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Monday, July 4, 2022

रस की धार बहे जब उर में

मन द्वंद्व का ही दूसरा नाम है। देह जड़ है, वह जैसी है वैसी ही प्रतीत भी होती है। देह स्वयं को स्वस्थ रखने का उपाय भी जानती है यदि हम उसे उसकी सहज, स्वाभाविक स्थिति में रहने दें। किंतु मन में लोभ है, जो अनावश्यक पदार्थों से तन को भरने पर विवश करता है। क्रोध में हानिकारक रसायनों को तन में छोड़ता है।  योग, व्यायाम व प्राणायाम के द्वारा तन व मन दोनों को स्वस्थ किया जा सकता है पर मन इसे भी अभिमान का विषय बना लेता है। हम आत्मा के आकाश में उड़ना तो चाहते हैं पर विकारों  की ज़ंजीरें पैरों में बांधे रहते हैं, यह दोहरापन ही द्वंद्व है जो मानव को चैन से नहीं रहने देता। लगता है वह दोनों पाँव धरा में धँसाए है और दोनों हाथ ऊपर उठकर परमात्मा को पुकारता है। जब तक वह अपनी पकड़ नहीं छोड़ता परमात्मा का सान्निध्य मिले भी तो कैसे ? मन के गहरे गह्वर को रूखा-सूखा दर्शन नहीं भर पाता, इसे तो केवल भक्ति के रस ही भरा जा सकता है. ईश्वर के प्रति अटूट, एकांतिक प्रेम ही हमारे मन को विश्राम देता है और रस की ऐसी धार बहाता है, जो उत्साह और उमंग के फूल खिलाती है. जीवन में उत्साह हो, सृजन की क्षमता हो, अनंत आनंद हो, बेशर्त प्रेम हो और कृतज्ञता हो तो तृप्ति की वर्षा होती ही है. परमात्मा के प्रति प्रेम एक निधि है. भक्ति योग से बढ़कर कुछ नहीं. 


Monday, June 7, 2021

शुभता का जो वरण करेगा

 आज तक हमने जो भी किया उसका फल तो हमें मिलने ही वाला है, वह हमारा भाग्य बन गया है जो एक न एक दिन सम्मुख आएगा, किन्तु इस क्षण के बाद हम मनसा, वाचा, कर्म जो भी करने वाले हैं, वह अभी हमारे हाथ में है. हम यदि चाहें तो अपने कर्मों के प्रवाह को शुभ की तरफ मोड़ सकते हैं और अपने भाग्य को अपने अनुकूल गढ़ सकते हैं. इसमें सबसे बड़ा सहायक है भीतर का अखण्ड विश्वास और सत्य को जानने का अभिलाषा. परमात्मा परम शुभता का प्रतीक है, वह शांति, आनंद और प्रेम का अनंत सागर है, यदि हम उसका स्मरण मात्र करते हैं तो अंतर को उतनी देर के लिए उसके गुणों से भर लेते हैं. धीरे-धीरे कर्मों को करते समय भी उसका स्मरण बना रह सकता है. मन क्रोध या लोभ का शिकार नहीं होता, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, दिखावे की अग्नि में नहीं जलता. सदा स्वयं को औरों से बेहतर बताने की संसारी प्रवृत्ति अपने आप छूटने लगती है. मन सात्विक बल और साहस से भर जाता है और पुराने किसी कर्म का प्रतिकूल फल आने पर भी वह भीतर समता भाव बनाये रखता है. उपासना ऐसा कर्म है जो करते समय व भविष्य में भी सुख से भर देने वाला है. 


