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Friday, April 3, 2015

एक ही मौसम रहता है तब

दिसम्बर २००८ 
एक साधक के जीवन में दो ही ऋतुएं होती हैं, एक जब वह ईश्वर या गुरू से निकटता का अनुभव करता है और दूसरी वह जब उनसे दूरी का अनुभव करता है. लेकिन ईश्वर की कृपा इतनी असीम है कि वह साधक को दूसरी ऋतु में देखना नहीं चाहती. वह पुनः उसी निकटता का अनुभव कराना चाहती है जिसे पाकर भीतर प्रेम की लहर दौड़ जाती है, परम शांति का अनुभव होता है. भीतर कृपा का सागर लहरा रहा है. खुदा का अर्थ ही है वह जो खुद आये, हमें केवल उसका इंतजार करना है पूरे मन के साथ. जब मन पूरी तरह ठहर जाता है, तब ही कालातीत से परिचय होता है. 

Sunday, March 2, 2014

मन निस्पंद हुआ जिस पल

अगस्त २००५ 
जैसे-जैसे हम सरल होते हैं, सहज होते जाते हैं, कोई छल-कपट हमारे भीतर नहीं रहता, कोई चाह हमें पीड़ित नहीं करती. हमारी सारी आवश्यकताएं अपने-आप पूरी होने लगती हैं, हम उस हाकिम के, उस खुदा के, अल्लाहताला के, परवरदिगार के हाथों में कितने सुरक्षित हैं, कोई भय हमें नहीं सताता, वर्तमान में ही रहने की कला हम सीखते जाते हैं, यह जीवन तब फूल से भी हल्का हो जाता है, जैसे हम हवा में तैर रहे हों, कोई भार नहीं, न मन पर न तन पर, तन हल्का हो तो कार्य भी आनन्द का स्रोत हो जाते हैं. तब कुछ करने के बाद सुखी होंगे अथवा कुछ न करके सुखी होंगे, यह भ्रमणा मिट जाती है. हम बिना कुछ किये या करके हर हाल में ही आनन्द की स्थिति का अनुभव कर सकते हैं. ऐसा तभी होता है जब इस सत्य का पता चल जाता है, इस सत्य का कि हमारे मन का सुख-दुःख एक भ्रम ही है जो हम स्वयं ही खड़ा कर  लेते हैं और जगत को जिम्मेदार ठहराते हैं जबकि ऐसा है नहीं, जगत में हमें वही दीखता है जो हमारे मन में होता है. मन यदि शुद्ध स्फटिक के समान हो निर्मल हो तो उसमें सुंदर छवि ही दिखेगी, और वह छवि आत्मा की होगी, आत्मा जो परमात्मा में स्थित है, वही ब्रह्म है, उसके सिवा कुछ है ही नहीं, एक वही चेतना कण-कण में व्याप्त है, जगत तो मन का स्पंदन ही है, जब कोई स्पंदन नहीं तो मात्र उसी की सत्ता रह जाती है.

Sunday, June 12, 2011

आध्यात्मिक यात्रा


मई २०००
नुक्ते की फेर में जुदा हुआ
नुक्ता ऊपर रखा तो खुदा हुआ
हम भी अपने मन रूपी नुक्ते को सही जगह नहीं लगाते और ईश्वर से विमुख हो जाते हैं. बिना इसके मस्तिष्क को ज्ञान की हजारों बातें भर लेने से भी कोई लाभ नहीं होता, वह मात्र बौद्धिक विलास बन  कर रह जाता है. यदि वास्तव में अनुभव न किया जाये तो धर्म भी नशे की तरह है. धीरे धीरे ही सही आध्यात्मिक यात्रा जारी रखनी होगी. इस संसार को स्वप्न की भांति देखने की समझ आने लगे, दूसरों के दृष्टिकोण को देखने की तथा हरेक में उसी अन्तर्यामी के प्रकाश को देखने की समझ आने लगे व अपनी त्रुटियों को स्वीकारने की हिम्मत भी, इससे मानसिक ऊर्जा का ह्रास नहीं होता तथा मन कमल पत्तों पर पड़ी ओस की बूंदों की नांई शांत रहता है.