Showing posts with label लक्ष्य. Show all posts
Showing posts with label लक्ष्य. Show all posts

Sunday, April 21, 2024

लक्ष्य उच्च होगा जब अपना

मानव के सम्मुख लक्ष्य यदि स्पष्ट हो तो जीवन यात्रा सुगम हो जाती है। मन की समता बनी रहे तो भीतर का आनंद सहज ही प्रकट होता है, इसलिए योग के साधक के लिए मन की समता प्राप्त करना सबसे बड़ा लक्ष्य हो सकता है। परमात्मा तो सुख का सागर है ही, इसलिए भक्त के लिए परमात्मा के साथ अभिन्नता अनुभव करना उसका लक्ष्य है. निष्काम कर्मों के द्वारा कर्मयोगी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है, इसलिए कर्मयोगी अपने कर्मों से समाज को उन्नत व सुखी देखकर  सुख का अनुभव करता है। तीनों का अंतिम लक्ष्य तो एक ही है, वह है आनंद ! देखा जाये तो सांसारिक व्यक्ति भी हर प्रयत्न सुख के लिए ही करते हैं, किन्तु दुःख से मुक्त नहीं हो पाते क्योंकि उन्होंने अपने सम्मुख कोई बड़ा लक्ष्य नहीं रखा. 


Thursday, April 6, 2023

ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना

जीवन एक यात्रा है, इसका अर्थ हुआ कि इस यात्रा का कोई उद्देश्य भी होगा और कोई लक्ष्य भी अवश्य होगा। जैसे यदि हमें कश्मीर की यात्रा पर जाना है तो हमारा लक्ष्य है कश्मीर और उद्देश्य है कश्मीर की सुंदरता को देखकर आनंदित होना।यदि हमारे जीवन का उद्देश्य भी इस जगत की सुंदरता को देखकर आनंदित होना बन जाए तो लक्ष्य तो पहले से ही प्राप्त हो चुका है, अर्थात हम मानव जन्म लेकर इस धरती पर आ चुके हैं। अब जैसे कश्मीर की यात्रा में हमें सहयात्री भी मिलेंगे, जिनसे हम प्रसन्न होकर बात करेंगे; कुछ बाधाएँ भी आ सकती हैं, जिन्हें यात्रा में आने वाली छोटी-मोटी दिक़्क़त समझकर हम नज़र अंदाज़ कर देंगे। जीवन की इस यात्रा में भी हमें परिवार, मित्र, समाज के रूप में सहयात्री मिलते हैं। कभी कोई कष्ट भी सहने पड़ते हैं। इनके बावजूद यदि हम अपना उद्देश्य सदा याद रखें तो हर पल आनंद का अनुभव कर सकते हैं। कश्मीर की यात्रा से हमारे कारण कुछ लोगों का रोज़गार चलेगा और हमारा ज्ञान बढ़ेगा, सहनशक्ति बढ़ेगी और देश में विभिन्न राज्यों के लोगों में भाईचारा और आपसी विश्वास भी बढ़ेगा। ऐसे ही जीवन में हमारा अल्पकाल का वास दूसरों के लिए लाभ का कारण बने, समाज में प्रेम का संदेश फैले, और हमारा व्यवहार ऐसा हो कि आपसी विश्वास को ठेस न पहुँचे तो आनंद पाने का हमारा उद्देश्य सहज ही पूर्ण हो जाएगा। 


