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Friday, October 26, 2018

सब कुछ भीतर बाहर नाहीं


 २६ अक्तूबर २०१८ 
हमें जो भी चाहिए पहले से ही मिला हुआ है, इसीलिए हमारी नजर उस तरफ नहीं जाती. जो प्रचुरता में उपलब्ध हो उसकी कीमत घट जाती है, जो दुर्लभ हो वह बेशकीमती बन जाता है. शिशु को जन्म के साथ सहज ही आनंदित रहने की सौगात मिलती है, किन्तु माँ-पिता जब उसे खिलौना लाकर देते हैं, उसे खुश होने का अभिनय करना सिखाते हैं. कुछ बड़ा होने पर छोटे से कृत्य पर ही उसे पुरस्कार देते हैं, लोभी बनाते हैं. व्यर्थ के गीतों पर उसे नृत्य करना सिखाते हैं, उसका सहज नृत्य खो जाता है. प्रतिस्पर्धा की दौड़ में उसे भागना सिखाते हैं. जीवन को बनावटी बनाने के सारे उपाय किये जाते हैं. किशोर होते-होते बालक की सारी स्वाभाविकता खो जाती है. कठिनाई यह है कि उनके माता-पिता ने भी कुछ ऐसा ही उनके साथ किया था. शास्त्र व गुरू हमें स्वभाव की ओर वापस ले जाते हैं. सहजता व सजगता से जीना सिखाते हैं. जीवन की परिपूर्णता का अनुभव करवाते हैं. जिस प्रेम की खोज में लोग जीवन भर भटकते हैं और निराशा ही हाथ लगती है, वे उस प्रेम को हमारे ही अंतर्मन की गहराई से पुष्प की सुगंध की तरह जग में बिखराने की कला सिखाते हैं.


Friday, March 2, 2018

भंवरा बड़ा नादान है


३ मार्च २०१८ 
मन तितली या भंवरे की तरह इस विषय से उस विषय पर उड़ता रहता है, कुछ पल को एक जगह रुका फिर फर से उड़ गया. हल्की सी आहट भी उसमें हलचल ला देने में समर्थ है. फिर जैसे अचानक एक पुष्प पर तितली स्थिर हो जाती है और मधु का स्वाद उसे आने लगता है, वह उड़ना भूल जाती है वैसे ही मन जब अपने मूल में टिक जाता है, आनंद का अनुभव उसे होने लगता है, वह भटकना भूल जाता है. यदि कहीं जाता भी है तो पुनः घर लौटना चाहता है. परमात्मा का सुख उसे पुकारता रहता है. ऐसी ही स्थिति के लिए सूरदास ने कहा है, “जैसे उड़ी जहाज को पंछी पुनि जहाज पर आवे”. ध्यान का अभ्यास और जगत से वैराग्य इन दो साधनों के द्वारा चंचल मन परम पुष्प के पराग का आस्वादन कर सकता है.  

Wednesday, November 8, 2017

ज्ञान बिना कैसा सुख साधो

९ नवम्बर २०१७ 
जीवन यात्रा में चलते हुए हर कोई आनंद चाहता है. जन्मते ही बच्चा श्वास के रूप में सुख की मांग करता है, फिर भूख के दुःख को मिटाने के लिए आहार की. नन्हे से नन्हा जीव भी दुःख से बचना चाहता है. इसका कारण है कि जिस परमात्मा से इस जगत की सृष्टि हुई है, वह आनंद स्वरूप है. अपने आनन्द को लुटाने के लिए ही उसने यह विशाल आयोजन किया है. हिंसक पशुओं को पालने वाले भी इसका उदाहरण देते हैं कि वे भी आहार की पूर्ति हो जाने के बाद प्रेम और आनंद ही बांटते व चाहते हैं. प्रकृति का हर अंग चाहे वह लहराती हुई नदी हो या ऊंचे हिमखंड, देखने वाले को सहज ही आनंद से भर देते हैं. इतना सब होने के बावजूद भी मानव के जीवन में दुःख की अधिकता दिखाई देती है, अध्यात्म के अनुसार इसका कारण केवल और केवल अज्ञान है. 

