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Monday, July 31, 2023

आनंद की जब चाह जगे

जीवन यात्रा में चलते हुए मानव के सम्मुख लक्ष्य यदि स्पष्ट हो और सार्थक हो तो यात्रा सुगम हो जाती है। योग के साधक के लिए मन की समता प्राप्त करना सबसे बड़ा लक्ष्य हो सकता है और भक्त के लिए परमात्मा के साथ अभिन्नता अनुभव करना. कर्मयोगी अपने कर्मों से समाज को उन्नत व सुखी देखना चाहता है. मन की समता बनी रहे तो भीतर का आनंद सहज ही प्रकट होता है. परमात्मा तो सुख का सागर है ही, और निष्काम कर्मों के द्वारा कर्मयोगी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है, जिससे सुख का अनुभव होता है, अर्थात तीनों का अंतिम लक्ष्य तो एक ही है, वह है आनंद और शांति की प्राप्ति. सांसारिक व्यक्ति भी हर प्रयत्न सुख के लिए ही करते हैं, किन्तु दुःख से मुक्त नहीं हो पाते क्योंकि जगत का यह नियम है कि सुख-दुख यहाँ एक साथ मिलते हैं, अर्थात जो वस्तु आज सुख दे रही है, वही कल दुख देने वाली है। साधक, भक्त व कर्मयोगी तीनों को इस बात का ज्ञान हो जाता  है, तभी वह साधना के पथ पर कदम रखते हैं; और सदा के लिए दुखों से मुक्त हो जाते हैं। 


Tuesday, June 6, 2023

जिस पल भी मन ठहरेगा

जीवन परम विश्रांति का साधन बन सकता है, यदि कोई अंतर्मुखी होकर अपने भीतर झांके। तीव्र गति से भागते हुए दरिया से मन को आहिस्ता-आहिस्ता बांध लगाये, फिर थिर पानी में स्वयं की गहराई का अनुभव करे। उस शांत ठहरे हुए मन की गहराई में पहली बार ख़ुद की झलक मिलती है। कोमल, स्निग्ध, शांति का अनुभव होता है। वह कितनी भी क्षणिक क्यों न हो, उसकी स्मृति सदा के लिए मन पर अंकित हो जाती है; फिर कभी ऊहापोह में फँसा मन उसी की याद करता है, उसे लगन लग जाती है। भक्ति का जन्म होता है। उसके प्रति आकर्षण कम नहीं होता, बढ़ता ही जाता है। इसमें चाहे कितना ही समय लग जाये, वर्षों का अंतराल हो पर एक न एक दिन वह स्वयं को अस्तित्व से जुड़ा हुआ जानता है। यही समाधि का क्षण है। 


Sunday, January 29, 2023

डरना जिसने छोड़ दिया है

भय से मुक्ति मिले बिना मानव को विश्रांति प्राप्त नहीं हो सकती। जो कुछ उसके पास है, वह छिन जाने का भय, रिश्तों के टूट जाने का भय अथवा उनके सदा एक सा न बने रहने  का भय। दूसरों के मन में अपने प्रति स्नेह व सम्मान  को खो देने का भय। समाज में अकेले रह जाने का भय और दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं, इसका भय। असुंदर, अयश, निर्धन, अपकीर्ति, असफल  होने का भय; और भी न जाने कितने भय हैं जिनसे मन घिरा रहता है। सबसे बड़ा भय रोग अथवा मृत्यु का है, यह भी मानव मन को जकड़े रहता है। जहाँ भय है वहाँ प्रेम खो जाता है। संत जब ईश्वर से प्रेम करने की बात कहते हैं तो भयभीत व्यक्ति उसका अनुभव नहीं कर पाता, अथवा तो उन क्षणों में नहीं कर पाता जब इनमें से कोई भय मन की ऊपरी सतह पर आ गया है।अधिकतर समय तो ये भय अवचेतन में दबे रहते हैं और इनका भास नहीं होता। कोई परिस्थिति आने पर यदि मन डावाँडोल हो रहा है तो कोई न कोई भय सिर उठा रहा है। ऐसे में एक ही उपाय है इनसे मुक्ति का, साक्षी हो जाना। ये भय हमारे सत्य स्वरूप को छू भी नहीं पाते। जब कोई स्वयं की अनंतता को अनुभव कर लेता है तो सारे भय खो जाते हैं। साधना के द्वारा बार-बार अपने आप में स्थित होना सीखना है, एक दिन जब सारे भय अवचेतन से निकल कर सामने आ जाएँगे और मन में हलचल नहीं होगी उस क्षण हम इनसे सदा के लिए मुक्त हो जाएँगे।   


