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Sunday, July 13, 2025

स्वप्न सरिस यह जगत है सारा

संत व शास्त्र कहते हैं, आत्मा जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं में रहती हुई इस जगत के सुख-दुख का अनुभव करती है।ध्यान में उसे तुरीय या चौथी अवस्था का बोध होता है, जिसमें रहकर वह अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव करती है, जो सत्य है। सत्य शाश्वत है और सदा एक सा है। जागृत अवस्था में मन, बुद्धि, अहंकार, और दसों इन्द्रियां सभी अपने-अपने कार्य में संलग्न होते हैं. स्वप्नावस्था में कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं रहतीं पर ज्ञानेन्द्रियाँ, मन व अहंकार सजग होते हैं. सुषुप्ति अवस्था में मात्र अहंकार बचता है। स्वप्न में देखे विषय मन की ही रचना होते हैं, वे उतने ही असत्य हैं जितना यह जगत, जो दीखता तो है पर वास्तव में वैसा है नहीं. जगत के असत्य होने का प्रमाण अनित्यतता के सिद्धांत से मिलता है। वास्तविक सत्य का बोध क्योंकि अभी तक हुआ नहीं, यह सब सत्य प्रतीत होता है. वास्तविक सत्य वही परमब्रह्म है जिस तक जाना ही मानव का ध्येय है. 


Friday, December 3, 2021

तीन के जो भी पार हुआ है

जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों जिस पृष्ठभूमि पर घटते हैं वह एक रस अवस्था है.  बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था तीनों को जो कोई एक अनुभव करता है वह इन तीनों से परे है. भौतिक, दैविक और आध्यात्मिक इन तीनों प्रकार के दुखों का जो साक्षी है वह इनसे परे है. मन, बुद्धि और संस्कार इन तीनों के भी परे है, सत्व, रज और तम इन तीन गुणों से भी वह अतीत है. यह सब हम शास्त्रों में पढ़ते हैं किन्तु इस पर कभी चिंतन नहीं करते. जागते हुए जो संसार हम देखते हैं वह स्वप्न और नींद में विलीन हो जाता है, स्वप्न में जो दुनिया दिखाई देती है वह आँख खुलते ही गायब हो जाती है, और गहरी नींद में तो व्यक्ति को यह भी ज्ञान नहीं रहता कि वह कौन है ? लेकिन हमारे भीतर कोई एक है जो पीछे रहकर सब देखता रहता है. जो कुछ हम जाग कर करते हैं, या स्वप्न में या नींद गहरी थी या हल्की, वह सब जानता है. बचपन से लेकर वर्तमान की स्मृतियों को जो अनुभव कर रहा है वह मन तो रोज बदल जाता है पर कोई इसके पीछे है जो कभी नहीं बदलता. आज तक न जाने कितने सुख दुःख के पल जीवन में आये, जो इनसे प्रभावित नहीं हुआ वह चैतन्य ही गुणातीत है. ध्यान में जब मन व बुद्धि शांत हो जाते हैं, तब जो केवल अपने होने मात्र का अनुभव होता है, वह उसी के कारण होता है. वह अनुभव शांति और आनंद से मन को भर देता है. इसीलिए हर धर्म में ध्यान को इतनी महत्ता दी गयी है. 


