Sunday, March 1, 2015

समता भाव साधना है

फरवरी २००८ 
प्रतिकूल संयोग हमारे लिए विटामिन है और अनुकूल संयोग हमारे लिए भोजन है. हम अपने जीवन में जो कुछ भी अच्छा-बुरा पाते हैं, हमारे कर्मों का फल है यदि ऐसी हमारी दृढ़ मान्यता है तो दुखों के आने पर हमें प्रसन्न होना चाहिए कि एक बुरा कर्म कट रहा है. भीतर समता बनाये हुए जब हम परिस्थिति को झेल जाते हैं तो भविष्य के लिए कोई कर्म बंध नहीं बांधते. इसी प्रकार सुख के मिलने पर किसी पुण्य कर्म का उदय हुआ है यह मानकर समता भाव बनाये रखना है, अन्यथा वह सुख भी बंधन बन जायेगा. 

5 comments:

  1. दुःख सुख में समत्व भाव ही सफल जीवन का रहस्य है...बहुत सटीक चिंतन...

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  2. गहन भाव जीवन की सार्थकता समझाते हुए !!बहुत सुंदर !!

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  3. स्वागत व आभार, कैलाश जी व अनुपमा जी !

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  4. भीतर समता बनाये हुए जब हम परिस्थिति को झेल जाते हैं तो भविष्य के लिए कोई कर्म बंध नहीं बांधते.

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  5. स्वागत व आभार राहुल जी !

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