Tuesday, September 20, 2022

लक्ष्य साध ले जो जीवन का

जीवन में किसी भी कर्म को करने का निर्णय लेने से पहले हमें यह ध्यान रखना होगा कि क्या इस कर्म का परिणाम हमें केवल अल्पकालीन आनंद देगा । यदि थोड़े से सुख के लिए हम भविष्य के लिए दुःख का इंतज़ाम कर रहे हैं तो ऐसा कर्म किसी भी तरह करणीय नहीं है। यदि किसी कर्म से हमें थोड़ा कष्ट भी उठाना पड़े किंतु उसका परिणाम बाद में अच्छा हो तो वह कर्म अवश्य करना चाहिए। सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए जीवन को स्वीकार भाव से जीना हमें सफलता के मार्ग पर ले जाता है।एक बार जब हम किसी भी लक्ष्य को तय कर लें अथवा किसी कार्य के प्रति प्रतिबद्ध हों तो उसे प्राप्त किए बिना छोड़ना नहीं चाहिए। जीवन का मार्ग अपने उत्तरदायित्वों पर आधारित हो न कि भावनाओं पर, जो सदा बदलती रहती हैं। उत्तरदायित्व के प्रति निष्ठा से आत्मिक शक्ति प्रकट होती है। भावनाओं से मुक्ति मन को स्वतंत्रता का आभास कराती है। जीवन अनिश्चितताओं से भरा है। यहाँ सदा उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इनके मध्य भी जो सदा आनंदित व  उत्साहित रहना सीख ले वही सफल कहा जाता है। 


Wednesday, November 4, 2020

ध्यान के पथ का जो राही है

 

एक बार किसी साधक ने किसी संत से पूछा, ध्यान की कितनी विधियाँ हैं ? संत मुसकुराते हुए बोले, आज तक जितनी बार किसी ने ध्यान किया है हर बार एक नई विधि का जन्म हुआ है, जब परमात्मा  अनंत है तो उस तक पहुँचने के मार्ग भी अनंत ही होने चाहिए। इसलिए दुनिया में इतने धर्म हैं, इतने पंथ, संप्रदाय और मत हैं, सभी का लक्ष्य एक है पर हरेक अपनी प्रकृति और स्वभाव के अनुसार इस मार्ग पर चलता है। इसलिए भगवद गीता में कृष्ण ने भक्ति योग, ज्ञान योग, कर्म योग, ध्यान योग, जपयोग, प्रेम योग सभी का उल्लेख किया है। हर कोई जाने-अनजाने उसके पथ का ही राही है। जो स्वयं को नास्तिक मानता है वह भी और जो अपने को आस्तिक मानता है वह भी। परमात्मा से मिलने की इच्छा के जगने का अर्थ है मानव होने की गरिमा को अनुभव करना। एक शिशु जिस आनंद को सहज ही अनुभव करता है उसे पुन: पा लेना अथवा स्वयं के सही स्वरूप से मिलन। संसार से एकत्व ही इसकी परिणति है। समता की प्राप्ति ही इस मिलन पर प्राप्त होने वाला उपहार है।   

Friday, April 19, 2019

स्वयं के बीज को जाना जिसने


जीवन को यदि पूर्णता तक पहुँचाना है, तो हमें अपने स्रोत को ढूँढना होगा. यदि हमारा स्रोत पूर्ण है तभी हमारा लक्ष्य भी श्रेष्ठ हो सकता है. हम कहते हैं कमल कीचड़ से निकलता है, लेकिन यह भूल जाते हैं कि कमल का जन्म अपने बीज से होता है, बीज अपने आप में पूर्ण है इसलिए कमल भी पूर्ण है, चाहे उसके आस-पास पंक ही क्यों न हो. देह पंचतत्वों से बनी है, और चेतना परम चैतन्य से. तत्व पूर्ण हैं और चैतन्य भी. अपने भीतर इनका अनुभव ही हमें पूर्णता का अनुभव कराता है. योग का मार्ग इसी और ले जाता है. मन को साधना के पथ पर ले जाना एक चुनौती है, जिसका सामना साधक को करना होता है. अपने भीतर झाँकने पर पहले-पहल पीड़ा भी होगी और बेचैनी भी, लेकिन जैसे-जैसे मन गहराई में जाता है, समाधान मिलने लगता है.

