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Thursday, June 18, 2015

मोह मिटे से हो जागरण

फरवरी २०१० 
मृत्यु के साथ यदि हमारी मित्रता हो तभी हम धर्म के पथ से विमुख रहकर भी प्रसन्न रहने की आशा रख सकते हैं. ऐसा हो नहीं सकता तो हमें मोह तथा आसक्ति को छोड़कर अनासक्ति का मार्ग चुनना ही पड़ेगा. मोह ही दुःख का सबसे बड़ा कारण है. मोह का अर्थ है विपरीत ज्ञान, विवेकहीनता तथा असजगता. विपरीत ज्ञान अर्थात स्वयं को केवल देह और मन तक ही सीमित मानना. मन उदास होता है तो शरीर अस्वस्थ होने ही वाला है. हमारी नकारात्मक भावनाएं शरीर पर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकतीं. बुद्धि यदि निर्मल न रही तो सही-गलत का भी बोध नहीं रहता. मन के पार जाकर ही उस आनंद का अनुभव होता है जो दिव्य है.   

Sunday, November 30, 2014

लहरों सा मन गिरता उठता

जून २०१४ 
‘मैं कुछ हूँ’ से ‘मैं हूँ’ तथा ‘मैं हूँ’ से ‘है’ तक की यात्रा ही अध्यात्म की यात्रा है. जब ‘है’ की अनुभूति होती है तो कोई भेद नहीं रहता. समाधि की अवस्था तभी मिलती है. मन जब अपने मूल स्वरूप में टिक जाये तत्क्षण समाधि घटती है. आत्मा शुद्ध चिन्मात्र सत्ता है, वह आकाशवत है. मन उसमें उठने वाला एक आभास ही तो है. मन को जब हम अलग सत्ता दे देते हैं तभी बंधते हैं. जहाँ द्वैत है वहाँ दुःख है. विचार भी उसी आत्मा की लहरें हैं जो आनन्दमयी है. भीतर उठने वाले सारे संशय, डर तथा भ्रम उसी आत्मा से ही तो उपजे हैं, वे दूसरे नहीं हैं, उनसे कैसा डर. विचार तो शून्य से उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाने वाला है. सागर क्या अपनी लहरों से डरेगा चाहे लहर कितनी भी बलशाली  क्यों न हो, आकाश क्या बादलों की गर्जन से डरेगा ?  आत्मा सागर की तरह गहरी और आकाश की तरह अनंत है, वह निर्मल है, वह जहाँ है वहाँ न कोई गुण है न दुर्गुण, वहाँ कुछ भी नहीं है, निर्दोष, अनछुई वह शुद्ध प्रकाश है. प्रकाश का कोई आकार नहीं, वह उससे भी सूक्ष्म है. 

Sunday, March 2, 2014

मन निस्पंद हुआ जिस पल

अगस्त २००५ 
जैसे-जैसे हम सरल होते हैं, सहज होते जाते हैं, कोई छल-कपट हमारे भीतर नहीं रहता, कोई चाह हमें पीड़ित नहीं करती. हमारी सारी आवश्यकताएं अपने-आप पूरी होने लगती हैं, हम उस हाकिम के, उस खुदा के, अल्लाहताला के, परवरदिगार के हाथों में कितने सुरक्षित हैं, कोई भय हमें नहीं सताता, वर्तमान में ही रहने की कला हम सीखते जाते हैं, यह जीवन तब फूल से भी हल्का हो जाता है, जैसे हम हवा में तैर रहे हों, कोई भार नहीं, न मन पर न तन पर, तन हल्का हो तो कार्य भी आनन्द का स्रोत हो जाते हैं. तब कुछ करने के बाद सुखी होंगे अथवा कुछ न करके सुखी होंगे, यह भ्रमणा मिट जाती है. हम बिना कुछ किये या करके हर हाल में ही आनन्द की स्थिति का अनुभव कर सकते हैं. ऐसा तभी होता है जब इस सत्य का पता चल जाता है, इस सत्य का कि हमारे मन का सुख-दुःख एक भ्रम ही है जो हम स्वयं ही खड़ा कर  लेते हैं और जगत को जिम्मेदार ठहराते हैं जबकि ऐसा है नहीं, जगत में हमें वही दीखता है जो हमारे मन में होता है. मन यदि शुद्ध स्फटिक के समान हो निर्मल हो तो उसमें सुंदर छवि ही दिखेगी, और वह छवि आत्मा की होगी, आत्मा जो परमात्मा में स्थित है, वही ब्रह्म है, उसके सिवा कुछ है ही नहीं, एक वही चेतना कण-कण में व्याप्त है, जगत तो मन का स्पंदन ही है, जब कोई स्पंदन नहीं तो मात्र उसी की सत्ता रह जाती है.

Wednesday, December 11, 2013

सच की नाव खेवइया सतगुरु

मई २००५ 
जब भी हमने चित्त को मैला किया, हमें दंड मिला है, हम स्वयं को दुखी बनाते हैं और दुखी व्यक्ति दूसरों को भी दुख देता है. जैसा-जैसे चित्त निर्मल होता है, हम सुखी होते हैं और स्वयं सुखी व्यक्ति औरों को भी सुख देता है. जब-जब हम सजगता त्याग देते हैं, पहले अपनी हानि होती है फिर दूसरों की हानि होती है. जब यह बात समझ में आती है तभी वास्तविक रूप से हम धर्म का जीवन जीते हैं. धर्म की रक्षा करें तो धर्म हमारी रक्षा करता है. सत्य के निकट होते ही शांति, प्रेम तथा आनन्द का अनुभव होता है तथा सत्य से दूर जाते ही पीड़ा का, पीड़ा का अनुभव भला कौन चाहता है ?


Friday, June 15, 2012

जब वह अपना सा लगता है


अप्रैल २००३ 
यह सारा अस्तित्त्व हमारा अपना है और जहाँ अपनत्व होता है वहीं प्रेम होता है. सुख-सुविधा और सम्पत्ति के लिये तो जन्मों-जन्मों प्रयत्न किये पर कहीं नहीं पहुँचे, अध्यात्म की दिशा में किया छोटा सा प्रयत्न हमें ऊँचाई पर ले जाता है. जहाँ श्रद्धा होती है, मन व बुद्धि उसी ओर जाते हैं. एक बार यदि मन पर चढ़ जाये तो भक्ति का रंग इतना पक्का होता है कि शेष सारे रंग उड़ जाते हैं और तब शाश्वत ज्ञान, शाश्वत आनंद व शाश्वत शांति हमारे मन में उदित होते हैं. विवेक जागृत होता है, कर्मयोग सधने लगता है. साधना के पथ पर मंत्र, गुरु व ईष्ट तीन दिखते हैं, पर वास्तव में वे एक ही हैं. उनमें से किसी एक से भी यदि प्रेम हो जाये तो साधना फूल सी हल्की व सरल हो जाती है. जब अज्ञान का आवरण हट जाता है तो उन बातों पर हँसी आती है जिनके लिये पहले बेचैन रहते थे, भ्रमित थे, मुक्ति की पहली श्वास हम तभी लेते हैं जब वस्तुएँ अपने वास्तविक रूप में प्रकट होने लगती हैं, हृदय निर्मल हो जाता है, वहाँ सिवाय शुद्ध प्रेम के कुछ भी नहीं रहता. अमनी भाव सधने लगता है.