Sunday, January 1, 2017

एक पहेली सा ही जीवन

२ जनवरी २०१६ 
जीवन सरल से सरल भी हो सकता है और कठिन से कठिन भी. हमारे सामने यह एक कोरे कागज की तरह आता है, जिस पर सवाल भी हम खुद लिखते हैं और जाहिर है जवाब भी हमें ही लिखने हैं. यदि कोई चाहे तो सवालों को इतना कठिन बनाता जाये कि स्वयं ही उनमें उलझ जाये और यदि कोई चाहे तो बच्चों की पहेली जैसे उसे खेल बनाकर हल करने का आनन्द लेता रहे. हमारे पास समय है, ऊर्जा है, देह रूपी उपकरण हैं, और बुद्धि रूपी  शक्ति है,  जिनसे  हम इस जीवनलीला का आनन्द लेते हैं. संत कहते हैं इस ऊर्जा का सदुपयोग होगा तो इसकी भरपाई सहज ही होती रहेगी और यदि इसका उपयोग नहीं किया गया तो यह ऊर्जा ही दुःख का कारण भी बन सकती है अथवा तो जीवन में एकरसता का. 

Monday, October 13, 2014

जिन डूबा तिन पाइयां

मार्च २०१४ 
हमारे चारों ओर धूप है, प्रकाश है, हवा है, आकाश है...हम डूब सकते हैं इन नेमतों के सागर में. सत्य की महक ने हमें निमन्त्रण दिया है. परमात्मा ने इस जगत को आनन्द के लिए ही बनाया है, हम आनन्द की तलाश में निकलते जरूर हैं पर रास्ते में ही भटक जाते हैं. एक शिशु अपनी मस्ती में नाचता है, गाता है, खेलता है वह आनन्द की ही चाह है. आनन्द बिखेरो तो और आनन्द मिलता है जैसे प्रकाश फैलाओ तो बढ़ता है. वही बच्चा जब धीरे धीरे बड़ा होने लगता है सहजता खोने लगता है, और तब अपने भीतर का द्वार भी भूलने लगता है. कभी शरम, डर या क्रोध और कभी शिष्टाचार की दीवार उसे भीतर जाने से रोकती है और वह ख़ुशी के लिए बाहरी वस्तुओं पर निर्भर होने लगता है. वस्तुओं का जो ढेर उसके आस-पास बढ़ता जाता है उसके भीतर भी एकत्र होने लगता है. साधक उस ढेर को समर्पित करके खाली हो जाता है और परमात्मा का रस बरस जाता है. 

Thursday, September 25, 2014

खोकर उसको ही पाना है


परमात्मा को पाकर हमें आनंद मिलता है, यह नया आनन्द है पर इस पर रुकना नहीं है. हमें आगे जाना है जहाँ आनन्द का सागर है. परमात्मा हीरा है, उसे केवल आनन्द का स्रोत समझा तो हम वहीं रुक जायेंगे. इस आनन्द को अपना आधार बनाकर आगे बढना है. इसे असीम तक ले जाना है. वही तो हमारा स्वभाव है. जैसे ही हमारी दुःख की पकड़ छूटी, भीतर सुख का झरना बहने लगता है. ध्यान से दुःख की चट्टान हट जाती है और हम अपने स्वाभाविक रूप को पा लेते हैं, आनन्द हमारा स्वभाव है तो परमात्मा हमारा स्वभाव है ! उसकी झलक तो कई  बार अनायास ही मिलती है क्योंकि वह भी तो हमें ढूँढ़ रहा है. कभी-कभी वह हमें पकड़ लेता है, आविष्ट कर लेता है. पर हमारे मन में कोई कोना ऐसा नहीं है जहाँ वह टिक सके, हम उसे आया हुआ नहीं देख पाते. हम कई बात ठिठके हैं, पर उसकी व्याख्या करके बात को टाल देते हैं, जब हम जागेंगे तभी जानेंगे कि परमात्मा तो सदा हमें मिलता रहा है जब पूर्ण हो जायेंगे तो पुरानी स्मृतियाँ भी ताजी हो जाएँगी कि उसको पाने से पहले कई बार पाकर खो चुके हैं. 

