जब तक स्वयं का अनुभव न हो तब तक उधर का ज्ञान व्यर्थ है. शास्त्र जब कुछ कहते हैं तो वे केवल तथ्य की सूचना भर देते हैं, उनकी उद्घोषणा में कोई भावावेश नहीं है. वे हमें हमारी समझ के अनुसार चलने का आग्रह करते हैं।   


Saturday, May 15, 2021

भक्ति करे कोई सूरमा

 जब जीवन में उत्कृष्टता की चाह जगती है, तब भक्ति के प्रति जिज्ञासा मन में जगती है. जिनके जीवन में भक्ति रस प्रकट हुआ है वही भक्ति के बारे में बता सकता है. नारद कहते हैं, भक्ति प्रेम स्वरूपा है, प्रेम के बिना इस जगत में कोई रह नहीं सकता. प्रेम से ही सब कुछ प्रकट होता है पर  प्रेम विकारों के बिना नहीं मिलता. भक्ति वह प्रेम है जो अविकारी है, वह अमृतस्वरूप है. प्रेम का लक्षण है शाश्वतता का अनुभव होना. ईश्वर को प्रेम करना भक्ति का प्रथम लक्षण है, जो दिखता नहीं उस अदृश्य से प्रेम करने पर तृप्ति का अनुभव होता है. जब तक समय की अनुभूति होती है तब तक हम अमरता का अनुभव नहीं करते. ईश्वर के प्रति प्रेम जगते ही भीतर एक शांत, प्रसन्न चेतना जगती है. भक्त के जीवन में द्वेष नहीं रहता, शोक नहीं रहता. ज्ञान मन के विकारों को दूर करता है पर ज्ञान के ऊपर है भक्ति. ज्ञान हमें पूर्णता का अनुभव नहीं कराता. भक्त अपने भीतर एक मस्ती का अनुभव करता है, स्तब्धता का अनुभव करता है. ज्ञान का उदय होता है और क्षय होता है पर भक्ति कभी कम नहीं होती जो नित वृद्धि को प्राप्त होती है.

Friday, April 2, 2021

चिर वसन्त की चाह जिसे है

 साधना में कुछ पाना नहीं है, खोना है. तन, मन दोनों से पसीना बहाकर विषैले तत्वों को बाहर निकालना है. जीवन एक पुष्प की तरह खिले इसके लिए मन की माटी में भक्ति का बीज बोना होगा, श्रद्धा का बीज, आस्था का बीज, जो धीरे-धीरे जड़ें फैलाएगा और स्वार्थ के सारे कूड़े-करकट को खाद बनाकर उसे सुंदर आकार, रंग और गन्ध में बदल देगा. धरती में वह क्षमता है , वैसे ही मन की माटी में भी. हम जो भी सच्चे मन से चाहते हैं वह हमें दिया ही जाता है. यहां कोई पुकार कभी व्यर्थ नहीं जाती. सुख उत्तेजना का नाम है या आसक्ति का, दुःख द्वेष का नाम है अपनी इच्छा पूरी न होने का. आनंद तो एक विशेष मन:स्थिति है जो किसी बाहरी वस्तु, व्यक्ति या घटना पर आधारित नहीं है. वह तो सदा ही एक रस है. साधक को जब अपनी निर्विकार स्थिति का भान होता है, तभी आनंद का अनुभव होता है. हम जो भी देखते हैं वह हमसे बाहर है, यदि हमें स्वयं को देखना हो तो कैसे देखेंगे ? पतंजलि कहते हैं जब देखे हुए और सुने हुए के प्रति आकर्षण न रहे तब चेतना स्वयं में लौट आती है, तब स्वयं के द्वारा ही स्वयं को देखा जाता है. तब साधक के जीवन में चिर बसंत का पदार्पण होता है


