योग की परंपरा हज़ारों वर्ष पुरानी है, पर आज भी जीवंत है क्योंकि समय के साथ उसमें परिवर्तन होते रहे और सामान्य जन के मध्य भी उसकी लोकप्रियता बनी रही। प्राचीन काल में हर बार संध्या वंदन के समय ध्यान भी किया जाता था। यह जीवन का एक अंग था, इसके लिए अलग से आयोजन करने की आवश्यकता नहीं थी, किंतु कालान्तर में ध्यान केवल विशेष साधना का अंग बन गया। इसका परिणाम यह हुआ कि मानव अपने आपसे दूर होता गया। वास्तव में हर मानव भौतिक व आत्मिक दोनों का मेल है, पर आज आत्मा की बात करने पर लोग इस तरह देखते हैं, जैसे किसीभूत की बात हो रही हो। देह के भीतर जो चैतन्य शक्ति है, वही तो आत्मा है, जब वह विश्राम में होती है, तब उसकी उस अवस्था को ध्यान कहते हैं और जब वह विचार या ज्ञान प्राप्त करने में लगी होती है, तब उसे मन या बुद्धि कहते हैं। हमारे भीतर जहाँ से 'मैं हूँ' की अनुभूति होती है, वह जीव है, जीव जब यह जान लेता है कि वह आत्मा से अलग नहीं है, वह आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। जब तक कोई योग को अपने जीवन का अंग नहीं बना लेता, वह इस तथ्य से अनभिज्ञ ही रहता है और स्वयं को देह, मन व बुद्धि मानकर संसार में सुख-दुख के झूले में झूलता रहता है। जब योग के द्वारा मन, बुद्धि व अहंकार अपने स्रोत से जुड़ जाते हैं, तब पहली बार ऐसे आनंद की अनुभूति होती है, जिसका कोई कारण नहीं है। तब जीवन में आने वाली कोई भी परिस्थिति प्रभावित नहीं करती।
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