जगत में सब कुछ दो पर टिका है, दिन-रात, सुख-दुख, आना-जाना, जन्म-मृत्यु!! मन भी इसी जगत का भाग है, वह दो के बिना रह ही नहीं सकता, जहाँ दो मिटते हैं, वहाँ मन, अमन हो जाता है। इसलिए जगत में इतनी अशांति है, क्योंकि मन को अमन बनाने की सहज कला ही मानव भूलता जा रहा है। प्रकृति के सान्निध्य में सहज ही मन थिर हो जाता है, इतना बड़ा आकाश और इतनी बड़ी धरती देखकर मन उतने समय के लिए एक में टिक जाता है। ईश्वर, गुरुजन अथवा बड़ों के आगे झुकते हुए भी मन एक हो जाता है, हाथ जोड़ते हुए भी उसी एकत्व का अनुभव होता है। शुद्ध प्रेम का स्वाद लेना हो तो मन को एक होना सीखना होगा। जहाँ तुलना होगी, स्पर्धा और ईर्ष्या होगी, वहाँ मन बँटा रहेगा। जहाँ बिखराव है, दूरी है, वहाँ दुख है, पीड़ा है। इसलिए योग के पथ पर चलना हरेक के लिए कितना आवश्यक है। कोई संगीतज्ञ, कवि, कलाकार या मूर्तिकार इस एकत्व का अनुभव करके आनंदित होता है, और उस आनंद को अपनी कला के माध्यम से जगत में प्रसारित करता है। संत अपने भीतर हर क्षण एकत्व का अनुभव करता है, सारा ब्रह्मांड उसे एक जीवित इकाई प्रतीत होता है। उसका मन आत्मा के रस में डूबकर आत्मा ही बन जाता है, जैसे रस में डूबा रसगुल्ला रस ही बन जाता है, या आग में पड़ा लोहा आग ही बन जाता है।
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