Tuesday, December 22, 2020

बने साक्षी जो हर पल का

 जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों जिस पृष्ठभूमि पर घटते हैं वह एक रस अवस्था है.  बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था तीनों को जो कोई एक अनुभव करता है वह इन तीनों से परे है. भौतिक, दैविक और आध्यात्मिक इन तीनों प्रकार के दुखों का जो साक्षी है वह इनसे परे है. मन, बुद्धि और संस्कार इन तीनों के भी परे है, सत्व, रज और तम इन तीन गुणों से भी वह अतीत है. यह सब हम शास्त्रों में पढ़ते हैं किन्तु इस पर कभी चिंतन नहीं करते. जागते हुए जो संसार हम देखते हैं वह स्वप्न और नींद में विलीन हो जाता है, स्वप्न में जो दुनिया दिखाई देती है वह आँख खुलते ही गायब हो जाती है, और गहरी नींद में तो व्यक्ति को यह भी ज्ञान नहीं रहता कि वह कौन है ? लेकिन हमारे भीतर कोई एक है जो पीछे रहकर सब देखता रहता है. जो कुछ हम जाग कर करते हैं, या स्वप्न में या नींद गहरी थी या हल्की, वह सब जानता है. बचपन से लेकर वर्तमान की स्मृतियों को जो अनुभव कर रहा है वह मन तो रोज बदल जाता है पर कोई इसके पीछे है जो कभी नहीं बदलता. आज तक न जाने कितने सुख दुःख के पल जीवन में आये, जो इनसे प्रभावित नहीं हुआ वह चैतन्य ही गुणातीत है. ध्यान में जब मन व बुद्धि शांत हो जाते हैं, तब जो केवल अपने होने मात्र का अनुभव होता है, वह उसी के कारण होता है. वह अनुभव शांति और आनंद से मन को भर देता है. इसीलिए हर धर्म में ध्यान को इतनी महत्ता दी गयी है.

Tuesday, February 5, 2019

बना साक्षी जो हर पल का


५ फरवरी २०१९ 
जीवन में हम चार अवस्थाओं में रहते हैं. पहली अवस्था जागृत है, दूसरी स्वप्न, तीसरी सुषुप्ति और चौथी का कोई नाम नहीं है. जब स्वप्न चलता है तब जागृत का कोई भान नहीं रहता और सुषुप्ति की अवस्था में न जागृत और न ही स्वप्नावस्था का भान रहता है. जागृत के सुख-दुःख स्वप्न तक अपना असर दिखाते हैं पर सुषुप्ति में उनका कोई जोर नहीं चलता. आत्मा तब अक्रिय होती है पर उसमें शक्ति छिपी रहती है. चौथी अवस्था में हम न सोये हैं, न जगे हैं, न स्वप्न देख रहे हैं. निर्विकल्प समाधि के पार की वह अवस्था है. जागृत व स्वप्न सबकी अलग-अलग है, शेष दोनों हरेक के लिए एक सी हैं. हमारा नियन्त्रण केवल जागृत पर है. साधना का लक्ष्य है इन चारों अवस्थाओं के साक्षी हो जाना, अर्थात स्वयं को पूर्ण रूप से जान लेना.


Friday, February 9, 2018

स्वप्न सा यह जगत सारा


१० फरवरी २०१८ 
स्वप्न में देखे हुए दृश्य जैसे हमें जागने पर प्रभावित नहीं करते, जागृत में हुए अनुभव भी कुछ ऐसे ही हैं. बचपन में जिन वस्तुओं के बिना हम रह नहीं पाते थे, वे अब व्यर्थ हो गयी हैं. कल जो मित्र अपने निकट थे, आज वह दूर हैं, और उनकी याद भी नहीं आती. जो कुछ भी मन के द्वारा अनुभव किया जा सकता है, वह सभी बाहर है, उसके बिना भी हमारा अस्तित्त्व बना रह सकता है, बना रहा है. क्यों न हम उसे तलाशें जो हमसे अलग किया ही नहीं जा सकता, और वह तत्व है हम स्वयं...हमारा होना किसी बाहरी संयोग पर निर्भर नहीं है. ध्यान ही ऐसी प्रक्रिया है जो हमें हमारे मूल  तक ले जाती है. अपने मूल से जुड़कर ही कोई इस जगत को अपना क्रीड़ा स्थल बना सकता है, जहाँ बिताया हर क्षण आनंदित करने वाला है.