Thursday, April 11, 2019

मन में हो स्वीकार भाव जब



साधक का लक्ष्य उस ‘एक’ को पाना है, जो प्रेम, शांति, ज्ञान, शक्ति व पवित्रता का सागर है. यदि वह कुछ और पाने के लिए परमात्मा से प्रार्थना करता है, तो वह अभी साधक ही नहीं हुआ. जिसके हृदय में कृतज्ञता का भाव हो और मन में प्रसन्नता का फूल खिला हो, उससे सत्य अपने को ज्यादा देर तक छुपा नहीं सकता. यदि किसी के भी प्रति हृदय में शिकायत का भाव है तो कृतज्ञता अभी सधी नहीं है, यदि किसी भी कारण से मन कुम्हला जाता है तो प्रसन्नता पर अभी अधिकार नहीं हुआ. परमात्मा आनंदित रहकर ही पाया जा सकता है. जब हम जगत को जैसा वह है वैसा ही स्वीकार कर लेते हैं तब भीतर से कृतज्ञता का भाव जगता है और मन में जगत के प्रति कोई द्वेष नहीं रहता.

Friday, November 10, 2017

एक लक्ष्य जिसने भी साधा

१० नवम्बर २०१७ 
लक्ष्य यदि स्पष्ट हो और सार्थक हो तो जीवन यात्रा सुगम हो जाती है, योग के साधक के लिए मन की समता प्राप्त करना सबसे बड़ा लक्ष्य हो सकता है और भक्त के लिए परमात्मा के साथ अभिन्नता अनुभव करना. कर्मयोगी अपने कर्मों से समाज को उन्नत व सुखी देना चाहता है. मन की समता बनी रहे तो भीर का आनंद सहज ही प्रकट होता है. परमात्मा तो सुख का सागर है ही, और निष्काम कर्मों के द्वारा कर्मयोगी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है, जिससे सुख का अनुभव होता है, अर्थात तीनों का अंतिम लक्ष्य तो एक ही है, वह है आनंद और शांति की प्राप्ति. सांसारिक व्यक्ति भी हर प्रयत्न सुख के लिए ही करते हैं, किन्तु दुःख से मुक्त नहीं हो पाते क्योंकि उन्होंने अपने सम्मुख कोई बड़ा लक्ष्य नहीं रखा. 

Wednesday, July 20, 2016

मन हुआ जब सहज संतोषी

२१ जुलाई २०१६ 
हमें अपनी प्राथमिकताओं को समझना होगा. जीवन में हम क्या चाहते हैं, क्या सुख-सुविधा जुटाना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है. स्वयं को स्वस्थ व सुरक्षित बनाये रखने में ही क्या हमारी सारी ऊर्जा व्यय होती है. इन सबको प्राप्त करते हुए क्या भीतर तनाव भी होता है. यदि हाँ, तो हम जो चाहते हैं हमारे कर्म उसके विपरीत हैं, वे हमें अपने लक्ष्य से दूर ही ले जायेंगे. जीवन स्वयं में आनन्द है, जीवन मात्र ही अनंत सुख का स्रोत है, क्या इसका अनुभव होने पर कोई अभाव रहेगा. संतोष तब सहज स्वभाव बन जायेगा और स्वास्थ्य तब प्राप्त करना नहीं होगा, हम स्व में ही स्थित रहेंगे.  

Friday, August 28, 2015

प्रार्थना जब जगेगी भीतर


प्रार्थना में अपार शक्ति है, प्रार्थना हमें विनीत बनाती है, हमारी भीतरी अभीप्सा से रूबरू कराती है. हम अपने भीतर उतर कर जब टटोलते हैं कि आखिर हम चाहते क्या हैं, तब ही प्रार्थना का जन्म होता है. प्रार्थना जब अपने आप जगती है, तब पूरी भी अपने आप होती है. अंतर जब पवित्रता का अनुभव करता हो तब जो प्रार्थना जन्मेगी वह हमें लक्ष्य तक ले ही जाएगी. जब अंतर प्रतिस्पर्धा से मुक्त हो तब सहज ही जो पुकार उठती है भीतर वही मुक्त करती है. 