Monday, December 19, 2022

देवों का सहयोग मिले जब

परमात्मा सर्वशक्तिमान है, वह सर्जक है, नर्तक है, वह दृष्टा है, स्वप्नदर्शी है। वह अनंत है और अनंत हैं उसके उसके आयाम। उसके हर गुण, हर क्षमता को एक देवी या देवता का रूप दे दिया गया है। इसलिए देवी-देवता अनेक हैं। मानव का हृदय जब स्वार्थ से ऊपर उठ जाता है,  उसमें उन देवताओं का वास हो जाता है। महापुरुषों में दैवीय गुण होते हैं और असुरों में आसुरी शक्तियों का वास बन जाता है। हमें यदि प्रेम, शांति, आनंद जैसे गुणों को अपने भीतर धारण करना है तो इनके देवताओं का वरण करना होगा। उनका स्मरण मात्र करना होगा; तथा अपनी सच्ची आकांक्षा के अनुरूप हम पाएँगे कि वे हमारे आस-पास ही विचरते हैं। पुराणों में लिखी देवों की कहानियाँ प्रकृति के अटल, सत्य नियमों का निरूपण हैं। अतीत काल से मानव व देव मिलजुल कर इस धरती पर आते रहे हैं। दोनों ही परमात्मा की कृति हैं। जब मानव ने विज्ञान को ही सब कुछ मान लिया , वह भूल ही गया कि विज्ञान के नियमों के पीछे भी वही शक्ति है। अब समय आ गया है कि विज्ञान और अध्यात्म एक ही मार्ग पर चलें और यह धरती अपने वैभव को प्राप्त हो। 


Thursday, November 17, 2022

मन के जो भी पार हुआ है

हमारे विचार शुभ हों, उनमें दिव्यता की झलक हो तो ईश्वरीय आनंद हमारे चारों तरफ़ अनुभव होने लगता है। यह जीवन एक अवसर के रूप में हमें मिला है, इसे सँवारना हमारे अपने हाथों में है। ईश्वर की  हज़ार-हज़ार शक्तियाँ हमारी सहायता के लिए तत्पर हैं, उनकी कृपा अनवरत बरस रही है। हमें उसकी तरफ़ स्वयं को उन्मुख करना है। अभी हम मनमुख हैं, अपने मन के ग़ुलाम, मन की छोटी-छोटी इच्छाओं, कामनाओं और संवेगों के इशारे पर चलते हैं। मन आदतों का एक पुंज है इसलिए हम बार-बार उन्हीं कृत्यों को करते हैं। जीवन एक दोहराव बन जाता है। हम कहीं पहुँचते हुए नहीं पाए जाते; जब तक मन के इस दुश्चक्र से बाहर निकल कर यह निर्णय नहीं लेते हैं कि जीवन की वास्तविकता आख़िर है क्या ? क्या सुख-दुःख के झूले में झुलाने के लिये ही धरती पर इतना आयोजन हुआ है। जगत में जो इतना अत्याचार, अनाचार चल रहा है, वह स्वार्थी मनों का ही तो परिणाम है। हर कोई अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगा है। पर इससे दुनिया सुंदर तो नहीं बन रही। हम इस दायरे से बाहर नकलते हैं तो स्वयं को एक विस्तृत आकाश में पाते हैं, जो शांति का घर है। 