Thursday, December 17, 2020

भक्ति करे कोई सूरमा

 भक्त कहता है हम मरुथल सा रूखा-सूखा दिल लेकर तेरे द्वार पर आये थे, देखते ही देखते तूने वहाँ हरियाली के अंबार लगा दिए। तेरा नाम भर सुना था, तुझे जानते भी नहीं थे पर जो  खाली दामन साथ लाये थे, उसे भर दिया. जो दिखाई नहीं देते पर जिनकी चमक से मन में ज्योति छा गयी है, वैसे मधुर भावों के अनेक हीरे-मोती तू लुटाता है. दो बूँद ही प्रेम की इस उर ने चाही थी पर कितना कृपालु है तू कि प्रेम के  दरिया बहा दिए. कितने विकारों से भरा था मन, अहंकार के हाथी पर चढ़ कर आया था, पर तू पावन करने वाला है. सारे संबंध  तुझसे ही पनपे हैं, तू पिता बनकर पालता है, माँ बनकर संवारता है, गुरू बनकर राह दिखाता है, मित्र बनकर स्नेह लुटाता है, भाई या बहन बनकर जीवन पथ को सुंदर बनाता है. यह सारी सृष्टि तुझसे ही उपजी है. भक्त को किसी दर्शन, किसी वाद, ता किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं है, उसे समाधि भी नहीं साधनी है, उसे तो भीतर उमड़ते उस प्रेम को एक दिशा देनी है, उस अनंत पर लुटाना है. प्रेम का आदान-प्रदान ही एकमात्र वह कृत्य है जो उसे अस्तित्त्व से जोड़ता है. 


Wednesday, November 4, 2020

ध्यान के पथ का जो राही है

 

एक बार किसी साधक ने किसी संत से पूछा, ध्यान की कितनी विधियाँ हैं ? संत मुसकुराते हुए बोले, आज तक जितनी बार किसी ने ध्यान किया है हर बार एक नई विधि का जन्म हुआ है, जब परमात्मा  अनंत है तो उस तक पहुँचने के मार्ग भी अनंत ही होने चाहिए। इसलिए दुनिया में इतने धर्म हैं, इतने पंथ, संप्रदाय और मत हैं, सभी का लक्ष्य एक है पर हरेक अपनी प्रकृति और स्वभाव के अनुसार इस मार्ग पर चलता है। इसलिए भगवद गीता में कृष्ण ने भक्ति योग, ज्ञान योग, कर्म योग, ध्यान योग, जपयोग, प्रेम योग सभी का उल्लेख किया है। हर कोई जाने-अनजाने उसके पथ का ही राही है। जो स्वयं को नास्तिक मानता है वह भी और जो अपने को आस्तिक मानता है वह भी। परमात्मा से मिलने की इच्छा के जगने का अर्थ है मानव होने की गरिमा को अनुभव करना। एक शिशु जिस आनंद को सहज ही अनुभव करता है उसे पुन: पा लेना अथवा स्वयं के सही स्वरूप से मिलन। संसार से एकत्व ही इसकी परिणति है। समता की प्राप्ति ही इस मिलन पर प्राप्त होने वाला उपहार है।   

Monday, June 22, 2020

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

भक्ति के ग्यारह विभिन्न भाव एक दूसरे के साथ जुड़े हैं. हरेक व्यक्ति में इनका कुछ न कुछ अंश होता ही है. कोई एक प्रकार का भाव अलग-अलग व्यक्तित्व में प्रमुखता से दिख सकता है. सदगुरू कहते हैं भक्त लोकलाज की परवाह नहीं करते, जगत की निंदा-स्तुति की परवाह न करने वाले ही भक्त हो सकते हैं. प्रेम से ही ईश्वर तुष्ट होते हैं. हम संसार में अपना बल खोजते हैं, ईश्वर का बल मिल जाने पर किसी और बल की जरूरत ही नहीं है. जगत के साथ संबन्ध बन्धन लगता है ईश्वर के साथ जो बन्धन है वह बन्धन नहीं लगता, वह मुक्ति का द्बार खोल देता है. वह ध्यान के लिए अनुकूल है, भक्ति ध्यान के लिए और ध्यान भक्ति के लिए जरूरी है. किसी के भीतर भक्ति सहसा भी घट सकती है जैसे बिजली का चमकना और अभ्यास से भी जैसे सूर्य का उगना. योग करने, साधना करने से भीतर ध्यान की रूचि जगती है, पूजा में भी रूचि जगती है, और एक दिन भक्ति का उदय होता है. कोई इस पथ पर आरम्भ से ही चल पड़ता है. भक्त की दृष्टि से परमात्मा सारे जगत की सेवा कर रहा है. 