Tuesday, February 6, 2018

नाम-रूप से पार जो देखे

६ फरवरी २०१८ 
प्रतिपल इस जगत में कितना कुछ घट रहा है, सृष्टि के इस अनंत पटल पर न जाने कब से असंख्य खेल खेले जा चुके हैं, जा रहे हैं और खेले जायेंगे. आश्चर्य की बात यह है कि उस पटल पर उनका चिह्न भी शेष नहीं रहता. जैसे स्वप्न में हम किले बनाते हैं, विशाल पर्वत रच लेते हैं और जगने पर उनका नामोनिशान नहीं मिलता, वैसे ही यह जगत प्रतिपल ‘हाँ’ से ‘नहीं’ हुआ जा रहा है. जो इसे ही वास्तविक मान लेते हैं वह इस नाम-रूप के जगत के पीछे छिपे अव्यक्त कारण की खोज नहीं करते. जैसे सागर में उठी लहरें नाशवान हैं, वे सागर का ही एक रूप हैं और लहर नाम से जानी जाती हैं. लहरों के नाश होने पर सागर का नाश नहीं होता. सागर भी जल का एक रूप है और सागर नाम से जाना जाता है, यदि कभी सागर भी सूख जाये तो जल का नाश नहीं होता. इसी तरह मन भी आत्मा के सागर में उठी लहर ही है, और देह मन के सागर में उठी लहर. देह व मन के नाश हो जाने पर आत्मा का नाश नहीं होता.     

Wednesday, January 10, 2018

जग जायेगी जब जिज्ञासा

१० जनवरी २०१८ 
देह प्रतिक्षण बदल रही है, मन कहीं ठहरता ही नहीं, इन्हें देखने वाला द्रष्टा मात्र साक्षी है. बचपन की देह अब नहीं रही, युवावस्था भी बीत गयी और प्रौढ़ावस्था भी अधिक देर तक नहीं रहेगी. एक दिन देह भी गिर जाएगी, उस क्षण भी एक तत्व अखंड बना रहेगा. उस एक तत्व को जो जान लेता है और उसमें टिकना सीख जाता है, वह सुख-दुःख के पार चला जाता है. जगत में रहकर कार्य करते हुए, गाढ़ निद्रा में अथवा स्वप्न देखते समय वह एक तत्व निरंतर देखता रहता है. हम संसार को देखते हैं पर उस देखने वाले को नहीं देखते. नींद से जगकर जब हम कहते हैं, रात अच्छी नींद आयी तो यह जवाब वहीं से आता है. हर साधना का लक्ष्य बुद्धि में उस एक तत्व को जानने की लालसा जगाना ही है.

Monday, October 30, 2017

जीवन जैसे बूंद ओस की

३१ अक्तूबर २०१७ 
दुनिया में हम ऐसे रहते हैं जैसे सदा के लिए रहना हो. जीवन क्षण भंगुर है इस बात को बार-बार अनुभव करने के बाद भी मन संसार को पकड़ कर रखना चाहता है. मन कटु बातों को पकड़ लेता है, स्मृतियों के जाल में फंस जाता है या फिर भविष्य के बारे में सोचकर व्यर्थ ही आशंकाओं के बादल में घिर जाता है. इस संसार को स्वप्न की भांति देखने की समझ आने लगे, दूसरों के दृष्टिकोण को देखने की क्षमता विकसित हो अथवा हरेक में उसी अन्तर्यामी के प्रकाश को देखने की दृष्टि मिलने लग और सबसे जरूरी बात अपनी त्रुटियों को स्वीकारने की हिम्मत भीतर सदा रहे. इन सब उपायों से मानसिक ऊर्जा का ह्रास नहीं होता तथा मन कमल पत्तों पर पड़ी ओस की बूंदों की नांई शांत रहता है. हर सुबह यदि कोई इस बात को स्मरण रखे कि आज का दिन भी हजारों दिनों की तरह खो जाने वाला है तो व्यर्थ उसी क्षण गिर जायेगा. जीवन जब जिस पल में जैसा मिलेगा, उसे वैसा ही स्वीकार करना आ जायेगा. खाली मन में ही शांति की झलक मिलती है और शांति में ही सुख है, नव सृजन है.   