Friday, October 17, 2014

खिला खिला हो मन का उपवन


हमारे मन में न जाने कितने-कितने जन्मों की कामनाओं के संस्कार पड़े हुए हैं और उसी तरह न जाने कितने सद्गुण, खजाने स्नेह भाव भी पड़े हैं. यह बीज समुचित वातावरण पाते ही अंकुरित हो जाते हैं. हम जो भी पढ़ते-सुनते हैं या जिन व्यक्तियों के संपर्क में आते हैं, जिस प्रकार का भोजन ग्रहण करते हैं, उस स्थान, व्यक्ति या भोजन की प्रकृति हमें अवश्य प्रभावित करती है. संग का मानसिक उन्नति पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है. हमें जो चाहिए उसी के अनुकूल खाद व पानी दें तो मन का उपवन व्यर्थ के खर-पतवार तथा जंगली काँटों से मुक्त रहेगा. ईश्वर प्रकट हो सकेगा. अच्छाई और बुराई के बीच का महाभारत हर एक को अपने भीतर लड़ना है. यदि ईश्वर की निकटता का अनुभव करना, इस सृष्टि के रहस्य पर से पर्दा उठाना यदि जीवन का लक्ष्य नहीं तो मानव जीवन की सार्थकता ही नहीं रह जाती. इससे छोटे लक्ष्य तो हमें विपरीत दिशा में ले जाते हैं.   

Tuesday, July 22, 2014

एक सरस मुस्कान है भीतर

अक्तूबर २००६ 
संतजन कहते हैं, मानव जीवन पाकर भी जो भीतर की मुस्कान को जागृत नहीं कर सका वह पूर्ण जीया ही नहीं और वह धर्म भी धर्म नहीं जो सहज, मुक्त रूप से हमें हँसना नहीं सिखा देता. सहजता आती है जब कोई अपने कर्त्तव्यों का ठीक से निर्वाह कर सके. हमारा वास्तविक कर्त्तव्य क्या है, धर्म क्या है, यह गुरु ही हमें बताते हैं. शील, सत्य और स्नेह के गुणों के आधार पर भीतर की शक्ति को जागृत करने से ही कर्त्तव्य निबाहे जा सकते हैं. हमरा लक्ष्य स्पष्ट हो और ऐसा हो कि सत्य के निकट पहुंच सकें. सरल हृदय में ही धर्म निवास करता है. किसी तरह के कृत्रिम आवरण में हमें स्वयं को ढकना नहीं है, मृदुता को अपनाना है. विनम्रता को खोते ही हमारी चेतना विनाश की ओर चली जाती है. हम स्वयं को अभिव्यक्त कर सकें, अपने भीतर छिपी असंख्य शक्तियों को उजागर कर सकें. तभी हमारा इस जगत में आना सार्थक होगा और तभी भीतर की अमित मुस्कान पनपती है.


Sunday, July 6, 2014

एक डोर बांधे है सबको

सितम्बर २००६ 
लक्ष्य का चुनाव, एकाग्रता, तादात्म्य तथा अंत में गुणों का अपने भीतर संक्रमण यह साधना का क्रम है. साधक का लक्ष्य तो भाव शुद्धि, वाणी शुद्धि, तथा कर्म शुद्धि का ही हो सकता है. ये तीनो बातें सद्गुरु में अथवा इष्टदेव में हैं. उसके साथ तादात्म्य हो जाये तो उसके गुण अपने आप भीतर प्रवेश करने लगेंगे. जो चेतना हमारे भीतर है वही उनके भीतर है, उन्हें उसका ज्ञान है हम चाहे इससे अनभिज्ञ हों. वही चेतना हरेक के भीतर है, सभी एक-दूसरे पर आश्रित हैं, इसका बोध हमें भी करना है. स्वयं को सारी सृष्टि से पृथक मानना ही अहंकार है, जो सारे दुखों का कारण है.