Sunday, June 21, 2020

भक्ति एक रूप अनेक


जैसे सूर्य की किरण श्वेत है पर उसमें सात रंग छिपे हैं, वैसे ही भक्ति का रूप प्रेम है पर उसमें ग्यारह प्रकार की सुगंध छिपी है. पहला प्रकार है प्रेमास्पद की गुण महिमा गाना, जिससे हम प्रेम करते हैं, उसके गुणों का बखान करना स्वाभाविक है. दूसरा प्रकार है उसके रूप के प्रति आसक्त होना. सौंदर्य के प्रति समर्पित व्यक्ति आक्रामक नहीं होता. जहाँ भी सुंदरता है भक्त को उसके पीछे वही दिखता है. अरूप के प्रति समर्पित होकर रूप का दर्शन करना है, रूप से फिर अरूप की और जाना है.  जैसे प्रकृति में विविधता है, वैसे ही मानव भी विभिन्न कलाओं के माध्यम से उस रूप को व्यक्त करता है. मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तु हर सृजन के पीछे भक्ति है. पूजासक्ति भक्ति का तीसरा प्रकार है. भीतर पूर्णता का अनुभव करके जो भी कृत्य किया जाता है वह पूजा है. स्मरणासक्ति अर्थात स्मृति में बने रहना,  जिसे प्रेम करते हैं उसकी याद बने रहना भी भक्ति का एक रूप है. दास्यभाव भक्ति का अगला प्रकार है,भक्त ईश्वर के दास हैं,  इस भाव में एक निश्चिंतता है, स्वामी को सब समर्पण कर दिया है, अब उसके कुशल-क्षेम की रक्षा वही करेंगे. सख्यासक्ति में भक्त भगवान को अपना सखा मानता है. सखा भाव में हर भेद मिट जाता है, वे हर वस्तु बांटते हैं. वात्सल्यासक्ति में भगवान को अपना शिशु मानकर प्रेम जताना भी भक्ति है. कांतासक्ति में ईश्वर में प्रियतम भाव को आरोपित किया जाता है. ईश्वर को अपना प्रियतम मैंने से उससे कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता. तन, मन, धन सब कुछ उसे समर्पित कर देना ही कांतासक्ति है. इसके बाद आती है आत्मनिवेदनासक्ति जिसमें सभी भावों को उन्हें समर्पित कर देता है. तन्मयासक्ति में भक्त भगवान के स्मरण, उसके रस में, उनकी स्मृति में पूरी तरह से डूब जाता है. परमविरहासक्ति में प्रियतम के अभाव से ही भक्ति का अनुभव होता है. विरह की पीड़ा ही भक्त के हृदय में दर्द भरा आनंद भर देती है.  

Friday, June 19, 2020

भक्ति जब कर्मों में झलके


आगे नारद जी कहते हैं, कर्म और ज्ञान से भक्ति श्रेष्ठ है क्योंकि वह दोनों में ओतप्रोत है. भक्ति कर्म का भी आधार है. कर्मयोगी अति संवेदनशील होता है.. कर्म के आरंभ  में निष्ठा के रूप में भक्ति है, कर्म करते समय आनंद के रूप में भक्ति है और कर्म का लक्ष्य यदि शांति है तो उस रूप में भी भक्ति का अनुभव ही कर्मयोगी करता है. इसी तरह जिस विषय के प्रति लगाव नहीं है उसका ज्ञान भी कैसे प्राप्त करेंगे. ज्ञान में रूचि के रूप में भक्ति है. जिस ज्ञान से हम विस्मित नहीं होते, वह ज्ञान भी ज्ञान नहीं है, विस्मय आनंद देता है, इसलिए ज्ञान के लक्ष्य पर भी भक्ति है. भक्ति के बिना ज्ञान अंधा हो जाता है, कर्म लँगड़ा हो जाता है. 

