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Wednesday, August 19, 2020

जब आवे सन्तोष धन

 जीवन एक रहस्य है. अरबों-खरबों नक्षत्र और सृष्टि का अनंत विस्तरित रूप इसे रहस्यमय बनाता है. प्रकृति का स्रोत क्या है, कैसे एक नन्हा सा बीज विशाल बरगद का वृक्ष बन जाता है, कैसे ऋतु आने पर अपने आप ही धरती में दबे हुए हजारों बीज अंकुरित हो जाते हैं. बुद्धि से इसे समझना बहुत कठिन है. मन में हजारों संकल्प उठते हैं, इनका क्या स्रोत है. विचार उठकर कहाँ खो जाते हैं. इस क्षण इस पृथ्वी पर अरबों मनों में विचार उठ रहे होंगे, इस अनन्त ऊर्जा का स्रोत भी एक रहस्य है. मन में इच्छा जगती है और हम उसके अनुसार कर्म करते हैं, यदि यह इच्छा स्वयं को जानने की इच्छा बन जाये तो सम्भवतः अपने स्रोत का अनुभव मन कर सकता है. ध्यान में यही होता है. यदि कोई जीवन भर जगत की ही इच्छा करता रहे तो उसे जगत ही मिलेगा, यदि परमात्मा की इच्छा जगे तो जीवन में उस रहस्यमय का पदार्पण होगा. सन्तुष्टि का इसलिए इतना महत्व है, जब मन बाहर से सन्तुष्ट हो जाये तभी तो वह भीतर की और मुड़ेगा. 


Monday, July 15, 2019

अंतर्मन के द्वार खोल दें



इस वक्त जो कुछ भी हमारे पास है, वह जरूरत से ज्यादा है, यदि यह ख्याल मन में आता है तो भीतर संतोष जगता है. क्या यह सही नहीं है कि कभी जिन बातों की हमने कामना की थी, उनमें से ज्यादातर पूरी हो गयी हैं. मन में कृतज्ञता की भावना लाते ही जैसे कुछ पिघलने लगता है और सारा भारीपन यदि कोई रहा हो तो गल जाता है. जब हम अपने चारों ओर नजर दौड़ाते हैं तो जल धाराओं को बहाता हुआ विशाल आसमान जैसे यह संदेश देता नजर आता है कि भीतर कुछ भी बचाकर न रखें, सब यहीं से मिला है और सब यहीं छोड़कर जाना है, तो क्यों न सहज ही अंतर का वह द्वार खोल दें जिसके पीछे परम का अथाह खजाना छिपा है. हरीतिमा युक्त धरती भी अपने भीतर से जैसे सब कुछ उलीच देना चाहती है. जीवन प्रतिपल दे रहा है और हमें उसे अपने द्वारा बहने का मार्ग देना है.

Thursday, October 12, 2017

जब आवे संतोष धन

१२ अक्तूबर २०१७ 
साधक की नजर किस तरफ है सारा दारोमदार इसी पर है. क्या हम मात्र सुख के अभिलाषी हैं अथवा सुख के साथ-साथ संतुष्टि के भी. सुख क्षणिक है और उसकी कीमत चुकानी होगी. संतुष्टि समझ से आती है और दीर्घकालिक होती है. संतों और सदगुरुओं के वचनों से प्राप्त समझ जब जीवन में चरितार्थ होने लगती है तब जीवन नदी की शान्त धारा की तरह एक दिशा में प्रवाहित होने लगता है. जिसके तटों पर विश्राम भी किया जा सकता है और जिसके शीतल जल में सहजता से तैरा भी जा सकता है. जब सुख की तलाश में स्वयं को खपाकर और हाथ में दुःख के खोटे सिक्के पकड़ कर संसार सागर में लहरों के साथ ऊपर-नीचे डोलते रहने को ही जीवन समझ लिया जाता है, जीवन  संघर्ष बन जाता है. 

Thursday, September 21, 2017

शक्ति का संधान करें जब

२२ सितम्बर २०१७ 
देह प्रकृति का भाग है, चेतना पुरुष का. मानव इन दोनों का सम्मिलित रूप है. प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं, एक दूसरे के पूरक हैं. देह के बिना आत्मा कुछ नहीं कर सकती और आत्मा के बिना देह शव है. इन दोनों के भिन्न-भिन्न स्वरूप को जानना ही प्रत्येक साधना का लक्ष्य है. इसीलिए भारतीय संस्कृति में दोनों की उपासना की जाती है. प्रकृति का उपयोग करके आत्मा का अपने चैतन्य स्वरूप का अनुभव कर लेना ही मानव जीवन की सर्वोत्तम उपलब्ध मानी गयी है. प्रकृति को माँ कहकर उसकी विभिन्न शक्तियों के अनुसार अनेक रूपों की कल्पना की गयी है. दुर्गा की स्तुति करके जब साधक अपने भीतर सात्विक शक्तियों को जगाता है, उसे स्वयं के पार उस चैतन्य का अनुभव होता है. जिसका अनुभव करने के बाद उसे परम संतोष का अनुभव होता है.  

