Wednesday, May 24, 2017

सहज मिले जब सुख का मोती

२५ मई २०१७ 
पंच इन्द्रियों से मिलने वाला सुख हमारी ऊर्जा को कम करता है, जब तक मन में प्रमाद और बुद्धि में जड़ता रहती है, अर्थात रजो गुण और तमो गुण अधिक होते हैं, हमें इस बात का आभास नहीं होता. सात्विक सुख की झलक मिल जाने के बाद ही समझ में आता है कि आज तक जिन्हें हम सुख के साधन मान रहे थे वास्तव में हमें दुर्बल बना रहे थे. अध्यात्म किसी भी तरह के प्रमाद और जड़ता को तोड़ने के लिए है. योग के द्वारा जब सतोगुण बढ़ता है भीतर सहज ही प्रसन्नता का अनुभव होता रहता है. ध्यान इस ऊर्जा को बढ़ाने का साधन है. 

जुड़ा रहे मन सदा सत्य से

२४ मई २०१७ 
स्व को एक क्षण के लिए भी भुलाना साधक के लिए उचित नहीं है. स्व का अर्थ है अस्तित्त्व के साथ एक होकर रहना, सहज होकर रहना और सजग होकर निरंतर कर्म में रहना. शरीर की हर कोशिका चेतना से ढकी है, यदि मन में नकारात्मक भावनाएं रहेंगी तो चेतना धूमिल हो जाएगी, चेतना जल की तरह है वह जिस पात्र में रखी जाती है उसका ही आकार ले लेती है. मन में हल्का सा भी तनाव हो तो चेतना पर आवरण छा जाता है और देह पर उसका असर होने लगता है. स्व की साधना में लगा हुआ साधक अपने जीवन को सजग होकर देखता है, इस देखने में ही मन शुद्ध होने लगता है, स्व मुखर हो जाता है. 

Tuesday, May 23, 2017

प्रकृति से जो जुड़ जाये

२३ मई २०१७ 
प्रकृति का हर रंग मनोहारी है. वर्षा की रिमझिम हो या या कोहरे से ढकी सुबह, रात की नीरवता हो या भरी दोपहरी में पंछियों के स्वर. प्रकृति के निकट रहने का अवसर जिसे मिलता है वह इसके जादू से अप्रभावित कैसे रह सकता है. प्रकृति माँ है, वह अन्नपूर्णा है, पोषित करती है और यह प्रकृति एक परम शक्ति की अध्यक्षता में कार्यरत है. वह समर्पित है, तभी सहज है. जितना-जितना मानव प्राकृतिक वातावरण से दूर रहने लगा है उसका नाता परमात्मा से भी कट सा गया है. उसकी प्रार्थनाएं भी अब सहज नहीं रह गयीं हैं. हरे-भरे खेतों में दौड़ लगाते, नीले आकाश की छाया में गुनगुनाते हुए कृषक बालक कितने मुक्त प्रतीत होते हैं. 

Sunday, May 21, 2017

भेद अभेद का राज जो जाने

२२ मई २०१७ 
उपनिषद कहते हैं, ईश्वर, जीव और प्रकृति ये तीन शाश्वत तत्व हैं. ईश्वर ने जीव और प्रकृति दोनों को आच्छादित किया हुआ है. प्रकृति जीव के हित के लिए है. जीव दोनों पर आश्रित है, अपने भौतिक अस्तित्त्व के लिए वह प्रकृति पर आश्रित है तो आत्मिक उन्नति के लिए ईश्वर पर. कभी वह प्रकृति के आकर्षण में डूब जाता है और कभी दुःख पाने पर परमात्मा की ओर झुक जाता है. साधना के द्वारा जब वह अपनी प्रकृति से भिन्न अपनी स्वतंत्र सत्ता का अनुभव कर लेता है, और परमात्मा के साथ अपनी अभिन्नता का अनुभव कर लेता है तो उसके सारे संशय समाप्त हो जाते हैं.  