Sunday, May 25, 2014

एकै साधे सब सधे

मार्च २००६ 
लक्ष्य निर्धारित हो तो कोई भी कार्य असम्भव नहीं है. उस की प्राप्ति में जो कुछ भी हमें करना पड़े, जो भी सहना पड़े वह सदा कल्याणकारी ही होगा, किन्तु लक्ष्य ऐसा हो जो हमें आगे बढ़ाए, उन्नति के पथ पर, विकास के पथ पर, जो सभी के लिए हितकर हो. प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य तो सर्वोपरि है, शेष सारे छोटे-मोटे लक्ष्य इसी में समा जाते हैं. ‘स्वयं’ को जानने का लक्ष्य भी इसी दिशा में ले जाता है. आनंद की खोज भी इसी दिशा में उठाया कदम है. सेवा, साधना, सत्संग व स्वाध्याय इस यात्रा में गति भरते हैं. 

Monday, May 19, 2014

एक लक्ष्य को सदा समर्पित

मार्च २००६ 
अपने मन के अनुकूल कुछ घटे तो मानना चाहिए हरिकृपा हो रही है और यदि प्रतिकूल हो तो विशेष कृपा मानकर सहर्ष ही उसे स्वीकार लेना चाहिए ! अनूकूलता हमें सुला सकती है, प्रतिकूलता में हम सजग होते हैं. संतजन तभी तो कहते हैं यह संसार दुखों का घर है, ताकि हम सुखों में खो न जाएँ. हो सकता है यह संसार कभी किसी के लिए सुखों का अम्बार लगा दे पर तब भी यदि वह सजग नहीं रहे तो छोटी सी भूल भी उसमें से दुःख पैदा कर सकती है. दैविक, भौतिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार की व्याधियों में से कोई न कोई मानव के साथ लगी ही रहती है, सजग होकर जब हम इनका सामना करते हैं तो ये हमें भीतर जाने का ज्ञान देती हैं . सत्य को जानने की उत्कंठा, सब दुखों से मुक्त होने की इच्छा भीतर जगती है. जब कोई लक्ष्य हमारे सम्मुख रहता है तो संसार की छोटी-छोटी बातें हमारा ध्यान नहीं खींच पातीं, हम उनसे ऊपर उठ जाते हैं. तब अनुकूलता-प्रतिकूलता में कोई भेद ही नहीं रहता.

Wednesday, December 4, 2013

मन के विश्राम में आत्मा का राम है

अप्रैल २००५ 
हम सभी का लक्ष्य आनन्द है, शांति है, प्रेम है, ऐसा प्रेम जो सदा एक सा हो, सतत् आनन्द तथा कभी न छूटने वाली शांति... और यही हमारा मूल स्वभाव है, प्रभु ने हमारी रचना इन्हीं तत्वों से की है, पर काल के प्रभाव से हम इस बात को भूल गये हैं और बाहर इन्हीं की खोज करते हैं, ये कभी तो हमें प्रयत्न पूर्वक मिल जाते हैं कभी छूट जाते हैं, सुख-दुःख के चक्र में हम निरंतर घूमते रहते हैं. हम सोचते हैं ये ऐसी वस्तुएं हैं जिनके लिए बड़ा ही श्रम करना पड़ता है, फिर इन्हें पाना होता है. पर ईश्वर अवश्य ही हमारी इस मूर्खता पर मन ही मन हँसता होगा, वह जब देखता होगा, इनकी प्राप्ति के लिए लोग न जाने कितने व्रत, उपवास, जप-तप करते हैं, पर अपने स्वभाव में कभी नहीं ठरते. वह सोचता होगा इन्हें भटक कर अंततः तो घर लौटना ही है. ये जब ईश्वर को भी खोज रहे होते हैं तो उससे इन्हीं की मांग करना चाहते हैं. ईश्वर, आनन्द, शांति और प्रेम सब एक के ही अनेक नाम हैं, ये तो हरेक के भीतर हैं पर मानव की दौड़ बाहर ही बाहर है, भीतर की उसे खबर ही नहीं, भीतर के नाम पर उसके पास कामनाओं से भरा मन है, वही तो सबसे बड़ी बाधा है भीतर जाने में ! 

