जीवन अनुभवों का दूसरा नाम है। हर अनुभव हमें कुछ न कुछ सिखाता है। यदि हम सीखने को सदा जारी रखें तो जीवन एक सुंदर यात्रा बन जाता है। यदि कोई कुछ सीखना न चाहे तो उसके लिए जीवन एक संघर्ष बन जाएगा। बच्चा सीखता है, इसलिए उसका मन ताज़ा बना रहता है। विद्यार्थी सीखता है और नए-नए विषयों को जानकर चमत्कृत होता है। प्रौढ़ होते-होते जैसे-जैसे सीखने की चाहत कम होती जाती है और तब सीमित ज्ञान के सहारे जीवन को चलाए जाने में सुरक्षा महसूस होती है। धीरे-धीरे जीवन से रस और आनंद सूखने लगता है। यह दुनिया अति विशाल है, इसके बारे में हम कितना कम जानते हैं। अपनी रुचि के अनुसार ज्ञान का कोई भी क्षेत्र लेकर हम उसके बारे में पढ़ें, सोचें व मनन करें तो कई नई बातों की ओर हमारा ध्यान अनायास ही जाएगा। कई ऐसी बातें हमें नज़र आ सकती हैं जो पहले नज़र अन्दाज़ कर देते थे। नियमित ध्यान इसमें अति सहायक है। ध्यान हमें एक विषय पर केंद्रित रहने की कला सिखाता है। ज्ञान अनंत है और हमारी चेतना में ही निहित है। उसमें प्रवेश करने का तरीक़ा ध्यान, अध्ययन व मनन ही हो सकता है।
Friday, September 2, 2022
Saturday, November 6, 2021
जीवन में जब उतरे ध्यान
Tuesday, December 22, 2020
बने साक्षी जो हर पल का
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों जिस पृष्ठभूमि पर घटते हैं वह एक रस अवस्था है. बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था तीनों को जो कोई एक अनुभव करता है वह इन तीनों से परे है. भौतिक, दैविक और आध्यात्मिक इन तीनों प्रकार के दुखों का जो साक्षी है वह इनसे परे है. मन, बुद्धि और संस्कार इन तीनों के भी परे है, सत्व, रज और तम इन तीन गुणों से भी वह अतीत है. यह सब हम शास्त्रों में पढ़ते हैं किन्तु इस पर कभी चिंतन नहीं करते. जागते हुए जो संसार हम देखते हैं वह स्वप्न और नींद में विलीन हो जाता है, स्वप्न में जो दुनिया दिखाई देती है वह आँख खुलते ही गायब हो जाती है, और गहरी नींद में तो व्यक्ति को यह भी ज्ञान नहीं रहता कि वह कौन है ? लेकिन हमारे भीतर कोई एक है जो पीछे रहकर सब देखता रहता है. जो कुछ हम जाग कर करते हैं, या स्वप्न में या नींद गहरी थी या हल्की, वह सब जानता है. बचपन से लेकर वर्तमान की स्मृतियों को जो अनुभव कर रहा है वह मन तो रोज बदल जाता है पर कोई इसके पीछे है जो कभी नहीं बदलता. आज तक न जाने कितने सुख दुःख के पल जीवन में आये, जो इनसे प्रभावित नहीं हुआ वह चैतन्य ही गुणातीत है. ध्यान में जब मन व बुद्धि शांत हो जाते हैं, तब जो केवल अपने होने मात्र का अनुभव होता है, वह उसी के कारण होता है. वह अनुभव शांति और आनंद से मन को भर देता है. इसीलिए हर धर्म में ध्यान को इतनी महत्ता दी गयी है.