Sunday, December 5, 2021

तोरा मन दर्पण कहलाये

हमारा तन स्वस्थ रहे ताकि हम साधना कर सकें, साधना करें ताकि मन स्वस्थ रहे, मन स्वस्थ रहे ताकि अंतर साधना हो सके, अंतर साधना हो ताकि मन निर्मल हो, मन निर्मल हो ताकि उसमें परम सत्य का प्रकाश हो, परम सत्य को पायें क्यों कि सत्य ही शिव और सुंदर है, शिव को पायें ताकि हम सभी के लिए सुखद हो जाएँ, हमारे होने से जड़-चेतन किसी को कोई उद्वेग न हो, न ही हमें किसी से कोई उद्वेग हो. सौन्दर्य को पाकर हम चारों ओर सुन्दरता बिखेरें. कुछ भी ऐसा न कहें, सोचें, न करें जो इस जगत को क्षण भर के लिए भी असुन्दर बना दे. ईश्वर की इस सुंदर सृष्टि को देख-देख हम चकित होते हैं, विभोर होते हैं, भीतर प्रेम का अनुभव करते हैं तो और भी चकित होते हैं, कैसे अद्भुत भाव भीतर जगते हैं, यह क्या है? कौन है? किसे अनुभव होता है? कौन अनुभव कराता है? कौन प्रेम देता है? कौन प्रेम लेता है ? ये सारे भाव शब्दों की पकड़ में नहीं आते. संतों की आँखों से ये पल-पल झरते हैं.

Sunday, November 7, 2021

शून्य में ही पूर्ण छिपा है

परमात्मा का एक गुण है वह दिखायी नहीं देता; इसलिए ऐसा लगता है वह  है ही नहीं, किंतु वास्तव में  हर कहीं वही है। उसके बिना कुछ भी नहीं उपजता  है, इस सृष्टि में  हर कतरा उसकी शक्ति से भरा हुआ है,  उससे कभी कुछ छिपा नहीं है। हम देखते हैं कि अक्सर हमारा  चाहा हुआ नहीं घटता है, इससे हम अशांत हो जाते हैं। जब हम परमात्मा की सत्ता को स्वीकार कर लेते हैं तब अंतर में शांति बनी रहती है। अनादि काल से यह दुनिया निज राह पर चल रही है, कुछ ही ऐसे होते हैं जो उसे जानने  का दम भरते हैं जो है ही नहीं, पर जो इस जगत का आधार है। एक वैरागी या योगी के पास बाहर कुछ भी न हो  फिर भी उसके मस्तक पर एक कांति दमकती है और उसका आत्मबल नज़र आता है।जगत में रहते हुए भी यदि चीजों, घटनाओं और व्यक्तियों पर अपनी पकड़ हम छोड़ दें, कहीं कोई अपेक्षा न रखें तो मन उस शून्यता को अनुभव कर सकता है जो वास्तव में पूर्ण है। 


Saturday, November 6, 2021

जीवन में जब उतरे ध्यान

 अध्यात्म के बिना रोजमर्रा की उलझनों में खोया हुआ मानव जीवन के एक महान अनुभव से वंचित रह जाता है. नित्य ही हम जगत की अस्थिरता का अनुभव करते हैं, जिसकी शुरुआत हमारे तन से ही होती है. तन कभी स्वस्थ है कभी अस्वस्थ, आज युवा है तो कल वृद्ध होगा. हमारे देखते-देखते ही कोई न कोई परिचित काल के गाल में समा जाता है. मन की अवस्था भी एक सी नहीं रहती, सुबह जो मन उत्साह से भरा था शाम होते-होते शारीरिक अथवा मानसिक थकान से मुरझा जाता है. वक्त पड़ने पर बुद्धि भी साथ नहीं देती, सदा बाद में स्मरण आता है कि इस प्रश्न का उत्तर यह दिया जा सकता था. हर किसी को कभी न कभी पराजय का मुख देखना पड़ता है. जब बाहर कुछ भी हमारे नियंत्रण में प्रतीत न हो रहा हो तब भी हमारे भीतर एक सत्ता ऐसी है जो कभी बदलती ही नहीं, जो ऊर्जा से भरपूर है, उत्साह, शांति और आनंद जहाँ सहज ही निवास करते हैं. ध्यान के द्वारा ही हम उस अवस्था का अनुभव कर सकते हैं. गहरी नींद की अवस्था में अनजाने में हर कोई वहीँ पहुँच जाता है, इसी लिए नींद के बाद हम तरोताजा अनुभव करते हैं. 

