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Friday, March 8, 2024

शुभता को मन करे वरण

संतजन कहते हैं, जो अपने लिये सत्यं, शिवं और सुन्दरं के अलावा कुछ नहीं चाहता, प्रकृति भी उसके लिये अपने नियम बदलने को तैयार हो जाती है. जो अपने ‘स्व’ का विस्तार करता जाता है, जैसे-जैसे अपने निहित स्वार्थ को त्यागता जाता है, वैसे-वैसे उसका सामर्थ्य बढ़ता जाता है. अस्तित्त्व पर निर्भर रहें तो कोई फ़िक्र वैसे भी नहीं रह जाती क्योंकि वह हर क्षण हमारे कुशल-क्षेम का भार वहन करता है. जैसे एक नन्हा बालक अपनी सुरक्षा के लिये माँ पर निर्भर करता है, हमारे सभी कार्य यदि हम उस पर निर्भर रहते हुए करेंगे तो उनके परिणाम से बंधेंगे नहीं. हम जो भी करें उसका हेतु सत्य प्राप्ति हो तो सामान्य कार्य भी भक्ति ही बन जाते हैं. एक मात्र ईश्वर ही हमारे प्रेम का केन्द्र हो, जो कहना है उसे ही कहें. अन्यों से प्रेम हो भी तो उसी के प्रति प्रेम का प्रतिबिम्ब हो. परमात्मा की कृपा जब हम पर बरसती है तो अपने ही अंतर से बयार बहती है. तब अंतर में तितलियाँ उड़ान भरती हैं. अंतर की खुशी बेसाख्ता बाहर छलकती है. ऐसा प्रेम अपनी सुगन्धि अपने आप बिखेरता है. दुनिया का सौंदर्य जब उसके सौंदर्य के आगे फीका पड़ने लगे, उस “सत्यं शिवं सुन्दरं” की आकांक्षा इतनी बलवती हो जाये, उसके स्वागत के लिए तैयारी अच्छी हो तो उसे आना ही पडेगा. अंतर की भूमि इतनी पावन हो कि वह उस पर अपने कदम रखे बिना रह ही न पाए. रामरस के बिना हृदय की तृष्णा नहीं मिटती. परम प्रेम हमारा स्वाभाविक गुण है, उससे च्युत होकर हम संसार में आसक्त होते हैं. कृष्ण का सौंदर्य, शिव की सौम्यता, और राम का रस जिसे मिला हो वही धनवान है. जिस प्रकार धरती में सभी फल, फूल व वनस्पतियों का रस, गंध व रूप छिपा है वैसे ही उस परमात्मा में सभी सदगुण, प्रेम, बल, ओज, आनंद व ज्ञान छिपा है, संसार में जो कुछ भी शुभ है वह उस में है तो यदि हम स्वयं को उससे जोड़ते हैं, प्रेम का संबंध बनाते हैं तो वह हमें इस शुभ से मालामाल कर देता है, दुःख हमसे स्वयं ही दूर भागता है, मन स्थिर होता है. धीरे धीरे हृदय समाधिस्थ होता  है. एक बार उसकी ओर यात्रा शुरू कर दी हो तो पीछे लौटना नहीं होता...दिव्य आनंद हमारे साथ होता है और तब यह जीवन एक उत्सव बन जाता है.


Monday, June 7, 2021

शुभता का जो वरण करेगा

 आज तक हमने जो भी किया उसका फल तो हमें मिलने ही वाला है, वह हमारा भाग्य बन गया है जो एक न एक दिन सम्मुख आएगा, किन्तु इस क्षण के बाद हम मनसा, वाचा, कर्म जो भी करने वाले हैं, वह अभी हमारे हाथ में है. हम यदि चाहें तो अपने कर्मों के प्रवाह को शुभ की तरफ मोड़ सकते हैं और अपने भाग्य को अपने अनुकूल गढ़ सकते हैं. इसमें सबसे बड़ा सहायक है भीतर का अखण्ड विश्वास और सत्य को जानने का अभिलाषा. परमात्मा परम शुभता का प्रतीक है, वह शांति, आनंद और प्रेम का अनंत सागर है, यदि हम उसका स्मरण मात्र करते हैं तो अंतर को उतनी देर के लिए उसके गुणों से भर लेते हैं. धीरे-धीरे कर्मों को करते समय भी उसका स्मरण बना रह सकता है. मन क्रोध या लोभ का शिकार नहीं होता, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, दिखावे की अग्नि में नहीं जलता. सदा स्वयं को औरों से बेहतर बताने की संसारी प्रवृत्ति अपने आप छूटने लगती है. मन सात्विक बल और साहस से भर जाता है और पुराने किसी कर्म का प्रतिकूल फल आने पर भी वह भीतर समता भाव बनाये रखता है. उपासना ऐसा कर्म है जो करते समय व भविष्य में भी सुख से भर देने वाला है. 


Tuesday, February 5, 2019

जब सौंप दिया इस जीवन को


६ फरवरी २०१९ 
संत कहते हैं परमात्मा हमारे पल-पल की खबर रखता है. हम उसकी ओर एक कदम बढ़ाते हैं तो वह हजार कदम बढ़ाकर हमें अपनी छाया से ढक लेता है. जीवन की धूप में तब हम क्लान्ति का अनुभव नहीं करते, सहज ही हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तत्पर हो जाते हैं. हर हाल में पहला कदम हमें ही उठाना होता है. बड़ी सावधानी से अपनी प्राथमिकताओं को तय करना होता है, जो भी उसके मार्ग पर चलने में बाधक है, उसे काटते-छांटते जाना होता है. जब आत्मा को पूर्ण निश्चय हो जाता है कि शुभता और सम्पूर्णता ही उसका लक्ष्य है, तब अदृश्य की ओर से सहायता मिलने लगती है. गैर-जरूरी हटने लगता है और श्रद्धा को बल मिलता है. यह जगत उसकी ही कृति है, वह इसकी रग-रग से वाकिफ है, इसलिए साधक स्वयं को अस्तित्त्व को सौंप कर निश्चिन्त हो जाता है. जो भी उसके जीवन में होगा वह उसके विकास में सहायक ही होगा, ऐसा मानकर वह सहजता पूर्वक अपने कर्म का निष्पादन करता है.  

Tuesday, October 14, 2014

समाधान मिलता है भीतर

मार्च २००७ 
जो हमारा आज का विचार है, वही भविष्य की क्रिया है. विश्व क्रांति से अधिक हमें वैचारिक क्रांति की आवश्यकता है. वैचारिक परिवर्तन हमें अंतर्मुख होना सिखाता है, जिससे हम भीतर से मार्गदर्शन पाने लगते हैं. ध्यान से भीतर जो शक्ति उत्पन्न होती है वह स्वतः ही शुभता में ले जाती है. लोकसंग्रह के लिए तब कोई प्रयास नहीं करना पड़ता. ऊपरी सुन्दरता के दायरे से निकल कर जो विचार की सुन्दरता में प्रवेश करता है वह मानो अपने भाग्य का निर्माता बन जाता है. वह स्वमान में रहने लगता है और दूसरों का सम्मान करना सीखता है. स्वमान का अर्थ है अपने भीतर छिपे आत्मा के अमूल्य गुणों पर भरोसा. पवित्रता, प्रेम, सरलता, करुणा तथा सत्यता हमारे भीतर ही हैं, इसका प्रत्यक्ष अनुभव होने पर ही यह भरोसा उत्पन्न होता है.