Wednesday, September 13, 2017

विस्मय से जब मन भर जाये

१३ सितम्बर २०१७ 
जीवन में कदम-कदम पर हमें कितनी ही आश्चर्यजनक स्थितियों का अनुभव होता है पर ज्यादातर हम उनका कोई न कोई उत्तर खोज कर मन को शांत कर देते हैं. विज्ञान के द्वारा जगत के कार्यकलापों का कारण खोजने लगते हैं. एक ऐसा आश्चर्य जिसका कोई निराकरण न हो सके विस्मय कहलाता है, और गहराई से देखें तो इस जगत का एक नन्हा सा रेत का कण भी मन को विस्मय से भर देने के लिए पर्याप्त है. हमारी देह की एक कोशिका भी अपने भीतर कितने रहस्य छिपाए है. विज्ञान के जवाब हमें भ्रमित करते हैं, ऐसा लगता है हम इसके बारे में सब जान सकते हैं. नींद भी एक रहस्य है और स्वप्न भी. चारों तरफ जैसे एक तिलिस्म छाया है. विस्मय से भरा मन ही फिर उस अज्ञात के सामने झुक जाता है. वह भी जैसे उस रहस्य का ही एक भाग बन जाता है.

Saturday, June 6, 2015

बनें साक्षी हम पल पल के

अगस्त २००९ 
हमारे जीवन में हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों या कहें कि अनंत पल खुशियों के आते हैं, बल्कि कहें कि हमारा जीवन सुख व आनंद की एक अनवरत श्रंखला है, अनगिनत जन्मों को जोड़कर देखें तो न जाने किस अतीत के काल से हम बने हुए हैं. परमात्मा की भांति हम भी अनादि हैं, उसकी भांति हम साक्षी हैं, कुछ न करते हुए भी सबका आनंद लेने वाले, हर श्वास एक आनंद की लहर का खबर देती है. जो स्वयं ही आनंद है उसे भी अपने आनंद का स्वाद लेने के लिए देह में आना पड़ता है. परमात्मा को मायाविशिष्ट चेतना में आकर लीला का आनंद लेना पड़ता है तो जीव को स्वप्न विशिष्ट चेतना में ! हम स्वप्न ही तो देख रहे हैं, एक लम्बा स्वप्न, जिसमें हमने एक नया पात्र धरा है, शरीर मन व बुद्धि का एक नया संयोग खड़ा किया है, स्वप्न से जागकर ही पता चलता है कि इसमें प्रतीत होने वाले सुख-दुःख मिथ्या थे, वैसे ही मृत्यु के वक्त पता चलता है, सब कुछ छूट रहा है, यह एक स्वप्न का अंत हो रहा है. हमारा ध्यान यदि मृत्यु से पूर्व इस ओर चला आये तो जीवन एक उत्सव ही प्रतीत होता है. 

Monday, January 26, 2015

एक आँख भीतर को खोलें


जो निकट से भी निकट है उसे जानना कठिन है, पर क्यों कठिन है ? जो हम स्वयं हैं, उससे विस्मृति कैसे हो गयी? हम स्वप्न में जी रहे हैं. स्वप्न में ही मिथ्या संबंध जोड़ लेते हैं तभी वास्तविक संबंध को पहचान नहीं पाते, वह संबंध जो हमारा अपने साथ है. इसी को अध्यास कहते हैं. हम देह को ही मैं मानते हैं क्योंकि हम इसे बाहर से ही देखते हैं, जब हम इसे भीतर से देखते हैं तत्क्षण आसक्ति छूट जाती है. वह आँख हमें पैदा करनी है जिससे हम भीतर झाँक सकें, देह का ठीक-ठीक बोध होते ही देह पर पकड़ ढीली होने लगती है तब दृष्टि चैतन्य की ओर जाती है. सत्य जानने से ही हम मुक्ति का अनुभव करते हैं. जब देह से दूरी बढ़ने लगती है तो परमात्मा से निकटता होने लगती है.