Saturday, October 23, 2021

बहे काव्य की धारा अविरल

काव्य कल्पना की वायवीय उड़ान है तो गद्य वस्तविकता की ठोस भूमि पर चलना। दोनों के क्षण मानव के जीवन में आते रहते हैं। किसी अनोखे आनंद को पाकर, कुछ ऐसा जानकर जो पहले कभी  जाना नहीं गया था अथवा कुछ ऐसा जानकर जो इस जगत का भी जान नहीं पड़ता, मन उस अलौकिक लोक में विचरण करता है। उस रस को व्यक्त करना गद्य में सम्भव ही नहीं है। वह इतना सूक्ष्म है कि शब्दों में भी नहीं समाता, तब कुछ परिचित शब्दों में उसे बहाया जाता है जैसे भूमि पर कोई लकीर खींच दे और बहता हुआ जल उधर की तरफ़ बह जाए। कवि केवल उस अनाम अनुभव को एक रास्ता देता है और वह जो उसके मन को घेरे हुए था, वह ऊर्जा शब्दों के रूप में बह जाती है। शब्द ऊर्जा ही तो हैं, जिनमें भावों का परिवर्तन होता है,  फिर वे स्थित हो जाते हैं। गतिमय ऊर्जा स्थाई हो जाती है। दूसरी ओर जब भीतर का अनुभव स्थायी हो गया हो तो मन में वेग नहीं उठता और अब स्थायी ऊर्जा को गतिमान बनाना है तो गद्य का जन्म होता है। भीतर एक स्थिरता है, शांति है और भाव भी शांत हो गये हैं। कौतूहल अब पहले की तरह ज़मीन से उखाड़ नहीं देता आकाश में उड़ने के लिए, इसलिए शब्द थम- थम कर आते हैं। 


Monday, June 14, 2021

स्वधर्म में जो टिक पाए

 भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से स्वधर्म में स्थित होकर युद्ध करने के लिए कहते हैं. स्वधर्म यानि आत्मा का धर्म, प्रेम और शांति का धर्म ! हृदय में प्रेम रहे और अंतर की गहराई में स्थित शांति का अनुभव होता रहे, उसके बाद ही कोई जीवन के संघर्ष में बिना किसी भय के उतर सकता है. यदि भीतर क्रोध है और मन अशांत है तो जीवन का संघर्ष हम लड़े बिना ही हार सकते हैं. यदि लड़ते भी हैं तो हमारी आधी ऊर्जा अपने आपको संभालने में ही व्यय होती है. हम अपने जीवन में कई धर्म निभाते हैं, एक मानव का धर्म, नागरिक का धर्म, पुत्र या पिता का धर्म, पति या पत्नी, शिष्य या शिक्षक का अथवा अपनी आजीविका कमाते समय अधिकारी या कर्मचारी का धर्म. ये सभी धर्म कभी-कभी एकदूसरे के विरोधी हो सकते हैं. देश सेवा करते हुए कोई अपने परिवार के प्रति उपेक्षा कर सकता है. कोई अपने काम में इतना खो जाता है कि परिवार स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है. किन्तु यदि कोई आत्मा के धर्म में स्थित रहकर इन्हें निभाये तो सभी धर्म स्वतः ही निभने लगते हैं. जीवन में प्रेम और शांति के फूल खिले हों तो कोई भी कर्म सहज होता है उसके लिए विशेष श्रम नहीं करना पड़ता. इसी कारण श्रीकृष्ण अर्जुन को योगी होने का उपदेश देते हैं. 


Tuesday, May 25, 2021

बुद्धम शरणम गच्छामि

 बुद्ध कहते हैं, जगत परिवर्तनशील है, यहाँ सब कुछ नश्वर है, वस्तुओं के पीछे भागना व्यर्थ है और संबंधों के पीछे भी, भीतर की शांति और आनंद को यदि स्थिर रखना है तो अपने भीतर ही उसका अथाह स्रोत खोजना होगा। शांति और आनंद से मन को भरकर ही करुणा के पुष्प खिलाए जा सकते हैं ! हमारे पास यदि स्वयं ही प्रेम नहीं है तो हम किसी को दे कैसे सकते हैं ! बुद्ध ध्यान पर बहुत जोर देते हैं और शील के पालन पर भी। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अलोभ और अक्रोध पर साथ ही प्रज्ञा पर भी। वे अनुभव करके स्वयं जानने को कहते हैं न कि किसी की बात पर भरोसा करके ! पहले मन को सभी इच्छाओं, कामनाओं, लालसाओं से ऊपर ले जाकर खाली करना होगा। यशेषणा, वित्तेषणा, पुत्रेष्णा और जीवेषणा से ऊपर उठकर भीतर के आनंद को पहले स्वयं अनुभव करना होगा फिर उसे बाहर वितरित करना होगा। वह कहते हैं, जगत में अपार दुख है, दुख का कारण अज्ञान है, अज्ञान को दूर करने का उपाय ध्यान है, ध्यान से ही दुख और शोक के पार जाया जा सकता है। अहंकार को मिटाकर ही कोई इस पथ का यात्री बनता है । धरती, पवन, अनल और जल की तरह धैर्यवान, सहनशील, परोपकारी और पावन बनकर ही बुद्ध ने अपने जीवनकाल में हजारों लोगों के जीवन को सुख की राह पर ला दिया था।