Wednesday, September 18, 2013

हुकुम रजाई चालिए

फरवरी २००५ 
जब जीवन का लक्ष्य तय हो जाता है तो रास्ता मिलने लगता है, हमारे अंतर की सच्ची पुकार कभी भी अनसुनी नहीं रहती, परम पिता परमात्मा हमारे लिए वह सारे साधन जुटा देता है जो हमारे विकास के लिए आवश्यक हैं. हमारा जीवन प्रकृति के सूक्ष्म नियमों द्वारा संचालित होता है. पूर्व में किये गये कर्मों के अनुसार हमारे भावी कर्म नियत होते हैं, प्रमादवश मानव स्वयं को कर्ता मानता है, लेकिन वास्तव में प्रकृति के गुणों के अनुसार ही उसके कर्म होते हैं. साधक साधना के द्वारा इन गुणों के पार जाना चाहता है. चेतना में जगा हुआ जीव ही सचेत होकर कर्म करता है, जब वह गुणों के पार चला जाता है.

Monday, August 12, 2013

सुख सपना दुःख बुलबुला

दिसम्बर २००४ 
हमारे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, स्वयं को दुःख से मुक्त रखना. मन में क्रोध, अशांति, तनाव, द्वंद्व, उद्ग्व्निता तथा चिंता यदि न रहे तब जो शेष बचेगा वह परमात्मा है. हम अभी तक उससे अछूते बचे हैं, तो इसका एकमात्र कारण है हमारे मन की हिंसात्मक प्रवृत्ति. हम स्वीकारना नहीं चाहते, शरण में नहीं जाते तभी विरोध का भाव पनपता है. पूर्वाग्रह से ग्रस्त हमारा मन बहुत शीघ्र दुःख का भागी बन जाता है. भय भी तभी होता है, जब तक भय मन में रहेगा, हम प्रेम का अनुभव कैसे कर सकते हैं. ईश्वर प्रेम है, उसकी उपस्थिति तो हर क्षण है एक पर्दा हमें उससे दूर किये है और वह पर्दा है नकारात्मक सोच से उत्पन्न अहंकार. जो वास्तव में है नहीं पर व्यर्थ कल्पनाओं से इसे ठोस रूप हमने ही दिया है. मन में ही इसका नाश करने की योग्यता है. फिर भी यदि प्रारब्ध वश कोई दुःख हमारे जीवन में हो तो वह जाने के लिए ही आया है, ऐसा जानकर उसे साक्षी भाव से देखना होगा. हम दुःख में सीखते हैं और सुख में उस सीखे हुए के अनुसार जीते हैं, पर हमारा लक्ष्य तो इन दोनों के परे आत्मभाव में स्थित होकर आनन्द को प्राप्त होना है.


Wednesday, April 17, 2013

अंतर्मुखी सदा सुखी



हमारे जीवन का लक्ष्य सुख ही तो है, सुखी व्यक्ति अपने चारों और सुख ही बांटता है, संतुष्ट व्यक्ति अपने इर्द-गिर्द संतोष का भाव फैलाता है और शांत व्यक्ति शांति. ये सभी हमें अंतर्मुखी होने से प्राप्त होते हैं. ध्यानस्थ व्यक्ति कामनाओं की आहूति देता है, कामनाएं जो अग्नि की तरह हैं, जिनकी पूर्ति होने पर वे और बढ़ती हैं, उन्हें त्याग कर ही शांति का अनुभव होता है. भीतर भी ऊर्जा का प्रवाह हो रहा है, सब कुछ गतिशील है, लेकिन इन सभी गतियों के परे ऐसा कुछ है जो अचल है, जो सदा है. हमारी श्वास के सहारे हम भीतर की यात्रा पर उतरते हैं, प्रकाश का एक बिंदु या धीमी सी गुंजन हमारा मार्ग प्रशस्त करती है, हम एक अनोखे आनंद का अनुभव करते हैं, एक ऐसा आनंद जो बाहर की दुनिया में भी हमें संतुलित करता है. भीतर का बल बाहर भी कम आता है. हम निरपेक्ष होकर जीना सीखते हैं, हमारी स्वयं की मांग शेष नहीं रहती. हम देना चाहते हैं, क्योंकि तब जगत फीका लगता है, वह उस सुख का पासंग भी नहीं दे सकता, जगत तो निरंतर बदलने वाला है, वह नश्वर है, जबकि हम सदा थे, और सदा रहेंगे. 