Monday, January 16, 2017

निज भाग्य का निर्माता मन

१७ जनवरी २०१७ 
हमारे आस-पास प्रतिपल कितना कुछ घटता रहता है. कुछ अनचाहा कुछ मनचाहा, पर हर वक्त हमारे पास यह अधिकार होता है कि हम क्या प्रतिक्रिया करें. ऊपर-ऊपर से लगता है हम जो भी प्रतिक्रिया कर रहे हैं वह बाहर की घटना के कारण है पर वास्तव में ऐसा नहीं है, हम यदि किसी बात पर सुखी या दुखी होते हैं तो यह केवल और केवल हम पर निर्भर है. ईश्वर ने हमें यह पूर्ण स्वतन्त्रता दी है कि किस समय हमारे मन की स्थिति कैसी रहे. जैसा भी भाव भीतर जगता है वह न केवल हमारी मानसिक दशा को दर्शाता है बल्कि भविष्य के लिए बीजारोपण भी हो जाता है. प्रतिक्रिया स्वरूप जगाया गया द्वेष भावी दुःख का कारण बनने ही वाला है. यदि संतोष का भाव जगाया तो भविष्य भी सुखमय होगा. 

Friday, December 2, 2016

प्यास लिए मनवा हमारा यह तरसे


जीवन का उद्देश्य क्या है, यदि कोई गहराई से इस पर सोचे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि  हर आत्मा अखंड प्रसन्नता का अनुभव करना चाहती है. उसके सारे  प्रयास इसी दिशा में होते रहते हैं. इन्द्रियों के विषयों के द्वारा सुख प्राप्त करना उसमें सबसे पहला साधन है. धन के बिना यह सम्भव नहीं तो मानव श्रम करता है, सुख-सुविधा के साधन जुटाता है. विकास की ओर  बढ़ता हुआ समाज उसी सुख की आशा करता है जो आत्मा की पुकार है. समाज सेवा के द्वारा भी कुछ लोग संतोष  का अनुभव करते हैं और कई पुण्य  कमाकर, किन्तु बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो इस सच्चाई को स्वीकार करते हैं कि जिस सुख की तलाश वह बाहर कर रहे हैं वह सहज ही उन्हें  मिल सकता है. ऐसा सुख ही अनवरत बहती हुई धारा  की तरह निरंतर उन्हें तृप्त कर सकता है. इसके बाद वे जो कुछ भी करते हैं उसके पीछे कुछ पाने की कामना नहीं रहती बल्कि भीतर का संतोष ही कृत्यों के रूप में बाहर प्रकट होता है.

Saturday, May 23, 2015

निर्मल खेती हो मन में

अप्रैल २००९ 
जैसे खरपतवार खेत में बिना किसी प्रयास के अपने आप ही उग जाती है, तथा वह फसल को भी खराब करती है, वैसे ही मन में व्यर्थ के विचार हमारे सद्विचारों को भी प्रभावित करते हैं. हमें तो ऐसी खेती भीतर करनी है, जिसमें खर-पतवार जरा भी न हो. अभय, संतोष, पवित्रता जैसे सद्गुण हों तो ऐसी खेती हो सकती है.

Saturday, December 14, 2013

जब आवे संतोष धन

गोधन, गजधन, गाजिधन और रतनधन खान, 
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान


मन जब संतोष पा लेता है, तुष्ट हो जाता है, तृप्त हो जाता है, तब संसार उसे नचाता नहीं. अनासक्त होकर जब हम कर्म करते हैं, तब कर्म बंधन नहीं बनता, कर्म तो हमें करना ही है, कर्म किये बिना हम क्षण भर भी नहीं रह सकते, प्रसन्न तभी रह सकते हैं जब संतुष्ट रहते हैं, संतुष्टि अपने आप में सबसे बड़ी सम्पदा है.. कभी कभी ऐसा लगता है, तुष्टि हमें आगे बढने से रोकती है, किन्तु इसमें सच्चाई नहीं है, तुष्ट व्यक्ति की सारी ऊर्जा उसके पास रहती है, वह  जिस तरह चाहे उसका उपयोग कर सकता है, साथ ही इस जगत के सारे कार्यों का लक्ष्य अंततः आनंद प्राप्ति ही है, तो यदि वह सुन्तुष्टि के रूप में हमें पहले से ही प्राप्त है तो श्रेष्ठ है, संसार से सुख पाना हो तो उसके आगे-पीछे घूमना पड़ता है, वह सुख क्षणिक होता है, कम-ज्यादा भी होता रहता है, भीतर का सुख अनवरत है, सहज है, अपना है, हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, वह  तृप्ति का सुख है, संतोष का सुख है. ईश्वर का सुख है, आत्मा का सुख है, वह एक बार किसी को मिल जाये तो कभी छिनता नहीं, वह समाधि का सुख है.  