Tuesday, October 20, 2020

शक्ति की जो करे साधना

 मन द्वंद्व का ही दूसरा नाम है. यह जगत ही दो से बना है और मन भी इसी जगत का हिस्सा है. यहाँ सुख के साथ दुःख  है और दिन के साथ रात है. हम दिन को भी स्वीकारते हैं और रात को भी. किन्तु सुख के साथ दुःख को नहीं स्वीकारते. दिन और रात को हम बाहर की घटना मानते हैं और सुख-दुःख को मन के भीतर की, बाहर पर हमारा कोई बस नहीं वह प्रकृति से संचालित है पर हमें लगता है भीतर पर हमारा बस चल सकता है. हम दुःख को अस्वीकारते हैं और इसी कारण कभी भी उससे छुटकारा नहीं मिल पाता। यदि दुःख को भी सहजता से स्वीकार लें तो वह टिकने वाला नहीं है. उससे बचने की प्रक्रिया में हम उसकी अवधि को बढ़ा देते हैं और उसकी तीव्रता को भी. इसी तरह मन में प्रेम भी है और क्रोध भी, हम प्रेम को अच्छा मानते हैं और क्रोध से छुटकारा पाना चाहते हैं. क्रोध को दबाते हैं या क्रोध आने पर स्वयं को दोषी मान लेते हैं. मन की जिस शक्ति से हम क्रोध को दबाते हैं और जिस विचार के द्वारा मन को क्रोध न करने के लिए समझाते हैं या आत्मग्लानि से भर जाते हैं, वह भी तो उसी मन का हिस्सा है जो क्रोध को उत्पन्न कर रहा है. यह तो ऐसी ही बात हो गयी जैसे कोई अपने दाएं हाथ को बाएं हाथ से रोके. जब तक भीतर यह समझ नहीं जागती कि सकारात्मक या नकारात्मक दोनों ही भावनाएं एक ही शक्ति से उपजती हैं, हम उनके पार नहीं जा सकते. ध्यान के द्वारा यही समझ विकसित होती है, शक्ति की आराधना से भी हम उस शक्ति का अनुभव कर लेते हैं और फिर जो भावना जब जगाना चाहें ,जगा सकते हैं. 


Sunday, July 5, 2020

दुःख से जो भी मुक्ति चाहे


बुद्ध ने कहा है, जीवन में दुःख है. इस दुःख का कारण है. कारण का निवारण है. वह पथ है जिस पर चलकर एक दुखविहीन अवस्था का अनुभव किया जा सकता है. जीवन में जन्म, मरण, बुढ़ापा, मृत्यु, ये चार दुःख हरेक को भोगने पड़ते हैं. उदासी, क्रोध, ईर्ष्या, चिंता, भय, अवसाद सभी दुःख हैं. प्रियजनों से विछोह दुःख है, अप्रिय से मिलन दुःख है. इच्छा, आसक्ति, देह, मन, बुद्धि आदि से चिपकाव दुःख है. अज्ञान ही इन दुखों का कारण है. जीवन के मर्म को न समझकर हम इन दुखों से ग्रस्त होते हैं. इन दुखों से बचा जा सकता है. जीवन के सत्य को समझकर ही कोई दुःख से मुक्त हो सकता है. बुद्ध ने एक मार्ग भी दिया जिस पर चल कर एक ऐसी अवस्था भी आती है जहाँ कोई दुःख नहीं है. इस पथ का राही सजग होकर सदा वर्तमान में रहता है. सजगतापूर्वक जीने का मार्ग ही अष्टांगिक मार्ग है. सम्यक समझ, सम्यक विचार, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयत्न, सम्यक ध्यान, सम्यक एकाग्रता जिसके अंग हैं. 

Tuesday, March 5, 2019

राग-द्वेष से मुक्त हुआ जो


अविद्या अथवा मोह हमें यथार्थ ज्ञान से वंचित रखता है. सुख का प्रलोभन हमें रागी बनाता है और दुःख का भय द्वेषी. यदि हमारे कर्म राग, द्वेष अथवा मोह से परिचालित होंगे तो कर्मों के बंधन से हमें कोई बचा नहीं सकता. इसके विपरीत यदि हम सहज भाव से अपने नियत तथा कर्त्तव्य कर्म आदि करते हैं तो उसका कोई कर्माशय नहीं बनता, जिसका फल हमें बाद में भोगना पड़े. राग और द्वेष ही वे दो असुर हैं जिनके साथ एक साधक को अपने भीतर युद्ध लड़ना होता है. यदि कोई भी प्रवृत्ति राग प्रेरित होगी तो उसका संस्कार और गहरा हो जायेगा और बाद में उससे मुक्त होने के लिए उतना ही अधिक प्रयास करना पड़ेगा. इसी प्रकार यदि दुःख से बचने के लिए हम उद्यम से द्वेष करते हैं तो प्रमाद का संस्कार गहरा होता जाता है. कृष्ण कहते हैं, राग और द्वेष मनुष्य के बहुत बड़े शत्रु है, जो प्रत्येक इंद्रिय के प्रत्येक विषय में स्थित रहते हैं, इनसे से ही काम-क्रोध की उत्पत्ति होती है, जो समस्त विकारों के मूल हैं। जिसके मन में कामना है, वह कभी सच्चे अर्थ में सुखी नहीं हो सकता। कामना की पूर्ति में एक बार सुख की लहर-सी आती है, पर कामना ऐसी अग्नि है, जो प्रत्येक अनुकूलता को आहूति बनाकर अपना महत्व बढ़ाती रहती है। जितनी कामना की पूर्ति होती है, उतनी यह अधिक बढ़ती है। कामना अभाव की स्थिति का अनुभव कराती है। जहां अभाव है, वहीं प्रतिकूलता है और प्रतिकूलता ही दुख है। कामना कभी पूर्ण होती ही नहीं, इसलिए मनुष्य कभी दुख से मुक्त हो ही नहीं सकता। इसलिए साधक को इन काम-क्रोध के मूल राग-द्वेष का त्याग करना है.