Wednesday, February 13, 2013

ज्ञाता और द्रष्टा वही है


मार्च २००४ 
आत्मा चैतन्य है, चैतन्य ही स्वयं को जान सकता है, शेष सभी को भी वही जानता है. जो जगा हुआ है वह जानता है कि वह चैतन्य है. जागने के लिए उद्यम करना होगा. लक्ष्य को भूलना नहीं होगा, ज्ञान ही हमारी सजगता टिकाने में सहायक है. ज्ञान जब टिकेगा तो पुराने संस्कार भी मिटने लगेंगे, तब प्रारब्ध भी आयेगा तो छूकर निकल जायेगा. सजगता के लिए ही साधना है, ध्यान है. जागृत, स्वप्न और निद्रावस्था के मध्य भी कुछ ऐसे क्षण मिलते हैं जो चेतना का अनुभव कराते हैं. है, ऐसे क्षणों में हमें टिकना है, फिर हम उस चैतन्य को पा लेते हैं, जहां मन शांत हो जाता है. 

Friday, February 1, 2013

देह से विदेह तक


हमारी आत्मा के उद्घाटन के लिए ही साधना के पथ पर संत हमें ले जाते हैं. उनके निर्देशन में हम पग-पग कदम बढ़ाते हुए अपने लक्ष्य तक पहुंचते हैं. लक्ष्य यदि स्पष्ट हो और मार्गदर्शक साथ हो तो हर कोई उसे पा सकता है. हमारे अस्तित्त्व की सात परतें हैं-शरीर,   श्वास,      मन,     बुद्धि,      चित्त,     अहंकार व     आत्मा. मानव जन्म को हम तब सफल मान सकते हैं जब शरीर से आत्मा तक पहुंचें. आत्मा के नैसर्गिक गुण हैं- प्रेम, आनंद, सुख, शांति, शक्ति, ज्ञान और पवित्रता. तब वीतरागता, दया, करुणा आदि सहज ही भीतर होते हैं और हम अन्याय कर ही नहीं सकते., हम समाज के लिए उपयोगी हो सकते हैं. आगे बढ़ सकते हैं जहाँ भावधाराएँ उत्पन्न होती हैं. हाइपोथैलेमस यदि सक्रिय है तभी हृदय का होना सार्थक है, ध्यान से यह सहज ही होता है. यह अंतरिक्ष शब्दों से भरा है पर ज्यादातर शब्द व्यर्थ ही हैं. ऐसे शब्द जो हमारे भावों को उच्चता के लिए प्रेरित करें वही सार्थक हैं, और तभी हमारे मुख से निकले शब्द भी सार्थक होंगे जब वे बिना राग-द्वेष के बोले गए हों. यदि मानसिक, वाचिक तथा कार्मिक कृत्यों के प्रति हम सजग हों तभी ऐसा हो सकता है. हमारा ऐसा मन जो किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं है, तथा ऐसी बुद्धि जो निष्काम कर्म करने का संदेश दे, आत्मा में ले जाते हैं, तब मन अमन में ठहर जाता है और बुद्धि प्रज्ञा में बदल जाती है. तब मन दाता हो जाता है, सुख चाहिए का उसका राग स्वतः शांत हो जाता है, ऐसे मन में कैसा भय और कैसा संकोच, वह मन सिर्फ प्रेम ही कर सकता है. आनंद ही बाँट सकता है.