Sunday, July 12, 2026

जागे जब अभीप्सा मन में

जीवन प्रतिक्षण नये रूप में सम्मुख आता है। मौसम बदलते हैं तो चर्या भी बदल जाती है, मन भी बदल जाता है। विश्व की राजनीति का असर एक छोटे से गाँव में रह रहे किसान को भी झेलना पड़ता है। उसी तरह हर व्यक्ति के कर्म का असर पूरे संसार पर पड़ता है। कर्म चाहे मानसिक हो या भौतिक, उसकी तरंगें दूर-दूर तक फैल जाती हैं। यदि कोई समाज योग और अध्यात्म में रुचि रखता है तो निश्चय ही उसके आसपास का वातावरण शांति से भरा होगा। जहाँ भाषा की शुद्धता व सौम्यता का ध्यान रखा जाता हो, उस परिवार में आपसी कलह व द्वेष पनप ही नहीं सकते। जिस संस्था का प्रमुख अपने कृत्यों से आत्मीयता का वातावरण पैदा करे, वहाँ विकास सहज ही होता है। इसी प्रकार जहाँ मार्गदर्शन विद्वत्जनों, लेखकों साहित्यकारों का सम्मान होता है, लोग उनकी बात को सुनते हैं और उसका आदर करते हैं, वह समाज आगे बढ़ता है। यदि कोई अपने जीवन में सार्थकता का अनुभव करना चाहता है तो उसे निरन्तर ऊँचाई की तरफ़ देखना होगा, अपने सम्मुख उच्च आदर्शों को बनाये रखना होगा।छोटे-छोटे कदम उठाकर भी एक दिन उस मंज़िल को पाया जा सकता है, जिसकी अभिलाषा अंतर की गहराई में प्रायः सुप्त अवस्था में ही बनी रहती है। उस अभीप्सा को जगाना ही साधक का प्रथम कर्त्तव्य है। 

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