Thursday, February 7, 2019

सहज सधे जो वही सार्थक


८ फरवरी २०१९ 
आलस्य, प्रमाद और निद्रा साधक के लिए बाधक हैं. सुबह जल्दी उठना, प्रातः भ्रमण, व्यायाम, योग साधना आदि नियमित रूप से तभी सम्भव है जब कोई आलस्य पर विजय प्राप्त कर ले. प्रमाद का अर्थ है भूल को जानकर भी उसे दोहराना, जैसे कोई जानता है कि क्रोध करना बुरा है पर जरा सी प्रतिकूल परिस्थिति आते ही अथवा थोड़ी सी असुविधा होते ही वह क्रोध कर बैठता है. आवश्यक निद्रा स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है लेकिन रात को देर तक जगना और सुबह देर तक सोते रहना शरीर व मन दोनों के लिए ठीक नहीं है. प्रकृति के नियमों का पालन करने से ही हम स्वस्थ रह सकते हैं, स्वस्थ अर्थात स्व में स्थित रह सकते हैं. स्व में स्थित रहना अर्थात जीवन के साथ एक होकर रहना या मूलभूत मूल्यों को धारण करना. सत्य और अहिंसा आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं, इन्हें स्व में स्थित होकर सहज ही जीया जा सकता है.  

Monday, February 12, 2018

हे शिव शम्भोः औघड़दानी


१३ फरवरी २०१८ 
शिव कल्याणकारी हैं. शिव अनादि व अनंत हैं. शिव और शक्ति दो नहीं हैं. दिन-रात और सुख-दुःख की तरह शिव और शक्ति सदा साथ हैं. शक्ति जब विश्राम में होती है तो शिव होती है और शिव जब गतिमान होते हैं तो शक्ति होते हैं. शिव का विश्राम भी उतना ही प्रभावशाली है जितना उनका गतिमान होना. शिव चैतन्यता की पराकाष्ठा हैं. जब साधक अपने स्वरूप में स्थिर हो जाता है, शिव में ही होता है. उसके अशुभ संस्कार नाश को प्राप्त होते हैं और वह नई शक्ति भरकर जगत में कार्य करने में सक्षम होता है. शिव संहारक हैं, वे क्रोध आदि विकारों का नाश करते हैं तथा शांत, सृजनात्मक ऊर्जा का पोषण करते हैं. महाशिवरात्रि के पर्व पर हम सभी को आसुरी शक्तियों का विनाश करके अपने भीतर के देवत्व को जगाना है.  

Wednesday, July 26, 2017

सारा जग जब मीत बनेगा

२६ जुलाई २०१७ 
क्रोध और मोह से विहीन, राग-द्वेष से मुक्त जीवन ही असली जीवन है. यदि हम इन विकारों से मुक्त नहीं हो पाते तो इसका कारण बाहर नहीं है. हमारी असफलता का कारण भीतर ही है. सुख की कामना ही मोह है. मोह के कारण ही हमें भय सताता है और अज्ञान के कारण ही इस सत्य को हम देख नहीं पाते. सुख के जिन साधनों के पीछे जाकर पहले-पहल हम मुग्ध होते हैं बाद में वही दुःख का कारण बन जाते हैं. हमारे सुख में जो बाधक हो उसके प्रति द्वेष करते हैं पर नहीं जानते कि शुद्ध अहिंसा जब किसी हृदय में घटती है उसके लिए कोई पराया नहीं रह जाता. जग के साथ वह एक हो जाता है और उसके अंतर्मन में करुणा जल अनायास ही बहने लगता है.