Wednesday, November 11, 2020

जीवन इक वरदान बने जब

 सत्य को परिभाषित करना कुछ ऐसा ही है जैसे हवा को मुट्ठी में कैद करना. जगत में जो भी शुभ है, जो भी शुभता को बढ़ाने वाला है, शांति और आनंद को प्रदान करता है, वह सत्य है, शिव है, सुंदर है, वही परमात्मा है.  एक अनंत शक्ति जो सभी को अपना मानती है, जिसके मन में करुणा और प्रेम का सागर है, उसको अनुभव करने का अर्थ है स्वयं भी सब जगह उसी को देखना. देह मानकर हम स्वयं को सीमित समझते हैं, मन के रूप में फ़ैल जाते हैं, आत्मा के रूप में हमारे सिवा कोई दूसरा नहीं है, ऐसा अनुभव किया जा सकता है. ऐसे परमात्मा को जीवन में अनुभव करना हो तो आत्मा के निज धर्म का पालन करना होगा. प्रार्थना के हजार शब्दों को सुनने या याद करने से वह सुख नहीं मिल सकता जो शुभता बढ़ाने वाला एक छोटा सा कृत्य दे सकता है. जब स्वार्थ बुद्धि हट जाती है, मन स्वयं को कर्ता मानना छोड़ देता है, तब ही भीतर हल्कापन महसूस होता है और जीवन परमात्मा से मिले एक उपहार की तरह प्रतीत होता है.


Wednesday, April 22, 2020

पृथ्वी दिवस मनाएं हम


आज पृथ्वी दिवस है, अर्थात पृथ्वी के प्रति सम्मान दिखाने का दिवस ! पृथ्वी जो हमारी माँ है, जिसने हमें जीवन दिया है, जो हमारा पोषण करती है, जो हमें सुख देती है. इस अनंत ब्रह्मांड में जहाँ जीवन को खिलने का अवसर मिलता है, उस धरती का हम कितना ही गुणगान करें, कम है. वह पृथ्वी आज घायल है, अपशिष्ट पदार्थों का एक बड़ा भंडार उस पर बोझ बन गया है, वह हर कूड़े को खाद बना देती है पर उसे समय तो मिले. मानव कचरे का ढेर दिन-रात बढ़ाता ही जा रहा है, जल में रसायनों और प्लास्टिक डालता ही जा रहा है. मानव जब अपनी करनी से बाज नहीं आ रहा था तब शायद प्रकृति ने ही कोरोना के रूप में एक विपदा भेजी है. आज जब हम घरों में बैठे हैं, पृथ्वी अपने को स्वच्छ कर रही है अर्थात पृथ्वी अपना दिवस स्वयं ही मना रही है. वेदों में पर्यावरण की सुरक्षा के लिए कितने ही मन्त्र गाये गए हैं. आज आवश्यकता है उन्हें फिर से दोहराने की, जिससे हमारा यह सुंदर ग्रह फिर से अपनी खोयी हुई शांति और सुंदरता को प्राप्त कर सके. हरे-भरे जंगल, उनमें विचरते हुए निःशंक प्राणी और प्रकृति का संरक्षण करता हुआ मानव समाज फिर से अस्तित्त्व में आ सके. 

