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Thursday, August 19, 2021

ध्यान फलित हो जब जीवन में

जब मन सीमित होता है  तब असीम को जान नहीं पाता। उधेड़बुन में लगा रहता है तो विश्राम नहीं पाता । जब कुछ न कुछ चाहता है तब उतना ही पाता है। जिस क्षण भी हर चाह  खो जाती है,  अस्तित्त्व बरस जाता है। ध्यान का अर्थ है हर चाह, हर क्रिया, हर पहचान  खो जाए, वही रहे  जो सदा से है और सदा रहेगा। वहीं से प्रेम और शांति का दरिया बहेगा । उन पलों में कोई बोझ नहीं उठाना होगा, किसी को कुछ करके नहीं दिखाना होगा। ऊर्जा निर्बाध तन में बहेगी, प्रकृति  जिसका उपयोग सहज ही करेगी। कृत्य होंगे पर कर्ता नहीं होगा। ध्यान मुक्ति का मार्ग दिखाता है और  स्वयं से मिलाता है। 


Wednesday, October 29, 2014

बलिहारी गुरू आपने

अप्रैल २००७ 
सद्गुरु में ज्ञान की सुगंध होती है जो हमें अपनी ओर खींचती है. उसमें प्रेम की आध्यात्मिक सुरभि होती है जो हमें आकर्षित करती है. एक पवित्र गंध ईश्वर की याद का साधन होती है. जो रब की याद दिलाये उसका विश्वास कराए, जिसे देखकर सिर अपने आप झुक जाये. वही तो सद्गुरु होता है. सद्गुरु हमें अनंत की ओर ले जाता है, वह सारी सीमाएं तोड़कर असीम को जानने का, उसे पाने का निमन्त्रण देता है ! तन पवित्र हो, स्वच्छ हो, स्वस्थ हो, मन निर्द्वन्द्व  हो, निर्भार हो तभी आत्मा अपने पूर्ण रूप में भीतर प्रकट होती है. आत्मा का स्वभाव है आनंद, प्रसन्नता और प्रेम ! वह शांति की सुगंध समोए है जो रह रहकर रिसती है, पर जब न तो तन के स्वास्थ्य का ध्यान हो न मन सजदे में झुका हो तो आत्मा भीतर कैद ही रह जाती है और हम जीवन भर दुर्गन्ध का शिकार होते रहते हैं. ईर्ष्या से जलता हुआ, क्रोध और अहंकार से ग्रसित मन सिवाय दुर्गन्ध के क्या दे सकता है, भीतर यदि प्रेम होगा तो वह प्रकटे बिना रह ही सकता.. कितना सरल है और कितना सहज है उस प्रेम को पाना जो हमारा निज का स्वभाव है. 

Friday, November 23, 2012

भीतर कोई देखे मौन


नवम्बर २००३ 
हम साक्षी मात्र हैं, सुख-दुःख के भोगी नहीं हैं. द्वन्द्वातीत हैं, चिन्मय हैं, अजन्मा, अविनाशी हैं, हम मुक्त हैं. जगत में यह सामर्थ्य नहीं कि हवा के झोंके को बांध सके, चट्टानों को बेधकर आती जलधारा को रोक सके. हम चैतन्य हैं, शाश्वत हैं, मृत्यु हमसे घबराती है, हम कालातीत हैं. काल का हम पर कोई वश नहीं चलता. हमारी शक्ति असीमित है, हम असीम, अनंत गगन के सम व्याप्त हैं. हमसे ही यह संसार है, यह हमारा खेल स्थल है, नाट्यशाला है. प्रकृति के गुण अपना-अपना कार्य कर रहे हैं. गुणों के बद्ध होकर जीव कभी सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक भाव में रहते हैं जो जिस भाव में स्वयं है वह जगत को उसी भाव देखता है. हम तीनों गुणों से परे हैं. यह दृष्टि सद्गुरु से प्राप्त होती है और स्वयं ईश्वर इसे दृढ़ता प्रदान करता है. वह हमारे अंतर में रहकर सारे रहस्यों को स्वयं ही खोलता है. सब कुछ कितना स्पष्ट है. हम कहाँ से आये हैं, क्यों आए हैं, कहाँ जाना है, क्यों जाना है, हम कौन हैं, किसके हैं, इन सारे प्रश्नों के उत्तर हमारे भीतर मिलते हैं. सद्गुरु हमें ध्यान सिखाते हैं और अपनी कृपा दृष्टि बरसाते हैं, उस कृपा में जाने कैसा जादू है कि हमारा भीतर-बाहर एक हो जाता है. हम रस से भर जाते हैं. आनंद की एक बाढ़ हमारे भीतर प्रवाहित होती है जो सारे भूत को बहा ले जाती है, हम नवीन हो जाते हैं. सारी दुश्चिंताएँ, सारी कल्पनाएँ जो बद्ध मन के कारण उत्पन्न हुई थीं, नष्ट हो जाती हैं. हम साधना के पथ पर चलने के अधिकारी बन जाते हैं. ईश्वर हमारा हाथ थाम कर स्वयं इस पथ पर ले जाता है.