Friday, July 7, 2017

नये संस्कार उगें जब मन में

१० जुलाई २०१७ 
कभी-कभी न चाहते हुए भी हमसे ऐसे कृत्य हो जाते हैं, जिन पर बाद में पश्चाताप होता है. कभी मुख से ऐसे वचन निकल जाते हैं जिन्हें बोलने के बाद हमें लगता है, इनकी जरूरत ही नहीं थी. इनका कारण हमारे भीतर के क्रोध आदि विकार हैं, जो जरा सी परिस्थिति भी अनुकूल पाते ही सिर उठा लेते हैं अथवा तो जब उनके फल देने का वक्त होता है, परिस्थिति पैदा कर लेते हैं. क्रोध, मान, मोह, माया आदि पूर्व कर्मों के फल हैं. भीतर जो भी भाव उठते हैं वे संस्कारों के कारण होते हैं, संस्कार पूर्वकर्मों के अनुसार होते हैं, हमें उनसे प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है. स्वयं का ज्ञान होने पर ही यह पता चलता है. आत्मा के गुणों के आधार पर जो कर्म हम करते हैं, वे ही नये संस्कार बनाते हैं, अन्यथा हम बार-बार पुराने ढंग से ही जिए चले जाते हैं. सम्मान कभी भी वर्चस्व से नहीं समानता से प्राप्त किया जाता है, प्रेम और परोपकार से प्राप्त किया जाता है.

Thursday, June 29, 2017

पहला सुख निरोगी काया

३० जून २०१७ 
बचपन में हम सबने एक कहानी सुनी है, एक व्यक्ति अपनी निर्धनता से तंग आकर मरना चाहता है, एक साधु उससे कहते हैं, तुम्हारे पास तो लाखों रूपये हैं, यदि तुम अपनी एक आँख ही दे दो तो राजा तुम्हें एकम लाख रूपये दे देंगे. इसी तरह वह हर अंग की एक कीमत बताता है. निर्धन व्यक्ति किसी भी कीमत पर अपने अंग बेचना नहीं चाहता. उसे अपनी भूल का अहसास हो जाता है और वह किसी भी तरह मेहनत करके अपना जीवन यापन करने का प्रण लेता है. हम सभी अपने शरीर की अच्छी तरह देखभाल करते हैं, भरसक उसे उचित आहार, व्यायाम तथा विश्राम देकर स्वस्थ रखने का प्रयत्न करते हैं. इसके बावजूद हम रोगों के शिकार होते हैं, क्योंकि हम अपने भीतरी अंगों का उतना ध्यान नहीं रखते, वे दृष्टि से परे हैं सो हम जैसा चाहे उनके साथ व्यवहार करते हैं. जितनी बार हम क्रोध करते हैं, मस्तिष्क और हृदय पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है. अति ठंडा अथवा अति गर्म भोजन लेने पर दोनों ही स्थति में हमारा पेट प्रभावित होता है. आलस्य और प्रमाद का असर हड्डियों और मांसपेशियों को भुगतना पड़ता है. लोभ और ईर्ष्या का कुप्रभाव हमारी आँतों पर पड़ता है. न जाने कितने व्यर्थ के भय हम पाले रहते हैं, जिसका असर रक्त वाहिनियों पर पड़ता है. 

Saturday, April 22, 2017

मुक्त यहाँ स्वयं से ही होना

२३ अप्रैल २०१७ 
अपने ही संस्कारों में बंधे-बंधे हम जीवन को एक संघर्ष बना लेते हैं. हमें अच्छी तरह ज्ञात है, हमारे लिए कैसा भोजन उचित है, किस मात्रा में उचित है पर संस्कार वश उसी भोजन को हम ग्रहण करते हैं जो आज तक करते आ रहे हैं और जिसके कारण स्वास्थ्य पर असर पड़ा है. क्रोध करने से सदा ही हानि उठायी है पर संस्कार वश उन्हीं  बातों पर पुनः-पुनः झुंझला जाते हैं. यही तो बंधन है और दूसरा कोई बंधन नहीं है जिसे साधना के द्वारा हमें खोलना है. अपने ही मन के बनाये जाल को तोडकर भीतर एक ऐसी शुद्ध सत्ता को जन्म देना है जो किसी भी तरह के आग्रह से मुक्त हो, जो सहज ही अपना हित चाहने वाली हो, जिससे अहित होने का कोई डर ही न रहे, अन्यथा हम स्वयं ही अपने शत्रु बन जायेंगे और दोष भाग्य अथवा परिस्थिति पर ड़ाल देंगे. स्वयं के हर भाव, विचार और कर्म की जिम्मेदारी लिए बिना हम मनुष्य होने के अधिकारी नहीं हो सकते. 