Thursday, November 7, 2019

गहरे पानी पैठिये


जगत में जिस किसी को भी जिस शै की तलाश है, उसे पाने के लिए खुद ही वह बन जाना होता है. इस जगत का अनोखा नियम है यह, यहाँ स्वयं होकर स्वयं को पाना होता है. तपता हुआ सूरज बन कर ही प्रकाश फैलाना सम्भव है, हिम शिखर हुए बिना शीतलता क्योंकर बिखरेगी, प्रेम यदि पाना है तो स्वयं प्रेम बने बिना कहाँ मिलेगा इसी तरह शांति का अनुभव भी शांत हुए बिना नहीं खिलेगा. आनन्दित हुए बिना ख़ुशी की कामना व्यर्थ है. हम कर्म के द्वारा ख़ुशी पाना चाहते हैं, यह हिसाब ही गलत है. कर्म जब आनंदित होकर किया जायेगा तभी वह निष्काम होगा। सन्त कहते हैं, वास्तव में इस जगत में हमें कुछ पाने जैसा क्या है, जो भी कीमती है, वह परमात्मा ने मन की गहराई में छिपा दिया है, अब कीमती वस्तु इधर-उधर तो रखी नहीं जा सकती न, हम बाहर से जब मुक्त हों तब मन में उतरें और उसे खोज लें, यही काम करने योग्य है.

Sunday, September 29, 2019

अमन हुआ जो मुक्त वही है



जब तक मन संकुचित है वह डोलेगा ही, ऐसा मन अशांति का ही दूसरा नाम है. जो मन दिखावा करता है, तुलना करता है, वह उद्ग्विन हुए बिना नहीं रहेगा. स्वार्थ से भरा हुआ मन भी अकुलाहट से भर जाता है. विशाल मन का अर्थ है अमनी भाव में आ जाना. संत कहते हैं अमन हुए बिना समाधान नहीं मिलता. क्योंकि मन होने का अर्थ ही है अहंता का होना, जो है वह अपने अस्तित्त्व की रक्षा के लिए अन्य का विरोध करेगा ही, इसीलिए सिर काटने और घर जलाने की बात कबीर कह गये हैं. मन के मिटे बिना आत्मिक शांति का अनुभव नहीं किया जा सकता. चेतना जब पूर्ण विश्राम में होती है, अर्थात समाधि में होती है, तब मन खो जाता है. जब हम विचारधारा में बह जाते हैं मन के प्रभाव में होते हैं, जब हम विचार के साक्षी होते हैं, अप्रभावित बने रह सकते हैं. किंतु समाधि का अनुभव शून्यता में ही किया जा सकता है.

Friday, August 2, 2019

प्रेम और शांति



'युद्ध और शांति' इन शब्दों से हम सभी परिचित हैं, कोई राष्ट्र अथवा उसकी सेना के लिए काल को दो खंडों में परिभाषित किया जाता है, एक युद्ध काल तथा दूसरा शांति काल, दोनों एक साथ नहीं होते. एक के बाद एक आते हैं. किंतु हम यहाँ बात कर रहे हैं प्रेम और शांति की जो साथ-साथ होते हैं. प्रेम होता है तो वातावरण शांत हो जाता है अथवा जब शांति होती है तो प्रेम भीतर से फूटने लगता है. रात्रि की नीरवता में ओस की बूंदों के रूप में प्रेम ही बरसता है, तथा जब बादल बरस कर जल के रूप में प्रेम बरसा रहे हों तो बाद में वातावरण कितना शांत व शुभ्र प्रतीत होता है. धरा की गहराई में पूर्ण नीरवता में बीज प्रेम में ही मिटता है और नये अंकुर का जन्म होता है. परिवार के सदस्यों के मध्य यदि प्रेम सहज रूप से विद्यमान रहे तो घर में शांति रहती है. यदि प्रेम की उस धारा में कोई रुकावट आ जाये तो घर की शांति भंग हो जाती है. प्रेम और शांति हमारा मूल स्वभाव है, हमारा निर्माण इनसे ही हुआ है. हम मानवों ने तन तो ऊपर से ओढा हुआ है. मन व बुद्धि जहाँ से उपजे हैं, वह स्रोत प्रेम ही है और वहाँ गहन शांति है.

Saturday, July 13, 2019

अंतर्मन जब कहीं न उलझे



प्रशांत चित्त ही ब्रह्म का अनुभव कर सकता है. जैसे लालटेन का शीशा प्रकाश को बढ़ा देता है, वैसे ही चित्त आत्मा को शक्ति को बढ़ाकर बाहर भेजता है. शीशा जितना स्वच्छ होगा, प्रकाश उतना ही बाहर आएगा. चित्त यदि पूर्ण रूप से संतुष्ट हो, उसे कोई कामना ही न हो चित सुलझा हुआ हो, उसमें कोई द्वंद्व न हो, तो वह शांत रह सकता है. मन यदि कहीं भी उलझा हुआ है तो वह साधना में आगे नहीं बढ़ सकता. शांत मन में चिति शक्ति आत्म शक्ति को विस्तृत करके बाहर प्रकाशित कर देती है. छोटी-छोटी बातों पर जब मन प्रतिक्रिया करना छोड़ देता है तो वह शांत हो जाता है. ठहरा हुआ मन एक शांत झील की तरह होता है, जिसमें आत्मा झलकती है. साधना की गहराई में जाना हो तो मन शांत होना चाहिए.

