Thursday, March 26, 2015

जब भीतर का छंद जगे

जुलाई २००८ 
जब बुद्ध को ज्ञान हुआ तो वृक्षों में असमय फूल आ गये. हमें भी अपने भीतर इतनी संवेदनशीलता जगानी है कि फूलों की गुफ्तगू सुन सकें. प्रकृति के धीमे-धीमे स्वर हमें सुनाई दें. जब कोई भीतर के छंद को पा लेता है तो चारों ओर से परमात्मा उसे सहारा देने के लिए आ  जाता है. वह तो हर पल साथ है ही, हम ही बचते फिरते हैं, छिटके रहते हैं. जब हम प्रार्थना करना सीखते हैं, झुकना सीखते हैं, अहंकार को छोड़ देते हैं तब भीतर यह भाव पैदा होता है कि जो है वही होना चाहिए था. अहंकार हारता है पर लड़ने की प्रेरणा दिए जाता है. सम्मान की आकांक्षा ही अपमान को जन्म देती है. यदि हम कुछ होने की, कुछ पाने की जिद छोड़ दें तो जो है, जैसा है, वही प्रसाद सा लगने लगता है ! 

5 comments:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी है और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार- 27/03/2015 को
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः 45
    पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें,

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  2. बिलकुल ठीक,
    मंगलकामनाएं आपको !

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  3. दर्शन जी व सतीश जी, स्वागत व आभार !

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  4. सही कहा आपने ...
    जब कोई भीतर के छंद को पा लेता है तो चारों ओर से परमात्मा उसे सहारा देने के लिए आ जाता है. वह तो हर पल साथ है ही, हम ही बचते फिरते हैं, छिटके रहते हैं.

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  5. बिल्कुल सही कहा आपने।
    सराहनीय ।धन्यवाद।

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