Tuesday, September 29, 2015

मुक्त हुआ मन उड़े गगन में


ज्ञान मन को मुक्त कर देता है. आत्मा का ज्ञान पाकर ही बुद्धि वास्तव में बुद्धि कहलाने की अधिकारिणी है. उसके पहले मन तो पाश में बंधा होता है, बुद्धि भी एक अधीनता का जीवन जीती है. मन की आधीन, इन्द्रियों की आधीन, धन, प्रसिद्धि, प्रशंसा की आधीन, मोह, क्रोध, अहंकार की  आधीन तथा और भी न जाने मन की कई सुप्त प्रवृत्तियों की अधीनता उसे स्वीकारनी पड़ती है. किन्तु आत्मा का ज्ञान होने के बाद जैसे कोई परदा उठ जाता है. मन, बुद्धि स्वयं को कितना हल्का महसूस करते हैं. 

Thursday, November 27, 2014

चलो चलें अब निज देश में

मई २०१४ 
बोलते समय हमारी वाणी के साथ हमारे भीतर की तरंगे भी प्रभावित करती हैं, वाणी यदि मधुर होगी तो तरंगे प्रेम लेकर वाणी से पहले ही पहुंच जायेंगी और भीतर यदि कटुता है, खीझ है, क्रोध है, अहंकार है तो वाणी से पहले वही सब तरंगें लेकर जाएँगी, बात का असर नहीं होगा बल्कि हमारी बात अभी कही भी नहीं गयी उसके प्रति नकारात्मक भाव पहले ही जग उठा होगा. भीतर का वातावरण शांत हो, मधुर हो तभी तो तरंगे ऐसी होंगी और ऐसा तभी सम्भव हो सकता है जब हम भीतर उस जगह रहना सीखें जहाँ कोई विक्षेप नहीं है, जहाँ एक सी सौम्यता है, जहाँ न अतीत का दुःख है न भविष्य का डर, जहाँ निरंतर वर्तमान की सुखद वायु बहती है. मन से परे आत्मा के उस आंगन में हम अपना निवास बनाएं जहाँ प्रेम, आनंद, शान्ति के कुछ है ही नहीं. हम जब जरूरत हो तभी चित्त, बुद्धि, मन तथा अहंकार के क्षेत्र में जाएँ अपना काम करके तत्क्षण अपने घर में लौट आयें तब मन में उठे विचार भी शुद्ध होंगे, बुद्धि भी पावन होगी तथा स्मृतियाँ भी सुखद बनेंगी और शुद्ध अहंकार होगा. वाणी तथा कर्मों की शुद्धता अपने आप आने लगेगी, ऐसे में हमारी वह शक्ति जो अभी व्यर्थ चिन्तन, वाचन में चली जाती है बचेगी, ध्यान में लगेगी तथा लोकसंग्रह भी स्वतः ही होने लगेगा.

Wednesday, October 29, 2014

बलिहारी गुरू आपने

अप्रैल २००७ 
सद्गुरु में ज्ञान की सुगंध होती है जो हमें अपनी ओर खींचती है. उसमें प्रेम की आध्यात्मिक सुरभि होती है जो हमें आकर्षित करती है. एक पवित्र गंध ईश्वर की याद का साधन होती है. जो रब की याद दिलाये उसका विश्वास कराए, जिसे देखकर सिर अपने आप झुक जाये. वही तो सद्गुरु होता है. सद्गुरु हमें अनंत की ओर ले जाता है, वह सारी सीमाएं तोड़कर असीम को जानने का, उसे पाने का निमन्त्रण देता है ! तन पवित्र हो, स्वच्छ हो, स्वस्थ हो, मन निर्द्वन्द्व  हो, निर्भार हो तभी आत्मा अपने पूर्ण रूप में भीतर प्रकट होती है. आत्मा का स्वभाव है आनंद, प्रसन्नता और प्रेम ! वह शांति की सुगंध समोए है जो रह रहकर रिसती है, पर जब न तो तन के स्वास्थ्य का ध्यान हो न मन सजदे में झुका हो तो आत्मा भीतर कैद ही रह जाती है और हम जीवन भर दुर्गन्ध का शिकार होते रहते हैं. ईर्ष्या से जलता हुआ, क्रोध और अहंकार से ग्रसित मन सिवाय दुर्गन्ध के क्या दे सकता है, भीतर यदि प्रेम होगा तो वह प्रकटे बिना रह ही सकता.. कितना सरल है और कितना सहज है उस प्रेम को पाना जो हमारा निज का स्वभाव है. 