Thursday, April 11, 2019

मन में हो स्वीकार भाव जब



साधक का लक्ष्य उस ‘एक’ को पाना है, जो प्रेम, शांति, ज्ञान, शक्ति व पवित्रता का सागर है. यदि वह कुछ और पाने के लिए परमात्मा से प्रार्थना करता है, तो वह अभी साधक ही नहीं हुआ. जिसके हृदय में कृतज्ञता का भाव हो और मन में प्रसन्नता का फूल खिला हो, उससे सत्य अपने को ज्यादा देर तक छुपा नहीं सकता. यदि किसी के भी प्रति हृदय में शिकायत का भाव है तो कृतज्ञता अभी सधी नहीं है, यदि किसी भी कारण से मन कुम्हला जाता है तो प्रसन्नता पर अभी अधिकार नहीं हुआ. परमात्मा आनंदित रहकर ही पाया जा सकता है. जब हम जगत को जैसा वह है वैसा ही स्वीकार कर लेते हैं तब भीतर से कृतज्ञता का भाव जगता है और मन में जगत के प्रति कोई द्वेष नहीं रहता.

Wednesday, November 14, 2018

मुक्तिबोध बने साधन सुख का


१५ नवम्बर २०१८ 
चेतना यदि मुक्त है तो ही स्वयं का अनुभव कर पाती है. मन की गहराई में छिपे प्रकाश की झलक उसे मिलती है. अंतर सुख की धार में भीग कर अखंड शांति का अनुभव उसे मिलता है. मुक्ति का स्वाद जिसने एक बार भी चख लिया है वह जगत में रहकर भी बंधा हुआ नहीं है. हम भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए जितना समय व ऊर्जा व्यय करते हैं, उससे आधा भी स्वयं को जानने में नहीं लगाते. हमारे शास्त्रों का मूल मन्त्र है, “असतो मा सद गमय”. हमें उस सत्य तक पहुंचना है जो सदा एक रस है. जगत में रहते हुए सभी कुछ करते हुए भी उस सत्य का अनुभव किया जा सकता है, आवश्यकता है उसके प्रति श्रद्धा भाव जगाने की. शास्त्रों के अध्ययन व संतों के सत्संग से ही भीतर इस परम श्रद्धा का उदय व्यक्ति के भीतर होता है.  

Monday, October 15, 2018

भाव जगे जब निज स्वरूप का


१५ अक्तूबर २०१८ 
संत कहते हैं, “न अभाव में रहो, न प्रभाव में रहो, मात्र निज स्वभाव में रहो” यह छोटा सा सूत्र जीवन में परिवर्तन लाने के लिए अति सहायक सिद्ध हो सकता है. शांति, प्रेम, आनंद, पवित्रता, उत्साह, उदारता, सृजनात्मकता, कृतज्ञता, सजगता आदि हमारे सहज स्वाभाविक गुण हैं, जब हम इनमें या इनमें से किसी के भी साथ होते हैं, हमें न कोई अभाव प्रतीत होता है, न ही किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति का प्रभाव हम पर पड़ता है. अभाव का अनुभव करते ही हम तत्क्षण स्वभाव से दूर चले जाते हैं. इसी प्रकार किसी के गुणों, वैभव आदि से प्रभावित होते ही भीतर हलचल होने लगती है, शांति खो जाती है. शास्त्र हमें समझाते हैं, हमारा निज स्वभाव अनंत शांति से भरा है, वह परमात्मा से अभिन्न है. हर जीव उसी परमशक्ति का अंश है, उसे भला किस वस्तु का अभाव हो सकता है. देह एक साधन है, जिसे बनाये रखने के लिए पर्याप्त संपदा हमें प्राप्त है. जिन्हें भोजन, वस्त्र और निवास प्राप्त हैं, उन्हें यदि कोई अभाव सताता है तो यह अज्ञान से ही उत्पन्न हुआ है.