Tuesday, April 23, 2013

सबसे बड़ा संतोष धन


जुलाई २००४ 
संतजन कहते हैं, जो भी हम करें, सौ प्रतिशत लगकर करें तो हमारा वह कार्य भी सफल होगा और भीतर संतोष भी जगेगा. संतोष से सुख उपजता है जो भीतर के आनंद की ही झलक देता है. आनंद किसी कार्य का मोहताज नहीं बल्कि वह तो कार्यों के रूप में प्रकट होता है, वह सहज होता है जैसे इस जगत में सहज ही दिन-रात घटते हैं. उसके होने का कोई कारण नहीं, वह तो सब कारणों का कारण है. इसलिए सहज संतोष भाव में जब कोई होता है तो यह उसके भीतर से वैसे ही छलकता है जैसे फूल से उसकी सुगंध, झरने से उसका निनाद, तथा आकाश से उसकी नीलिमा. प्रकृति सहज है तभी तक सुंदर है वरना तो विनाश भी ढा सकती है, वैसे ही मानव जब तक सहज है, आनंद का स्रोत है, वरना उसके भीतर ज्वालामुखी भी फट सकते हैं. अपनी असहजता के कारण वह खुद के साथ-साथ औरों को भी पीड़ा देता है. 

Wednesday, April 17, 2013

अंतर्मुखी सदा सुखी



हमारे जीवन का लक्ष्य सुख ही तो है, सुखी व्यक्ति अपने चारों और सुख ही बांटता है, संतुष्ट व्यक्ति अपने इर्द-गिर्द संतोष का भाव फैलाता है और शांत व्यक्ति शांति. ये सभी हमें अंतर्मुखी होने से प्राप्त होते हैं. ध्यानस्थ व्यक्ति कामनाओं की आहूति देता है, कामनाएं जो अग्नि की तरह हैं, जिनकी पूर्ति होने पर वे और बढ़ती हैं, उन्हें त्याग कर ही शांति का अनुभव होता है. भीतर भी ऊर्जा का प्रवाह हो रहा है, सब कुछ गतिशील है, लेकिन इन सभी गतियों के परे ऐसा कुछ है जो अचल है, जो सदा है. हमारी श्वास के सहारे हम भीतर की यात्रा पर उतरते हैं, प्रकाश का एक बिंदु या धीमी सी गुंजन हमारा मार्ग प्रशस्त करती है, हम एक अनोखे आनंद का अनुभव करते हैं, एक ऐसा आनंद जो बाहर की दुनिया में भी हमें संतुलित करता है. भीतर का बल बाहर भी कम आता है. हम निरपेक्ष होकर जीना सीखते हैं, हमारी स्वयं की मांग शेष नहीं रहती. हम देना चाहते हैं, क्योंकि तब जगत फीका लगता है, वह उस सुख का पासंग भी नहीं दे सकता, जगत तो निरंतर बदलने वाला है, वह नश्वर है, जबकि हम सदा थे, और सदा रहेंगे. 

Wednesday, June 27, 2012

महाजीवन की ओर


अप्रैल २००३ 
सदगुरु कहते हैं कि युग परिवर्तन चाहते हो तो स्वयं को बदलो, हिंसा का युग है, सही है, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. पर न हम हिंसा को रोकने में समर्थ हैं न भ्रष्टाचार को, सामर्थ्य है तो इतनी ही कि हमारे मन में हिंसा न हो, मनसा, वाचा, कर्मणा ऐसा कुछ भी न हो जो किसी को दुःख दे, न तो हम खुद भ्रष्टाचार को प्रश्रय दें न अपने आचरण में कोई ढील दें. एक-एक व्यक्ति स्वयं को दीप बनाता चले तो उजाला होने में देर नहीं हो सकती. हमें खुद को बदलना है, यह जगत ऐसा क्यों है इसकी परवाह किये बिना. कृष्ण को अपना आदर्श बनाना है जो सारे संकटों के मध्य भी विचलित नहीं होते. वह हमें आवाहन देते हैं कि स्वयं को जानकर सन्तोष, पूर्णता, रस, आनंद व प्रेम का अनुभव करें. इंसान की सारी दौड़ इसीलिये तो है कि इतना कुछ पा ले कि भीतर शांति महसूस करे, उसे सुख मिले. तो इस दौड़ का अंत तभी हो जाता है जब हमें खुद में विश्रांति पाने की कला आ जाती है. हम अपने घर लौटना सीख जाते हैं.  जीने की इच्छा के कारण हमें तन मिला, फिर कर्मों के बंधन के कारण विभिन्न जन्म मिले. स्वयं में स्थित होने पर पुराने कर्मों के बीज नष्ट हो जाते हैं, और तब महाजीवन का आरम्भ होता है.