Friday, November 28, 2014

जब टूटेगा सपना मन का


हम जीवन भर एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न में ही तो प्रवेश करते रहे हैं ! हमारा जीवन अभ्यास और वैराग्य के बल पर ही इस चक्र से निकल सकता है. द्रष्टा में रहने का अभ्यास तथा संसार से वैराग्य, संसार जो पल-पल बदल रहा है, नाशवान है. हम जब संसार में ज्यादा उलझ जाते हैं तो स्वयं को भूल जाते हैं और भीतर की शांति और चैन से हाथ धो बैठते हैं. हमारे पास जो बहुमूल्य है वह है प्रेम, वही ईश्वर है, वही सत्य है, उसकी कीमत कुछ भी नहीं, वह तो बिन मोल मिलता है, बस दिशा बदलनी है, उसे खोजना नहीं है वह पहले से ही है केवल उसकी ओर देखना भर है. हम उतना सा भी कष्ट नहीं उठाना चाहते, हम सोचते हैं, जो मिला ही है उसकी क्या चिंता, थोडा संसार भर लें, पर यह भूल जाते हैं यह संसार आज तक किसी को नहीं मिला ! 


Tuesday, September 16, 2014

जाग सके तो जाग

मार्च २००७ 
ईश्वर कृपा रूप है, उसकी कृपा हर पल, हर स्थान पर बरस रही है. हम कृपा के सागर में ही रह रहे हैं पर हम इसे महसूस नहीं कर पाते. ज्ञान, कर्म और उपासना के द्वारा हम इसे महसूस करने के योग्य बन सकते हैं. ज्ञान का अर्थ है स्वयं के वास्तविक रूप का ज्ञान अर्थात आत्मा का ज्ञान, कर्म का अर्थ है निष्काम कर्म अर्थात जो सहज रूप से होते हैं न कि किसी कामना वश, उपासना का अर्थ है भक्ति, जो हमें ईश्वर के निकटतर लेती जाये. मात्र शाब्दिक ज्ञान हमें कहीं नहीं ले जायेगा वरण अनुभव करना होगा. अभी तो हम असजग हैं, स्वप्न में हैं, केवल रात्रि को ही स्वप्न नहीं देखते, दिन में भी भीतर जो अंतर धारा चल रही है वह भी तो स्वप्न ही  है. बीच में कभी क्षण भर के लिए स्वप्न टूटता है. काश ! यह हमारे जीवन की रात्रि का अंतिम स्वप्न हो. सन्त हमें जगाने आते हैं, वह जो स्वयं जगा है वही तो दूसरों को जगा सकता है.


Wednesday, August 27, 2014

मृत्योहम शिवोहम

फरवरी २००७ 
रात्रि काल में हम जो स्वप्न देखते हैं, वे हमारी इच्छा से नहीं आते, एक तरह से वे हम पर थोपे जाते हैं. जब भीतर की चेतना जगती है, तब सपनों पर हमारा अधिकार हो जाता है. जो स्वयं को सोये हुए देख लेता है वह भय से छूट जाता है साधना के द्वारा योगी मृत्यु का भी ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं. अपने अगले जन्म की तैयारी हम इसी जन्म में कर सकते हैं. भगवान शिव ने पार्वती को जीवन और मृत्यु का यह अद्भुत ज्ञान दिया था.


Monday, August 25, 2014

एक लहर उमड़े मस्ती की

जनवरी २००७ 
कोई हमारे कार्यों की प्रशंसा करे, निंदा करे या उपेक्षा, हर हाल में हमें निर्लेप रहना है. हम अपने भीतर स्थित रहें और यह मान लें कि निज ज्ञान की स्थिति के आधार पर ही लोग जगत में व्यवहार करते हैं. हमें उनके भीतर भी परमात्मा को ही देखना है और अपने भीतर की सौम्यता को बनाये रखना है. यह जगत उसी की रचना है और वह निर्दोष है, उसे तो इस जगत से कुछ लेना-देना नहीं है, उसने मात्र संकल्प से इसे रचा है, जैसे हम स्वप्न में सृष्टि बनाते हैं तो क्या हमारा दोष देखा जाता है यदि स्वप्न में हमें कोई हानि हो. ऐसे ही यह जगत भी एक लीला है, नाटक है, स्वप्न है इसमें इतना गम्भीर होने की कोई बात नहीं है. यहाँ सभी कुछ घट रहा है. यहाँ हम बार-बार सीखते हैं बार-बार भूलते हैं. नित नया सा लगता है यह जगत. हम वर्षों साथ रहकर भी कितने अजनबी बन जाते हैं एक क्षण में और जिनसे पहली बार मिले हों एक पल में अपनापन महसूस करने लगते हैं. कितनी अनोखी है यह दुनिया, कितनी विचित्र ! और हम यहाँ क्या कर रहे हैं ? हमें यहाँ भेजा गया है ताकि हम इस सुंदर जगत का आनन्द ले सकें और उस आनन्द को जो हमारे भीतर है बाहर लुटाएं.  