Monday, August 18, 2014

ज्ञान की अग्नि जलाएं

जनवरी २००७ 
अनियंत्रित कामना के कारण ही क्रोध आता है. जो ज्ञानी हैं, उनका क्रोध पानी पर लकीर जैसा होता है, जो ज्ञान की साधना कर रहे हैं उनका क्रोध बालू पर लकीर जैसा, जो ज्ञान के इच्छुक हैं वे उतनी देर तक क्रोध में बने रहते हैं जितनी देर मिट्टी पर लकीर रहती है और जो अभी ज्ञान के पथ पर नहीं आये हैं, उनके हृदय में क्रोध उतनी देर तक बना रहता है जितनी देर लोहे पर लकीर. कामना विजातीय है, क्रोध भी विजातीय है, तभी हम उन्हें भीतर नहीं रख पाते, झट  प्रकट कर देते हैं. मनोजयी साधक प्रसन्नता को प्राप्त होता है, हर पल उसे आनन्द ही बना रहता है. साधक की कई बार परीक्षा भी होती है. उपलब्धि को यदि वह कृपा मानता है तो अभिमान से बचा रहता है. साधना का पहला सोपान है अंतःकरण की पवित्रता और अन्तिम सोपान है अंतःकरण की पवित्रता, यह साधना निरंतर चलती रहती है. मन जब निर्मल होता है तब ही उसमें समता आ पाती है, तब हर तरह की परिस्थिति में वह शांत रहता है. ज्ञान की अग्नि से कामना जल जाती है. 

Monday, June 9, 2014

मनवा शीतल होए

अप्रैल २००६ 
किसी ने हम पर क्रोध किया और हम जल गये तो इसका अर्थ है नियति ने हमारे घड़े को खाली करना चाहा था पर हम खाली न हुए. मन घट के समान है, ऐसा मन जो परमात्मा द्वारा सहेजा गया है, वह नहीं जलता, न अपने न दूसरों के क्रोध की अग्नि में. वह खाली है और वही शीतल जल से भरा जाता है, कुम्हार द्वारा तपाये घड़ों में भी जो जल जाता है वह व्यर्थ हो जाता है, जो नहीं जलता वही काम में आता है. सन्त यह भी कहते हैं, जो तप गया वह कांच, जो नहीं तपा वह हीरा है.


Wednesday, March 26, 2014

प्रज्ञा का इक दीप जला हो

अक्तूबर २००५ 
भारत की संस्कृति अद्भुत है, यह कहती है जब हम अपने स्वभाव में नहीं होते तब खंड-खंड होते हैं और जब कोई वस्तु या घटना हमें अपने स्वभाव में लौटा लती है तो वह हमें प्रिय हो जाती है. शास्त्र हमें वह कुंजी देते हैं जिनसे हम अपने आप में लौटते हैं. जब हम विकार ग्रस्त होते हैं तो स्वयं से दूर हो जाते हैं. कामनाओं की पूर्ति के अभाव में हम क्रोध का शिकार होते हैं, जब तक प्रज्ञा के द्वारा हमारा समाधान नहीं होता तब तक क्रोध नहीं जाता. जब तक अपेक्षाएं हैं तब तक हम क्रोध से मुक्त नहीं हो सकते, जब हम तृप्त हो जाते हैं तब इस जगत में पूर्ण शांति के साथ रह सकते हैं. तप, जप, स्मरण, वन्दन, अर्चन सारी साधनाओं का एक ही हेतु है कि अंत करण शुद्ध हो, पवित्र हो ताकि स्वभाव में टिकना सहज हो जाये.