Wednesday, June 17, 2020

भक्ति का जो मर्म जान ले

भक्ति शास्त्र को सुनना ही नहीं है, उस पर मनन भी करना है. सारा संसार ही भक्ति शास्त्र है. भक्त को हर जगह परमात्मा के दर्शन होते हैं. सुख-दुःख, इच्छा, हानि-लाभ से परे जाकर ही भक्ति की साधना हो सकती है. लाभ और लोभ जुड़वां हैं, इन्हें मन में घर नहीं बनाने देना है. इसी तरह मान की भी चिंता छोड़ देनी होगी. संसार में आलोचना से घबराने वाले लोग रोग से घबराने वालों से भी ज्यादा हैं. जब समर्पण भाव जगता है तब जीवन का दरिया बहने लगता है, नहीं तो जीवन एक पानी का रुक हुआ डबरा बन जाता है, जिसमें काई जमने लगती है. ज्ञानी का लक्ष्य भी अटल भक्ति है. यह सब करने के बाद काल की प्रतीक्षा करनी है. प्रतीक्षा में एक शक्ति है जो सारे विकारों को दूर कर देती है. ऐसी प्रतीक्षा ध्यान में बदल जाती है.  प्रतीक्षा की क्षमता नहीं है तो काल बेचैन कर देता है, उदास बना देता है. काल की प्रतीक्षा करते हुए भी एक क्षण भी व्यर्थ नहीं बिताना है. अहिंसा, शौच, सत्य, आस्तिकता आदि सदाचारों का पालन करना है. योगी संसार के त्याग की बात करता है अपर भक्त हर भाव में उन्हीं को देखता है. प्रकृति में ईश्वर को देखना भक्ति है. 

जाना है उस पार जिसे


भक्ति की व्याख्या कहते हुए आगे गुरूजी कहते हैं, हनुमानजी भक्तों में शिरोमणि हैं. हनुमान के भीतर रोम-रोम में राम ही बसे हैं. किसी -किसी क्षण में भक्त भगवान से भी बड़ा हो जाता है. राम से ज्यादा शक्ति हनुमान में है. भगवान भक्त को उससे ज्यादा समझते हैं, वह उसकी दुर्बलता और ताकत दोनों को जानते हैं. हनुमान जब स्वयं की शक्ति को भूल गए थे तब जाम्बवान के द्वारा ईश्वर ने ही सम्भवतः उन्हें उसकी याद दिलाई. भक्त कभी अकेलापन महसूस नहीं करता. उसके आराध्य की एक नजर से उसके कर्म नष्ट होने लगते हैं. गुरु के सम्मुख भी यही होता है. उनकी शाब्दिक शक्ति से अधिक होती है उनकी उपस्थिति. जिसके भीतर ज्ञान और भक्ति का संगम हुआ है, वहीं अमृत प्रकटता है. गुरु के प्रति श्रद्धा हो तो उनकी बात पर भरोसा करना आसान है. अल्प बुद्धि में फंसा व्यक्ति शीघ्र भरोसा नहीं कर पाता। जो बुद्धत्व को प्राप्त करता है उसकी बुद्धि प्रकांड होती है, किन्तु वह बुद्धि के पार चले जाते हैं. जिस नाव में बैठकर नदी पार की, उसे तट पर जाकर तो छोड़ना पड़ेगा. भक्ति के क्षेत्र में तर्क का कोई स्थान नहीं है. तर्क कब कुतर्क बन जाता है पता ही नहीं चलता. वितर्क से आत्मज्ञान होता है .हर अनुभूति तर्क से परे है. मन्त्र शक्ति भी अतार्किक है, कृपा भी अतार्किक है.