Tuesday, August 13, 2013

जागे जागे रहना है

दिसम्बर २०१३ 
हम रात्रि को ही स्वप्न नहीं देखते, दिन में भी एक विचार धारा जो भीतर निरंतर चलती रहती है, हमारी स्वप्नावस्था का ही एक रूप है, हमारे अनजाने में ही जो विचार विचरण करते है वही तो रात्रि में दृश्यों के रूप में दिखने लगते हैं. यदि हमें अपने भीतर स्थित पवित्र चैतन्य का बोध सदा बना रहे तो हम भीतर अखंड मौन का अनुभव कर सकते हैं. हम उससे बचे तभी तक रह सकते हैं जब तक सोये हैं. हमारे भीतर जो चेतना है, वह सहज है, वह है ही, उसे होना ही है, न उससे कुछ बढ़कर है न उससे कुछ कम है, सारे भेद ऊपरी हैं, भीतर एक ही तत्व है, वही परम सत्य है.


Thursday, June 6, 2013

फूल अनेक पर माला तो एक है

सितम्बर २००४ 
जाग्रत, सुषुप्ति तथा स्वप्न ये तीनों अवस्थाएं हम देखते हैं, जाग्रत को देखने वाला मन स्वप्न में बदल जाता है, नींद में वही सो जाता है. जैसे एक रात्रि को देखे स्वप्न का दूसरी रात्रि को देखे स्वप्न से कोई संबंध नहीं रहता, वैसे ही एक दिन की जाग्रत अवस्था को देखने वाले मन का दूसरे दिन के मन से कोई संबंध नहीं रहता, अज्ञानवश ही हम दोनों को एक मानते हैं. उसे एक बनाया है उस अखंड चैतन्य ने जो माला के धागे की तरह छिपा रहता है, और फूलों को देखकर हम उन्हें एक ही सत्ता मानते हैं, जबकि फूल भिन्न-भिन्न हैं. हमारे जीवन को एकत्व प्रदान करने वाली जो सत्ता है यदि हम निरंतर उसके साथ ही रहें तो इस भेद से मुक्त हो सकते हैं. एक में रहकर अनेक को देखा जा सकता है, पर अनेक में रहकर एक को नहीं देखा जा सकता. यदि हम नित्य-निरंतर एक ही भाव में स्थित रहें तो बदलने वाला यह जगत हमें प्रभावित नहीं कर सकता. इसके लिए हमें भूत और भविष्य दोनों को त्यागना होगा, वर्तमान में रहकर उस एक से जुड़े रहना सम्भव है. तब जो शेष रहता है वह है आनन्द और भीतर का मौन.


