फरवरी २०१०
मृत्यु के साथ
यदि हमारी मित्रता हो तभी हम धर्म के पथ से विमुख रहकर भी प्रसन्न रहने की आशा रख
सकते हैं. ऐसा हो नहीं सकता तो हमें मोह तथा आसक्ति को छोड़कर अनासक्ति का मार्ग
चुनना ही पड़ेगा. मोह ही दुःख का सबसे बड़ा कारण है. मोह का अर्थ है विपरीत ज्ञान,
विवेकहीनता तथा असजगता. विपरीत ज्ञान अर्थात स्वयं को केवल देह और मन तक ही सीमित
मानना. मन उदास होता है तो शरीर अस्वस्थ होने ही वाला है. हमारी नकारात्मक भावनाएं
शरीर पर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकतीं. बुद्धि यदि निर्मल न रही तो सही-गलत का
भी बोध नहीं रहता. मन के पार जाकर ही उस आनंद का अनुभव होता है जो दिव्य है.