Tuesday, June 9, 2020

सबसे ऊँची प्रेम सगाई

भक्ति सूत्रों पर व्याख्या करते हुए सद्गुरु आगे कहते हैं - जगत को देखने का नजरिया सबका अलग-अलग है. एक वैज्ञानिक जगत को देखकर विश्लेषण करता है, वह चाँद को देखता है तो उसके बारे में जानने का प्रयत्न करता है. भक्त, कवि या कलाकार चाँद को देखकर किसी अनोखी भावदशा का अनुभव कर सकता है, वह जगत को संयुक्त देखता है, उससे संबंध  बना लेता है. कुछ लोग मूर्ति पूजा को नहीं मानते, वे कहते हैं स्तुति, प्रार्थना, अर्चना उसकी करो जो हर जगह है, पर कुछ के लिए मूर्ति झुकने के लिए एक आधार बनती है. भक्ति, योग व ज्ञान दोनों के लिए आवश्यक है. नारद पहले ही कह चुके हैं भक्ति प्रेमस्वरूपा है, प्रेम मात्र भावना नहीं है यह मानव का अस्तित्त्व है, प्रेम से ही वह बना है. योग से भावना में स्थिरता आती है, ज्ञान से अंतर निर्मल होता है. योगियों का लक्ष्य समाधि है, पर भक्त के लिए समाधि का अनुभव कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है. भीतर जब चेतना खिल जाती है तो भाव समाधि का सहज ही अनुभव होता है. भक्ति में श्रेष्ठ के वरण की कामना है. इसलिए साधक को कुसंग त्यागना है. अहंकार को मिटाना है. ‘मैं’ और ‘मेरा’ के पत्थर पैरों में बाँध कर पर्वतों की चढ़ाई नहीं की जा सकती. उसे तीनों गुणों के पार जाना है. भगवान को जो कुछ भी कोई प्रेम से देता है वह उसे स्वीकारते हैं. वह जानते हैं कि कोई किसी के काम आ जाए तो उसका आत्मसम्मान बढ़ता है. सृष्टि का यह आयोजन तो अनंत काल से चल रहा है, उसमें हमारा छोटा सा यह जीवन क्या अर्थ रखता है. पर यही प्रेम का भेद है ! प्रेम का आदान-प्रदान ही इसे सार्थक बनाता है. 

Monday, June 8, 2020

भक्ति करे कोई सूरमा

नारद भक्ति सूत्रों के अनुसार पराशर मुनि कहते हैं, पूजा में अनुराग होना ही भक्ति है. शांडिल्य के अनुसार किसी भी प्रकार के  विरोध के बिना अपने भीतर स्थित हो जाना ही भक्ति है. भीतर द्वंद्व हो तो भक्ति संभव नहीं है. एक अन्य आचार्य के अनुसार आत्मा में जब रति होती है तो भीतर जो मस्ती होती है वह भक्ति है. नारद के अनुसार सभी आचरणों को उसे समर्पित कर देना ही भक्ति है. दूसरे के व्यवहार को लेकर उन्हें समझाना भी हो तो भीतर क्रोध या ग्लानि नहीं होनी चाहिए. स्वयं के दोष देखकर भी आत्मग्लानि न हो तभी भक्ति टिक सकती है. कर्म करने से पहले विश्राम तथा कार्य करने के बाद समर्पण कर देना चाहिए. अच्छा करने का अभिमान  होता है, इसलिए सभी कुछ समर्पण कर देना चाहिए. हम जब भी व्याकुल होते हैं तो जान लेना चाहिए कि हम उसे भूल गए. प्रेम और आदर जहाँ  दोनों हों वहीं भक्ति पनपती है. स्वयं के प्रति या अन्य के प्रति आदर न हो तो प्रेम धीरे-धीरे सूख जाता है, व्यक्ति के भीतर आत्मग्लानि का जन्म होता है. प्रेम एक ऊर्जा है, आत्मसम्मान से भरा व्यक्ति ही सम्मान करना जानता है. सम्मान पाने की लालसा जब तक भीतर है प्रेम का प्रस्फुरण नहीं होता. जहाँ दिखावा है वहाँ निकटता द्वेष को जन्म देती है. प्रेम देने की कला है, पूर्णरूप से निछावर होना भक्ति का लक्षण है. 