Thursday, May 18, 2017

जगे प्रार्थना ऐसी भीतर

१९ मई २०१७ 
जीवन सुखमय हो ऐसी कामना सभी करते हैं, हमारे अपनों के जीवन में सदा सुख, सम्पन्नता और स्वास्थ्य बना रहे, ऐसी भी प्रार्थना हम विशेष अवसरों पर करते हैं. इसी तरह हमें भी कितनी बार अन्यों ने सुख व स्वास्थ्य की कामनाएं भेजी हैं, भेजते ही रहते हैं,. क्या हमने कभी सोचा है इन सबका कितना बड़ा असर हमारे जीवन पर पड़ता है. दिल से निकली हुई प्रार्थना कभी भी बेअसर नहीं जाती, और ऊर्जा के नियम के अनुसार भीतर से निकली हुई हर सकारात्मक ऊर्जा लौट कर हमारे ही पास आती है. ऋषि जब 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' का गायन करते थे तो उसमें उनके हृदय की सच्ची भावना जुड़ी होती थी, जो जगत के कल्याण हेतु अपना काम करती थी,  वह छोटी सी प्रार्थना लौट कर उन्हें कितना आनन्द से न भर जाती होगी. कितना अच्छा हो यदि रोज सुबह हम अपने लिए तो प्रार्थना करें या न करें स्वजनों, मित्रों और नगर, राष्ट्र तथा सम्पूर्ण सृष्टि  के कल्याण की कामना से अपने दिन का आरम्भ करें.

योग सधे जर्रे जर्रे से

१८ मई २०१७ 
 नीले अम्बर में सहज उड़ान भरता पंछी कितना प्रफ्फुलित प्रतीत होता है, अपने पंखों पर जब वह अप्रयास तिरने लगता है तब लगता है कोई अदृश्य सत्ता उसे सहेजे है. उसके पंखों में कितनी ऊर्जा है और उसके उर में कितना उल्लास, इसी तरह कूकते हुए पंछी अपनी मस्ती में न जाने कितने गीत गाते हैं. उनके भीतर संगीत के ये सुर किसी अनजान स्रोत से आते हुए प्रतीत होते हैं. मानव इन सबसे अनजान अपने छोटे-छोटे सुखों-दुखों में खोया हुआ प्रकृति के उस स्पर्श से वंचित ही रह जाता है जो मानवेतर जीवों को सहज ही प्राप्त है. कोई मानव जब स्वयं को  कुदरत से एक कर लेता है, विश्व के साथ अभिन्नता का अनुभव कर लेता है तो सारी कायनात उसे अपने साथ नाचती हुई दिखती है. हमारी उर्जा का स्रोत भी अजर हो सकता है बशर्ते हमें उससे जुड़ना आ जाये. 

Tuesday, May 16, 2017

श्वास श्वास है नेमत उसकी

१६ मई २०१७ 
वेदों में ऋषियों ने कितनी सुंदर प्रार्थनाएं गायी हैं. मन जब प्रार्थना से भर जाता है तो शुद्ध होने लगता है. सबके सुख की कामना, सम्पन्नता की कामना जब भीतर सहज ही उठने लगती है तो हृदय मधुरता का अनुभव करता है. जीवन के उपहार को पाकर जो मन अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञता के भाव से नहीं भरा वह परमात्मा के आनन्द से वंचित ही रह जाता है. जीवन में प्रेम को अनुभव करने के कोमल पल भी साधक के लिए उसे ही याद करने का निमित्त बन जाते हैं. प्रकृति के सुहाने मंजर हों या किसी के कंठ की मधुर आवाज, वर्षा की सोंधी सुगंध हो या उषा का आकाश, हर शै उसे याद दिलाने का सबब बन जाती है. धन्यता और कृतज्ञता का भाव जिसके हृदय में जग जाता है वह अंतर पल-पल प्रार्थना में लीन रहता है. 

Monday, May 15, 2017

भाव भरा जब अंतर होगा

१५ मई २०१७ 
ऋषि कहते आये हैं भाव यदि शुद्ध होंगे तो विचार रूपी वृक्ष भी शुद्ध होंगे और कर्मों के फल भी उन्हीं वृक्षों पर लगेंगे. भविष्य में उन कर्मों के फल रूप सौभाग्य हमारी ही थाती होगा. आज की पीढ़ी के मस्तिष्क को हम सूचनाओं से भरते जाते हैं पर उनके भाव पक्ष की तरफ ध्यान ही नहीं देते. भाव गहराई से आते हैं और शब्द ऊपर-ऊपर से, वे एक सजावट से ज्यादा काम नहीं करते, वे प्रामाणिक भी नहीं होते. बचपन से ही हम उन्हें प्रतिद्वंद्वी होना सिखाते हैं, जिससे हृदय पीछे छूट जाता है. ऐसा प्रतीत होता है मानो सदा ही वे एक दौड़ में रत हों. इसीलिए आज समाज सम्पन्न तो हो रहा है पर तनाव ग्रस्त भी. 

