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Tuesday, June 12, 2018

जीवन नैया सदा डोलती


१२ जून २०१८ 
जीवन जितना सरल है उतना ही जटिल भी. यहाँ फूल के साथ कांटे भी हैं और सुख के साथ दुःख भी. यहाँ हर शै जोड़े में आती है. स्वास्थ्य के साथ रोग भी है और बचपन के साथ बुढ़ापा भी. जो इन दो के पार निकल गया वह बच गया जो दो में से एक को चाहता रहा और एक से बचता रहा, वह जीवन भर बंधन में फंसा रहा. पुण्य कर्म उदय होने पर सहज ही आनंद का अनुभव होता है, पाप का उदय होने पर विपत्ति आती है. सब कुछ सदा ही ठीक-ठीक चलता रहे ऐसी कामना जो करता है, उसे दो के पार ही जाना होगा. उस स्थिति में मन साक्षी भाव में टिकना सिख जाता है. साक्षी भाव में रहकर, कर्त्तव्य कर्म को पालन करते हुए अपने जीवन को उन्नत बनाने का प्रयत्न करने वाले साधक के जीवन में भविष्य के लिए पाप कर्म जमा नहीं होते. उसका वर्तमान भी संतुष्टिदायक होता है.

Wednesday, October 29, 2014

बलिहारी गुरू आपने

अप्रैल २००७ 
सद्गुरु में ज्ञान की सुगंध होती है जो हमें अपनी ओर खींचती है. उसमें प्रेम की आध्यात्मिक सुरभि होती है जो हमें आकर्षित करती है. एक पवित्र गंध ईश्वर की याद का साधन होती है. जो रब की याद दिलाये उसका विश्वास कराए, जिसे देखकर सिर अपने आप झुक जाये. वही तो सद्गुरु होता है. सद्गुरु हमें अनंत की ओर ले जाता है, वह सारी सीमाएं तोड़कर असीम को जानने का, उसे पाने का निमन्त्रण देता है ! तन पवित्र हो, स्वच्छ हो, स्वस्थ हो, मन निर्द्वन्द्व  हो, निर्भार हो तभी आत्मा अपने पूर्ण रूप में भीतर प्रकट होती है. आत्मा का स्वभाव है आनंद, प्रसन्नता और प्रेम ! वह शांति की सुगंध समोए है जो रह रहकर रिसती है, पर जब न तो तन के स्वास्थ्य का ध्यान हो न मन सजदे में झुका हो तो आत्मा भीतर कैद ही रह जाती है और हम जीवन भर दुर्गन्ध का शिकार होते रहते हैं. ईर्ष्या से जलता हुआ, क्रोध और अहंकार से ग्रसित मन सिवाय दुर्गन्ध के क्या दे सकता है, भीतर यदि प्रेम होगा तो वह प्रकटे बिना रह ही सकता.. कितना सरल है और कितना सहज है उस प्रेम को पाना जो हमारा निज का स्वभाव है. 

Saturday, June 14, 2014

द्रष्टा से जो जुड़ जाता है

अप्रैल २००६ 
मन की कल्पना ही हमें सुख-दुःख देती है, जो इस मन को कभी स्थिर कभी चलायमान देखता है, वही तत्व जानने योग्य है. जो हर एक के पीछे सामान्य सत्ता के रूप में स्थित है उससे जुड़े रहें तब प्रभु हमें बुद्धियोग देते हैं. उस जानने वाले को जानकर ही सन्त सहज हो जाते हैं और हमें भी वैसा ही बनाने का प्रयत्न करते हैं. हम जितने-जितने सरल व सहज होते हैं, उतने-उतने ही दुखों से दूर होते जाते हैं, जब हम सारे आग्रह छोड़ देते हैं तो जीवन अपने आप चलने लगता है. सारे कार्य तो वैसे भी हो रहे हैं, हम व्यर्थ ही स्वयं को कर्ता मानकर अभिमान का भार ढोते हैं. 

