मानव की दृष्टि सदा बाहर की तरफ़ रहती है। सभी इंद्रियाँ मन को बाहरी जगत की खबर देने के लिए तत्पर रहती हैं। जरा कहीं खटका हुआ, कान उधर मुड़ जाते हैं, जरा कहीं सुगंध की लहर आयी, नासिका सजग हो जाती है। इस तरह हमारी सारी ऊर्जा जो हम भोजन और नींद से प्राप्त करते हैं, जगत का ज्ञान प्राप्त करने में ही व्यय होती रहती है। ऐसे में जब कोई ध्यान करने के लिए कहता है, तो आधे घंटे के लिए भी शांत होकर इंद्रियों को भीतर की ओर मोड़ने का अभ्यास नहीं सध पाता। उस समय भी मन बाहर की ओर ही जाता है, बंद आखों से ही हम कल्पना में देख लेते हैं कि शायद दरवाज़े पर कोई आया है। अथवा सुगंध बता रही है कि आज खाने में क्या बना है। इस तरह भीतर जाने का एक और अवसर निकल जाता है। इसलिए ध्यान में बैठने से पहले ही मन को यह समझा देना चाहिए, कि उसे अगले कुछ समय तक केवल देह के भीतर चल रहे कार्य-कलापों पर भी ध्यान देना है। सबसे पहले श्वास पर ध्यान टिकाना है, इसके बाद नासिका के आगे के स्थान पर। इस तरह इंद्रियाँ कुछ देर के लिए शांत रहना सीख जायेंगी और यह भी समझ जायेंगी कि हर समय हमें उनकी ज़रूरत नहीं है, आख़िर गहरी नींद में भी तो मन जगत से विमुख होता है।वास्तव में ध्यान जागते हुए नींद में रहना ही है, जब मन जागे-जागे सोया हुआ है, वही ध्यान है। ऐसे में मन स्वयं को देख पाने में समर्थ होता है, वरना तो वह जगत को देखने में ही लगा रहता है।
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