Friday, June 5, 2020

श्रद्धा जिसकी सदा अटल है

आज गुरूजी ने बताया भक्ति मन में जगे इसके लिए शरणागति एक साधन है. यदि कोई भूल हमसे होती है और उसे हम स्वीकार लेते हैं, तो उससे बाहर आ जाते हैं. जो झुकना नहीं जानता वह आनंद के सागर में डुबकी नहीं लगा सकता. असहाय के लिए ही भगवान सहायक बन कर   आते हैं, दीन के लिए ही दीनानाथ है, जो स्वयं को सदा सही मानता है, अपनी भूल स्वीकार करने में जिसका अहंकार आड़े आता है, वह अपने भीतर विश्राम नहीं कर सकता. गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता और ईश्वर की कृपा के बिना गुरु का सान्निध्य नहीं मिलता. गुरु के सान्निध्य का अर्थ है उनके ज्ञान को स्वीकारना, अपनी बुद्धि को किनारे रखकर श्रद्धा भाव से स्वयं के जीवन में परिवर्तन के लिए सदा तैयार रहना. मन को मारकर बैठना ही गुरु की संगति में बैठना है. जो भी हम अपने प्रयत्न से प्राप्त करते हैं वह हमसे छोटा ही होता है, पर जो गुरु अथवा ईश्वर की कृपा से मिलता है वह असीम है. उस असीम को भीतर समाने के लिए हमारा छोटा सा मन पर्याप्त नहीं है. एक लोटे में भला सागर समा सकता है क्या ?  साधक को गुरु के रक्षा कवच में रहना है. अपने हर आग्रह को छोड़ना है. जीवन में कितने ही कठोर अनुभव करवा के परमात्मा हमारी श्रद्धा को हिलाते हैं, पर जो हर संशय को पार करके भी अटल रहती है ऐसी दृढ श्रद्धा ही वास्तविक है. ऐसी श्रद्धा जगते ही हृदय द्रवीभूत हो जाता है, अहंकार पिघल जाता है और हमारे व्यक्त्तिव में एक लोचपन आता है जो किसी भी परिस्थिति में हमें स्थिर बनाये रखता है.  

Thursday, June 4, 2020

रसो वै स:

जीवन वही सार्थक है जिसमें रस है. शास्त्र कहते हैं परमात्मा रसपूर्ण है, इस रस की जिसे एक झलक भी मिल जाती है उसके भीतर इसे पाने की लालसा जग जाती है. परमात्मा के प्रति यह लगन ही जीवन में रस उत्पन्न करती है. नारद मुनि कहते हैं, योग, कर्म, ज्ञान, भक्ति आदि में भक्ति मुख्य है, क्योंकि शेष सबका लक्ष्य भी भक्ति ही तो है. भक्ति जीवन में पूर्णता का अनुभव कराती है. समपर्ण की घड़ी जब जीवन में आती है तो जीवन रसपूर्ण प्रतीत होता है. ज्ञान का उद्देश्य है भक्ति और कर्म की सफलता है भक्ति. योग की पराकाष्ठा है भक्ति. भक्ति में प्रेम और विरह दोनों का अनुभव जरूरी है. प्रेम ही जीवन का आधार है, लक्ष्य भी और गति भी, विरह जगे तो अभिमान टिक नहीं सकता. भगवान को अभिमानी जरा भी नहीं भाते. जो भक्ति में झुकता है उसे कभी लज्जित होकर झुकना नहीं पड़ता. 

Tuesday, June 2, 2020

चेतन अंश जीव अविनाशी

नारद भक्ति सूत्र प्रवचन श्रृंखला का आज दूसरा दिन है. नारद मुनि कहते हैं हृदय में कामना रखकर सामाजिक और धार्मिक कार्यों में लगा हुआ व्यक्ति भक्ति का अधिकारी नहीं है. व्यक्ति को  परमात्मा से अपने सहज संबंध को स्मरण मात्र करना है, केवल उसके प्रति सजग होना है. यदि हमारे धार्मिक कृत्य कुछ न कुछ पाने की आशा से किये जाते हैं तो हम उस परम् रस के अधिकारी कैसे हो सकते हैं. यह सही है कि हमें कुछ न कुछ कर्म करना ही है, कर्म यदि इस भाव से किये जाते हैं कि उनसे हमारा मन शुद्ध होगा और किसी का कल्याण होगा तब एक दिन हम भक्ति के अधिकारी बन सकते हैं. साथ ही यह भी सत्य है कि यह सिद्धि समय सापेक्ष नहीं है, यदि इसी क्षण हम अपनी कामनाओं को छोड़ सकें तो इसी समय परम् रस का अनुभव कर सकते हैं. भक्ति का एक और लक्षण है अनन्यभाव, जब हम परमात्मा से प्रेम करते हैं और उसे स्वयं से भिन्न नहीं मानते तो अनन्य भाव का अनुभव होता है.