बुद्ध को जब ज्ञान हुआ तो उन्हें प्रफ्फुलित और आभावान देखकर एक व्यक्ति ने पूछा, क्या आप कोई देवता हैं ? क्या आप गन्धर्व हैं ? क्या आप मानव हैं ? हर बार उन्होंने इंकार किया, आखिर उसने पूछा, आप कौन हैं ? बुद्ध ने कहा मैं जागा हुआ हूँ, मैं जागृत हूँ ! उस व्यक्ति ने कहा होगा, मैं भी इस समय जगा हूँ, सो तो नहीं रहा, आप यह किस जागरण की बात कर रहे हैं? युग-युग से सभी सन्त व शास्त्र इसी जागरण की बात कहते आ रहे हैं, जिसमें व्यक्ति सौ प्रतिशत वर्तमान में ही रहता है. मनसा, वाचा, कर्मणा वह प्रतिपल सचेत रहता है. वह सत्य के प्रति भी सदा जागृत है अर्थात निरन्तर परिवर्तनशील इस जगत को नाशवान मानता है. वह जानता है कि इस जगत में सभी कुछ एकदूसरे पर आश्रित है. देह व मन की गहराई में स्थित शून्य अवस्था का भी उसे ज्ञान है. उसकी प्रज्ञा जग गयी है, वह घटनाओं के पीछे छिपे कारण को भी देख लेता है, इसलिए उनसे प्रभावित नहीं होता. व्यक्तियों के व्यवहार के पीछे कारण को भी समझने वाला वह किसी भी व्यक्ति के व्यवहार से सुखी-दुखी होना छोड़ देता है. वस्तुओं के संग्रह की उसे आवश्यकता नहीं, जितना और जब आवश्यक हो उतना ही ग्रहण करने की आशा वाला वह लोभ को त्याग देता है. देह को साध्य नहीं साधन मानकर वह ध्यान के लिए उसे स्वस्थ रखता है.
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Monday, June 29, 2020
Friday, February 9, 2018
स्वप्न सा यह जगत सारा
१० फरवरी २०१८
स्वप्न में देखे हुए दृश्य जैसे हमें जागने पर प्रभावित नहीं
करते, जागृत में हुए अनुभव भी कुछ ऐसे ही हैं. बचपन में जिन वस्तुओं के बिना हम रह
नहीं पाते थे, वे अब व्यर्थ हो गयी हैं. कल जो मित्र अपने निकट थे, आज वह दूर हैं,
और उनकी याद भी नहीं आती. जो कुछ भी मन के द्वारा अनुभव किया जा सकता है, वह सभी
बाहर है, उसके बिना भी हमारा अस्तित्त्व बना रह सकता है, बना रहा है. क्यों न हम
उसे तलाशें जो हमसे अलग किया ही नहीं जा सकता, और वह तत्व है हम स्वयं...हमारा
होना किसी बाहरी संयोग पर निर्भर नहीं है. ध्यान ही ऐसी प्रक्रिया है जो हमें हमारे
मूल तक ले जाती है. अपने मूल से जुड़कर ही
कोई इस जगत को अपना क्रीड़ा स्थल बना सकता है, जहाँ बिताया हर क्षण आनंदित करने
वाला है.
Monday, January 12, 2015
होश भी विश्राम भी
अगस्त २००७
भूख, प्यास से पहले, उनके
बाद, भय, कुतुहल, युद्ध से भागते समय तथा छींक से पूर्व दुखद स्थितियों का भी
उपयोग स्वयं को जानने के लिए कर लेना चाहिए. दुःस्वप्न नींद को तोड़ने के लिए होता
है. शास्त्र कहते हैं क्यों न हम दुखद स्थितियों का उपयोग जागने के लिए कर लें.
दुःख में हम पूर्ण जागरूक होते हैं, सुख में बेहोश होते हैं. उपवास इसलिए है कि हम
स्वयं के पास रहें, जागे रहें, सम्पूर्ण रहें. शरीर के कष्ट के समय हम जागरूक रहते
हैं. छींक के समय जब हम जागरूक होते हैं तो छींक नहीं आती. खाड़ी-खड्ड के मुहाने पर
भी हम सचेत होने का उपयोग कर सकते हैं. तेज गति में हम निर्विचार हो जाते हैं.
खतरे की घड़ी में हम गहन जागरूकता को प्राप्त होते हैं, जीवन की हर परिस्थिति का
साधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है. सतत् बोध रखना है कि ‘मैं हूँ’ !
होशपूर्वक विश्रांति, परिधि पर कुछ न हो रहा हो पर केंद्र पर सब कुछ हो रहा है,
यही ध्यान है !
Friday, December 19, 2014
जब जागो तभी सवेरा
जुलाई २००७
“जब जागें तभी सवेरा” हम
सोये हुए हैं, स्वप्न ही देखकर अपना जीवन बिता रहे हैं. शास्त्र व गुरू कहते हैं
हर पल सजग रहना है. मन, वचन, काया से हमसे किसी को उद्वेग न हो. यदि कभी किसी का
दिल दुःख ही जाये तो प्रायश्चित करना चाहिए, जैसे हर दिन तन को स्वच्छ करते हैं वैसे
ही हर रात सोने से पूर्व दिन भर की भूलों का स्मरण करके मन को धो डालना चाहिए. हर
परिस्थिति में सम भाव में रहने का तप करने से भी विकार नष्ट हो जाते हैं.