Wednesday, January 1, 2014

शुभता का ही वरण करें हम

जून २००५ 
हमारे भीतर का ज्ञान, व्यवहार तथा वाणी से ही प्रकट होता है, हम यदि झुंझला जाते हैं, खिन्न हो जाते हैं अथना टेढ़ा बोलते हैं तो हम हिंसा कर रहे होते हैं, जिसका पहला शिकार हम स्वयं होते हैं. वाणी के साथ-साथ हमारे हाव-भाव तथा व्यवहार की सूक्ष्म तरंगें भी सामने वाले व्यक्ति को छूती है. हमारे भीतर क्रोध, भय आदि के संस्कार हैं, परिस्थिति आने पर यदि हम भय अथवा क्रोध के शिकार नहीं होते उससे बच निकलते हैं तो वह संस्कार नष्ट होने लगता है अन्यथा उर्वरक भूमि पाते ही जमने लगता है और वृक्ष रूप में बढ़ने लगता है, भविष्य में उसमें अनेकों फल लगने ही वाले हैं तथा अनेकों बीज बनने वाले हैं, जिससे दुःख ही दुःख मिलने वाले हैं. इसी तरह भीतर प्रेम व शांति के संस्कार भी छुपे हैं हैं. प्रेम की तरंगे शब्दों से पहले ही सम्मुख उपस्थित व्यक्ति के हृदय को छू लेती हैं, वे निशब्द होकर भी बहुत कुछ व्यक्त कर देती हैं. प्रेम का एक बीज भविष्य में वट वृक्ष बनने वाला है. 

Monday, January 21, 2013

सत्यम शिवम सुन्दरम ही अध्यात्म है


फरवरी २००४ 
हम पदार्थ और ऊर्जा दोनों से बने हैं. शरीर पदार्थ से बना है, और मन ऊर्जा से, शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हम अनेकों प्रयत्न करते हैं वैसे ही मन को स्वस्थ करने के लिए ही अध्यात्म है. सौंदर्य प्रियता, सत्य के लिए प्रेम, शुभ के प्रति श्रद्धा ही अध्यात्म है. जब हम अध्यात्म से दूर होते हैं तो क्रोध, मोह तथा विस्मृति के शिकार होते हैं, तब जीवन एक दुखद श्रंखला बन जाता है, जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर सुख आता तो है पर टिकता नहीं. सहज प्राप्य प्रसन्नता ही शाश्वत सुख है, जो अध्यात्म की साधना से ही मिलता है.

Sunday, September 16, 2012

कहते हैं किसको मुक्ति


अगस्त २००३ 
आजादी का अर्थ क्या है, आजादी यानि हमारे मन की आजादी, कोई बंधन नहीं, पूर्ण मुक्त, जीवन मुक्त, न इच्छाओं का बंधन न कामनाओं का, न लोभ का, न मोह का न ईर्ष्या का न अहंकार का. हम हैं ही क्या इस विशाल ब्रह्मांड के सम्मुख और हममें या अन्य किसी में अंतर ही क्या है तो हम किसका अहंकार करें और किससे  ईर्ष्या करें. यह जगत हमें दे ही क्या सकता है जो हमारे पास पहले से ही नहीं है, तो हमें लोभ भी क्यों हो. कौन यहाँ पूर्ण है तो क्रोध किस पर करें. जब हम ही अपूर्ण हैं तो हमें क्या अधिकार है कि क्रोध करें. यही सारे विकार ही तो हैं जो हमें गुलाम बनाते हैं. सद्गुरु हमें आजाद करते हैं, सारे बंधनों से मुक्ति दिलाते हैं. हम बिन पंखों के मुक्त गगन में उड़ने लगते हैं. हम उस देश के वासी हैं जहां रोग नहीं, शोक नहीं, आनंद ही आनंद है. जहां करुणा है, प्रेम है, जहां अपनत्व है, जहां अद्वैत है, जो ब्रह्म का देश है, जो कृष्ण का वृन्दावन है, गोकुल है, जहां प्रेम की वंशी बजती है. जहां विकारों के असुरों का कृष्ण नाश कर देते हैं. जहां अंतर में मन की राधा का मन के कृष्ण से निरंतर मिलन होता है. ऐसी मुक्ति ही वास्तविक मुक्ति है जिसे एक बार पाने के बाद पुनः हमें गुलाम नहीं बनना है. मुक्ति का एक बार स्वाद जो ले ले फिर उसे सोने की जंजीरें भी बांध नहीं पाएंगी वह तो अमृत पान कर चुका है फिर क्यों पोखर के पास जायेगा. संत तभी हमें साधना, सेवा, सत्संग और स्वाध्याय के मार्ग पर चलने का परामर्श देते हैं, यही पथ मुक्ति का पथ है.