Friday, November 9, 2012

खाली मन में हुआ उजाला


संत राबिया अँधेरे में खोयी अपनी सूई को बाहर प्रकाश में ढूँढती है, लोग हँसते हैं तो वह कहती है “तुम भी तो अपने मन के अँधेरे में जिस सुख को खो चुके हो वहाँ न खोजकर दुनिया की चकाचौंध में उसे ढूँढते हो. मन के अँधेरे को मिटा कर वहाँ प्रकाश करो और वहीं ढूंढो जिसे बाहर ढूँढ रहे हो. स्वयं प्रकाश नहीं मिलता तो सद्गुरु से मांगो.” सद्गुरु हमें भक्ति प्रदान करते हैं, भक्त के कुशल-क्षेम का भार ईश्वर स्वयं उठाते हैं, जब वह संशयों से घिर जाता है, वह उसे भीतर से प्रेरित करते हैं. शरणागत की रक्षा कृष्ण स्वयं करते हैं. हम जिस तरह स्वप्न में तरह-तरह के रूप बना लेते हैं, पर वह वास्तविकता नहीं है, वैसे ही जो यह पल-पल बीत रहा है एक स्वप्न की भांति ही है. इस सत्य का बोध तब हमें होगा जब हम इस सच्चाई को अनुभव में उतारेंगे, अभी तो हमें मानना है तथा जानने का प्रयास करना है. हम जितना अधिक संवेदनशील होंगें उतना ही अधिक गहन हमारा अनुभव होगा. अनवरत प्रयास के बाद हम तीनों अवस्थाओं(जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) के पार हो ही जाते हैं. यदि हमें अपनी आत्मा को उड़ान देनी है तो उसे ग्रहणशील बनाना होगा, जब हमारे मन का प्याला पूरी तरह खाली होगा तभी हमें कृपा का प्रसाद मिलेगा. खाली होकर ही हम पाते हैं.

Sunday, September 2, 2012

मन की मनसा मिट गयी, भरम गया सब टूट


जुलाई २००३ 
“मन की मनसा मिट गयी, भरम गया सब टूट” जब कोई आग्रह नहीं बचता, मात्र उसी को पाने का आग्रह हो, तब एक ही क्षण में सदगुरु दृश्य रूपी मैल दूर कराने की क्षमता रखते हैं, पर हमें उसके लिये स्वयं को तैयार करना है. सकाम भाव से कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश हो, मन तुलना न करे, अच्छे-बुरे की भावना से भी ऊपर उठे, सिर्फ कार्य को नहीं कारण को भी देखे, और दोनों से निर्लिप्त रहे. यह जगत एक स्वप्न की नाई ही है जो प्रति पल गुजर रहा है. फिर इस गुजरने वाले दृश्यों को द्रष्टा की नाईं देखने में ही जीवन जा रहा है, ज्ञान दृश्य और द्रष्टा दोनों को शांत करता है, फिर मात्र एक आत्म सत्ता ही शेष रहती है, जिसके कारण यह जगत दृश्य मान है, हमें इस स्वप्न में अभिनय करना है, सो सजग होकर करेंगे कि यह सब तो अभिनय ही है, वास्तव में हम न करते हैं न भोगते हैं, शरीर करता है और मन भोगता है, हम न मन हैं न शरीर, सो व्यर्थ ही अधिक करने और अधिक पाने की इच्छा अपने आप शांत हो जाती है, मन में समता की भावना दृढ़ हो जाती है, भटकन तत्क्षण समाप्त हो जाती है. आत्मा की झलक हमें मिलने लगती है जो भव्य है.

Thursday, August 2, 2012

विचार के पार ही अमृत है


जून २००३ 
विचार ही हमारा संसार है, स्वप्न में भी यही विचार प्रकट होते हैं. स्वप्न भी हमारा खुद का बनाया  संसार है. धर्म विचारों से मुक्ति का नाम है. हमारे मन में यदि पूर्ववत् विचार चलते रहे तो हम धार्मिक कहाँ हुए. विचार जब हमारे चाहने से उठे और चाहने से शांत हो जाये तभी हम साधना के पथ पर आगे बढ़ते हैं, विचार से मुक्ति, स्वप्न से मुक्ति और कल्पनाओं से मुक्ति ही साधना है. जिस प्रकार गंध हर जगह है पर सूंघने का काम नासिका ही करती है उसी प्रकार ईश्वर सर्वत्र है पर उसे अनुभव करने का सामर्थ्य जागृत होने के बाद ही होता है. मन जब खाली हो, संकल्प-विकल्प न चलते हों, चित्त निर्मल हो तो वह अमृत रस भीतर प्रकट होता है. इस जगत में सुख-दुःख के झूले में बहुत झूल लिये, माँगने की कला को पीछे छोड़कर नित्य उस परम आनंद में स्थित रहने की कला हमें सीखनी है.