Wednesday, March 13, 2013
संध्याकाल में मिलता है वह
मई २००४
सुबह जब नींद पूरी तरह खुली भी नहीं हो और न ही हम सोये
हों, तो उसकी स्मृति लानी है, ऐसे वक्त में अपने मन को वहाँ ले जाना है जहाँ से
सारे विचार उठते हैं. ईश्वर का नाम हर स्थिति में सुखदायी है पर संधिबेला में उसका
प्रभाव अधिक होता है, वह दाहक भी है और पावक भी, वह अशुभ संसकारों को दग्ध करता है
और मन को पावन करता है. ध्यान में सुख है पर हमारे व्यवहार की परीक्षा तो जगत में
रहकर ही होती है. मन समता में टिका है या नहीं यह तभी पता चलता है. वर्षों साथ
रहने पर भी लोग एक-दूसरे को कहाँ समझ पाते हैं. आत्मा के स्तर पर जाकर ही कोई
दूसरे को समझ पाता है, जब ‘मैं कौन हूँ’ का जवाब मिल जाता है तो ‘तुम कौन हो’ का
जवाब ढूँढना नहीं पड़ता. जो मैं हूँ वही तू है, फिर कोई भेद नहीं रह जाता, कोई तब
दूसरा होता ही नहीं. यह जगत मिथ्या है, का अर्थ यही है कि भेद मिथ्या है, सभी के
भीतर उसी चैतन्य का प्रकाश है, सभी एक ही मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं.
Thursday, December 27, 2012
पावन प्रेम परम प्रसाद
दिसंबर २००३
प्रेम साकार भी है निराकार भी, वह
सूक्ष्म भी है स्थूल भी, प्रेम जागृति भी है, परम सुषुप्ति भी. वह अनिर्वचनीय है, वह जब हृदय में उत्प्न्न होता
है तो कोई द्वंद्व नहीं रह जाता, कोई विरोध नहीं रह जाता, तब कोई विचार भी नहीं रह
जाता, क्योकि विचार की उपस्थिति का अर्थ है द्वंद्व, जहां संकल्प होगा तो विकल्प
भी होगा. प्रेम की उपस्थिति में मन संकल्प-विकल्प रहित हो जाता है, उसी क्षण ध्यान
घटता है, भक्ति घटती है, इस अवस्था में आकर ही हम पूर्ण सहजता का अनुभव करते हैं,
और तब हमारे कार्य भी सहज होते हैं, वचन भी और विचार भी, उनमें कोई विरोध नहीं
रहता, अन्तकरण की सहज प्रेरणा से उत्पन्न, जैसे धरती से निर्झर फूटता है, उसका सौंदर्य
अनूठा होता है. प्रेम की यह अनुभूति जब एक बार हो जाती है तो उसकी महक जीवन में भर
जाती है. वह हृदय में बार-बार प्रकट होना चाहती है. कभी जीवन की आपाधापी में हम उसे
भुला भी बैठें पर वह सारी बाधाओं को पार करके स्वयं को प्रकट कर ही देती है. प्रेम
ज्ञान से उपजता है और ज्ञान प्रेम से, और दोनों की उपस्थिति में किया गया कर्म बाँधता
नहीं, क्योकि वह न कुछ पाने के लिए किया गया होता है न कुछ देने के लिए. प्रेमिल
हृदय आकांक्षा रहित होता है, वह उस बादल की तरह होता है जो बरस कर स्वयं को हल्का
कर लेता है और कुछ नहीं चाहता. उसके कर्म अस्तित्व को अर्पित हैं.
Wednesday, October 5, 2011
जागृत मन
मई २००२
मन सोया है या जाग गया है इसका पता कैसे चले तो शास्त्र बताते हैं कि सजगतापूर्वक वर्तमान में रहना इसकी पहली निशानी है. भूत का पश्चाताप भीतर न चलता हो भविष्य की कल्पना में संकल्प न उठते हों जिस क्षण जो कार्य हम कर रहे हों पूर्ण रूप से मन वहीं टिका हो तो ऊर्जा बचती है. दूसरी पहचान है मन सहज ही आनन्दित हो कुछ करके या कुछ पाकर खुश होना सोये मन का काम है, समाहित मन तो भीतर अपने मूल से जुड़ा होने कारण सहज ही प्रसन्न होता है. अहंकार वर्तमान में नहीं होता अहंकार भूत या भविष्य के साथ ही जुड़ा है और दुख का कारण वही है. जो वस्तु, व्यक्ति, या परिस्थिति हमारे सामने आये सहज बुद्धि से उसके साथ व्यवहार करने के बाद यदि मन खाली रहता है तो मन जाग गया है. यदि प्रभाव में आ जाता है तो सोया है.
Tuesday, October 4, 2011
दिव्यता
मई २००२
मन को नींद से जगाना है, शोध करते-करते ही बोध होता है. मन की गांठ जब तक नहीं खुलेगी तब तक अज्ञान नहीं मिटता और अज्ञान मिटे बिना ईश्वर का अनुभव भी नहीं होता. राग, द्वेष, अहंता, ममता आदि जीव की सृष्टि में हैं ईश्वर की सृष्टि में नहीं. अपनी प्रकृति तथा स्वभाव के अनुसार हम प्रेरित हो रहे हैं और सुख-दुःख का अनुभव कर रहे हैं. अपने तुच्छ स्वभाव को दिव्य स्वभाव में बदलना ही साधना है, और यही जागरण है, जिसके बाद ही हम मानव होने की गरिमा को प्राप्त होते हैं.
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