Sunday, March 2, 2014

मन निस्पंद हुआ जिस पल

अगस्त २००५ 
जैसे-जैसे हम सरल होते हैं, सहज होते जाते हैं, कोई छल-कपट हमारे भीतर नहीं रहता, कोई चाह हमें पीड़ित नहीं करती. हमारी सारी आवश्यकताएं अपने-आप पूरी होने लगती हैं, हम उस हाकिम के, उस खुदा के, अल्लाहताला के, परवरदिगार के हाथों में कितने सुरक्षित हैं, कोई भय हमें नहीं सताता, वर्तमान में ही रहने की कला हम सीखते जाते हैं, यह जीवन तब फूल से भी हल्का हो जाता है, जैसे हम हवा में तैर रहे हों, कोई भार नहीं, न मन पर न तन पर, तन हल्का हो तो कार्य भी आनन्द का स्रोत हो जाते हैं. तब कुछ करने के बाद सुखी होंगे अथवा कुछ न करके सुखी होंगे, यह भ्रमणा मिट जाती है. हम बिना कुछ किये या करके हर हाल में ही आनन्द की स्थिति का अनुभव कर सकते हैं. ऐसा तभी होता है जब इस सत्य का पता चल जाता है, इस सत्य का कि हमारे मन का सुख-दुःख एक भ्रम ही है जो हम स्वयं ही खड़ा कर  लेते हैं और जगत को जिम्मेदार ठहराते हैं जबकि ऐसा है नहीं, जगत में हमें वही दीखता है जो हमारे मन में होता है. मन यदि शुद्ध स्फटिक के समान हो निर्मल हो तो उसमें सुंदर छवि ही दिखेगी, और वह छवि आत्मा की होगी, आत्मा जो परमात्मा में स्थित है, वही ब्रह्म है, उसके सिवा कुछ है ही नहीं, एक वही चेतना कण-कण में व्याप्त है, जगत तो मन का स्पंदन ही है, जब कोई स्पंदन नहीं तो मात्र उसी की सत्ता रह जाती है.

Tuesday, August 21, 2012

भक्ति में मस्ती है


जुलाई २००३ 
‘अजब राज है इस मुहब्बत के फसाने का, जिसको जितना आता है गाए चला जाता है’ ! वह परमात्मा हर क्षण हमें अपनी ओर खींचता है, वह हमारे मन की सूक्ष्म से सूक्ष्म बात जानता है. वह हमें हमारी ही कल्पना के अनुसार मिलता है, जिस रूप में हम उसका ध्यान करें उसी रूप में वह नजर आता है. कोटि-कोटि ब्रह्मांडों का स्वामी हमारे प्रेम को स्वीकारता है, उसकी महानता का कोई अंत नहीं. वह जीवन देता है, मन-बुद्धि देता है, और स्वयं को भी दे देता है. वह एक ही अनेक होकर विद्यमान है. अद्भुत खेल रचाया है उसने. पर वह कितना सरल है, एक नवजात शिशु सा निष्पाप और सरल. वह हमें भी वैसा ही देखना चाहता है. वह हमसे अपने स्तर पर मिलना चाहता है. वह हमसे प्रेम करता है ! 

Friday, June 15, 2012

जब वह अपना सा लगता है


अप्रैल २००३ 
यह सारा अस्तित्त्व हमारा अपना है और जहाँ अपनत्व होता है वहीं प्रेम होता है. सुख-सुविधा और सम्पत्ति के लिये तो जन्मों-जन्मों प्रयत्न किये पर कहीं नहीं पहुँचे, अध्यात्म की दिशा में किया छोटा सा प्रयत्न हमें ऊँचाई पर ले जाता है. जहाँ श्रद्धा होती है, मन व बुद्धि उसी ओर जाते हैं. एक बार यदि मन पर चढ़ जाये तो भक्ति का रंग इतना पक्का होता है कि शेष सारे रंग उड़ जाते हैं और तब शाश्वत ज्ञान, शाश्वत आनंद व शाश्वत शांति हमारे मन में उदित होते हैं. विवेक जागृत होता है, कर्मयोग सधने लगता है. साधना के पथ पर मंत्र, गुरु व ईष्ट तीन दिखते हैं, पर वास्तव में वे एक ही हैं. उनमें से किसी एक से भी यदि प्रेम हो जाये तो साधना फूल सी हल्की व सरल हो जाती है. जब अज्ञान का आवरण हट जाता है तो उन बातों पर हँसी आती है जिनके लिये पहले बेचैन रहते थे, भ्रमित थे, मुक्ति की पहली श्वास हम तभी लेते हैं जब वस्तुएँ अपने वास्तविक रूप में प्रकट होने लगती हैं, हृदय निर्मल हो जाता है, वहाँ सिवाय शुद्ध प्रेम के कुछ भी नहीं रहता. अमनी भाव सधने लगता है.