Tuesday, October 30, 2012

मिले समाधि से समाधान


हम सभी एक विशाल समष्टि के अंग हैं, इस नाते सभी एक-दूसरे से बंधे हैं पर हमारी अलग-अलग पहचान है, जब यह पहचान भी नहीं रहती तब मन सारी सीमाओं को तोड़कर असीम में मिल जाता है. हममें से हरेक की चेतना अनंत है पर हम छोटे-छोटे दायरों में बंधे होने के कारण उस विशालता का अनुभव नहीं कर पाते हैं. समाधि की अवस्था में सम्भवतः ऐसा ही अनुभव होता है, सारा का सारा ब्रह्मांड एक तत्व से बना है यह स्पष्ट होता है, फिर कोई भेद नहीं, अद्वैत का अनुभव होने के बाद अंतर में राग-द्वेष नहीं रह सकते.

Wednesday, February 22, 2012

चेतनत्व बिखरा चहुँ ओर


दिसंबर २००२ 
कभी किसी डाली से लगे फूल को सहला कर देखें तो लगता है वह हमारे स्पर्श को महसूस कर रहा है. जीवन कितना अद्भुत है...हर वस्तु में चेतना है, एक ही चेतना का सभी में स्पंदन है. हम वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में देखें तो सब कुछ कितना सुंदर है. एक नंग-धडंग, मिट्टी से सना  अनपढ़ बच्चा  भी अपने भीतर वही चेतना छिपाए है, असीम सम्भावनाओं का भंडार...हमारा शरीर, मन, बुद्धि भले ही सीमा से बंधे हों, पर हमारी आत्मा यानि जो हम वास्तव में हैं, वह अपरिमित है. उसके सान्निध्य में हम भी असीम हैं, जीवन मुक्त, चिन्मय और शाश्वत !

Thursday, July 7, 2011

प्रेम और मोह

अगस्त २००० 
प्रेम एक व्यापक तत्व है, समुन्दर की तरह विशाल और आकाश की तरह निस्सीम ! जहाँ भी, जिसके भी हृदय में प्रेम होगा वह सबके लिये, प्राणी मात्र के लिये होगा. मोह एक संकीर्ण धारा की तरह है. मोह बंधन में डालता है जबकि प्रेम मुक्त करता है. नीला आकाश हमारी आत्मा का मूल स्वभाव है, स्वच्छ, निर्मल, मुक्त और असीम. विचारों के बादल उसे आच्छादित कर भी लें तो भी हमें उसकी स्मृति को बनाये रखना है प्रतिक्षण, प्रतिपल ! हमारा मन जो चारों दिशाओं में बिखरा-बिखरा सा रहता है उसे एकत्र करना है, एक रूप देना है. यह संसार जैसा हमें दिखाई देता है वास्तव में वैसा है नहीं. पल-पल बदलते इस संसार को बस साक्षी भाव से देखते जाना है. प्रतिक्रिया ही दुःख का कारण है, देर-सबेर सत्य अपने-आप ही सम्मुख आ जाता है, सत्य की स्थापना नहीं करनी पड़ती वह तो स्वयंभू है.