Friday, May 12, 2017

गुरू चरणों में नमन सदा

१३ मई २०१७ 
सत्य के खोजी को यदि कोई सत्य का चितेरा मिल जाये तो उसका मार्ग सरल हो जाता है. सरल ही नहीं उसके मार्ग पर फूलों के वृक्ष उग आते हैं. उसकी प्यास बुझाने के लिए कलकल करते झरने भी बहने लगते हैं और सदा एक हाथ उसके सर पर महसूस होता है जो उसे मार्ग पर ही टिकाये रखता है. किसी की दृष्टि उसे मिली है, वह नजर उसे अपने पथपर सजग रखती है. जिसने उस पथ के सारे मोड़ देखे हैं, जो उस पथ के हर कंकर-पत्थर से परिचित है, ऐसा कोई सद्गुरू यदि जीवन में आता है तो जीवन एक उत्सव बन ही जाता है. सत्य की राह तब एक मदमाती ख़ुशबू लिए अपनी ओर बुलाती है. मन निर्भार होकर, निर्भ्रांत होकर सहज ही अपने भीतर होते परिवर्तनों को देखता है. सुख-दुःख आते हैं, परिस्थितियाँ आती हैं, कभी रोग भी सताते हैं पर सबका साक्षी बना मन एक उसी के चरणों में समर्पित रहता है. जिसे एक बार सत्य की झलक मिल जाती है वह इस पल-पल बदलती दुनिया में कमल की भांति असंग रहना सीख जाता है.

Thursday, May 11, 2017

जग जाये जब शक्ति भीतर

१२ मई २०१७ 
शास्त्रों में कहा गया है, मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है. यहाँ जिस मानव जन्म की बात कही गयी है वह केवल मनुष्य का शरीर धारण करने मात्र से नहीं मिल जाता.यदि कोई अपने समय और सामर्थ्य का उपयोग केवल देह को बनाये रखने के लिए ही करता है अथवा केवल इन्द्रियों के सुखों की प्राप्ति के लिए ही करता है तो उसका मानव योनि में जन्म लेना सार्थक नहीं कहा जा सकता. मानव के भीतर देवत्व को पाने की जो चाह छिपी है उसे जागृत करके उस मार्ग पर चलना ही सही अर्थों में उसे मानव बनाता है. एक बीज के रूप में सभी के भीतर जो आत्मशक्ति छिपी है, साधना और भक्ति के द्वारा उसे प्रकट कर सकना ही मानव जन्म को दुर्लभ बनाता है. मनुष्य होकर जो भय, क्रोध अथवा शोक पर विजय प्राप्त नहीं कर सका उसने अभी देवत्व की ओर यात्रा आरम्भ नहीं की अर्थात वह मानव होने के वास्तविक अर्थ से वंचित ही रह गया. 

चिर नूतन जगती का मेला

११ मई २०१७ 
अनंत काल से यह सृष्टि चल रही है, लाखों मानव आये और चले गये, कितने नक्षत्र बने और टूटे. कितनी विचार धाराएँ पनपी और बिखर गयीं. कितने देश बने और लुप्त हो गये. इतिहास की नजर जहाँ तक जाती है सृष्टि उससे भी पुरानी है, फिर एक मानव का सत्तर-अस्सी वर्ष का छोटा सा जीवन क्या एक बूंद जैसा नहीं लगता इस महासागर में, व्यर्थ की चिंताओं में फंसकर वह इसे बोझिल बना लेता है. हर प्रातः जैसे एक नया जन्म होता है, दिनभर क्रीड़ा करने के बाद जैसे एक बालक निशंक माँ की गोद में सो जाता है, वैसे ही हर जीव प्रकृति की गोद में सुरक्षित है. यदि जीवन में एक सादगी हो, आवश्यकताएं कम हों और हृदय परम के प्रति श्रद्धा से भरा हो तो हर दिन एक उत्सव है और हर रात्रि परम विश्रांति का अवसर !  

Monday, May 8, 2017

मन जो लौट गया निज घर में

८ मई २०१७ 
मन जब भीतर जाकर अपने आप में ठहर जाता है तो विचारों के स्रोत से परिचय होता है. ऐसा अनुभव अतुलनीय है, भीतर से कुछ उमड़ कर बाहर उलीचने का मन होता है. पहली बार एक तृप्ति का अहसास होता है जो किसी भी भौतिक वस्तु पर आधारित नहीं है. सभी इन्द्रियां बाहर ही देखती हैं, मन ही ऐसा अनुपम साधन है जो बाहर और भीतर दोनों ओर जा सकता है. जिस क्षण जगत से सुख लेने की चाह न रहे मन स्वयं में लौट ही आयेगा. मन तब स्वनिर्भर होना सीखेगा, जितना-जितना स्व की महिमा का उसे भान होगा उतना-उतना वह भीतर से पूर्ण होता जायेगा. फकीर भी स्वयं को बादशाह मानते हैं क्योंकि उन्हें अपने सुख के  लिए जगत से कुछ नहीं चाहिए.