बुद्ध कहते हैं, जगत परिवर्तनशील है, यहाँ सब कुछ नश्वर है, वस्तुओं के पीछे भागना व्यर्थ है और संबंधों के पीछे भी, भीतर की शांति और आनंद को यदि स्थिर रखना है तो अपने भीतर ही उसका अथाह स्रोत खोजना होगा। शांति और आनंद से मन को भरकर ही करुणा के पुष्प खिलाए जा सकते हैं ! हमारे पास यदि स्वयं ही प्रेम नहीं है तो हम किसी को दे कैसे सकते हैं ! बुद्ध ध्यान पर बहुत जोर देते हैं और शील के पालन पर भी। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अलोभ और अक्रोध पर साथ ही प्रज्ञा पर भी। वे अनुभव करके स्वयं जानने को कहते हैं न कि किसी की बात पर भरोसा करके ! पहले मन को सभी इच्छाओं, कामनाओं, लालसाओं से ऊपर ले जाकर खाली करना होगा। यशेषणा, वित्तेषणा, पुत्रेष्णा और जीवेषणा से ऊपर उठकर भीतर के आनंद को पहले स्वयं अनुभव करना होगा फिर उसे बाहर वितरित करना होगा। वह कहते हैं, जगत में अपार दुख है, दुख का कारण अज्ञान है, अज्ञान को दूर करने का उपाय ध्यान है, ध्यान से ही दुख और शोक के पार जाया जा सकता है। अहंकार को मिटाकर ही कोई इस पथ का यात्री बनता है । धरती, पवन, अनल और जल की तरह धैर्यवान, सहनशील, परोपकारी और पावन बनकर ही बुद्ध ने अपने जीवनकाल में हजारों लोगों के जीवन को सुख की राह पर ला दिया था।
Tuesday, May 25, 2021
Wednesday, September 30, 2020
बुद्धम शरणं गच्छामि
भगवान बुद्ध कहते हैं हमें धरती से सीखना चाहिए. चाहे मानव इस पर सुगन्धित द्रव्य डालें या दुर्गंधित कचरा कूड़ा, धरती बिना किसी राग-द्वेष के दोनों को स्वीकारती है. जब मन में अच्छे या बुरे विचार आएं तो किसी में भी उलझना नहीं है, उनके गुलाम नहीं बनना है. हम जल से भी सीख सकते हैं, जल से जब गन्दे वस्त्रों या वस्तुओं को धोते हैं तो यह उदास नहीं होता. अग्नि पवित्र या अपवित्र दोनों पदार्थों को बिना किसी भेदभाव के जलाती है. हवा सुगन्ध या दुर्गन्ध दोनों को ही ग्रहण करती है. इन्हीं पांच तत्वों से हमारी देह बनी है. इसी प्रेममयी करुणा से हमें क्रोध को जीतना है. यही करुणा बदले में बिना किसी मांग के दूसरों को ख़ुशी प्रदान करने का साधन हो सकती है. दयालुता से भरा आनंद ही द्वेष को दूर कर सकता है. जब हम दूसरों की ख़ुशी में खुश होते हैं और उनकी सफलता चाहते हैं तभी यह आनंद हमारे भीतर पैदा होता है.