Friday, September 19, 2014

बना साक्षी सुख-दुःख का जो

मार्च २००७ 
जब गुरू जीवन में आते हैं तो जीवन को एक सही मार्ग मिलता है. हम साक्षी भाव को प्राप्त होते हैं. देह नित नाश की ओर जा रही है. हम स्वयं मरने वाले नहीं है, जड़ प्रकृति को अपना मान कर ही हम उपाधियों को प्राप्त होते हैं. सुखी-दुखी होने पर यह देखना चाहिए कि सुखी-दुखी कौन हो रहा है ? हम बेहोशी में स्वयं को ही सुखी-दुखी मान लेते हैं. साक्षी भाव में आते ही हम स्वयं को मुक्त अनुभव करते हैं. जब भीतर का वातावरण शांत हो, प्रेमपूर्ण हो, आनन्दपूर्ण हो और संतुष्टि से भरा हो तो मानना चाहिए कि साक्षी भाव जग रहा है. पूर्ण सजग रहकर इसे बनाये रखना है तथा मन, बुद्धि आदि में कोई हलचल हो भी तो उसे देखने मात्र से वह नष्ट हो जाती है. 

Friday, September 5, 2014

कैसा है यह जाल पसारा

फरवरी २००७ 
ज्ञान और भक्ति साथ-साथ चलते हैं. जब हमें आत्मा का ज्ञान होता है तो हृदय प्रेम से भर जाता है. आनन्द को कोई आनन्द से ही तो पूज सकता है. यह सारी प्रकृति उसी का रूप है जो हमें दिन-रात आनन्दित करने की चेष्टा करता है. वह स्वयं आनन्द स्वरूप है और आनन्द ही बिखेर रहा है. लेकिन हम अपने बनाये जाल में इतने मगन हैं कि उसकी ओर दृष्टि ही नहीं करते, वह हमें दुःख भी इसलिए देता है कि हम उससे उकता कर उसे देखें पर हमारी मूढ़ता की कोई सीमा नहीं है हम दुःख में ही सुकून ढूँढ़ लेते हैं. एक अजीब सी बेहोशी में सारा जगत डूबा हुआ है, जागकर देखता भी नहीं कि असल समस्या कहाँ हैं ?


Tuesday, September 2, 2014

यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे

फरवरी २००७ 
यह सारा संसार एक विशाल कम्प्यूटर की तरह है, हम इसमें जो भी फीड करते हैं, हमें वही वापस मिलता है. सभी के प्रति जब हम सद्भावना रखेंगे तो हमें वही वापस मिलेगी  और यदि कोई दुःख हमारे जीवन में आता भी है तो वह हमारे ही पूर्व कर्मों का फल है. यह समष्टि प्रेम, शांति, आनन्द तथा ज्ञान स्वरूप है. ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे’ के अनुसार जो समष्टि में है वही व्यष्टि में है. साधक के लिए संतों के वचन भीतर तक शीतलता पहुँचाने वाले हैं, जिन्हें सुनकर क्षण में वह अपने स्वरूप का अनुभव करता है.



Monday, August 25, 2014

फूल खिले जब ध्यान का

फरवरी २००७ 
सद्गुरु कहते हैं, ध्यान उत्तम प्रार्थना है. हमारे भीतर ही ऐसा कुछ है जहाँ पूर्ण विश्राम है. मन तो सागर की लहरों की तरह है अथवा आकाश के बादलों की तरह, जो आते हैं और चले जाते हैं, और सारे विकार वे भी तो मात्र विचार हैं जिनका कोई अस्तित्त्व ही नहीं. भय का विचार हमें कैसे जड़ कर देता है, जबकि वह है क्या, एक कल्पना ही तो ! हम खाली हैं, ठोस तो केवल अस्तित्त्व है जो सदा रहने वाला है, वास्तव में वही हम हैं, जिसमें से रिसता है प्रेम, करुणा, कृतज्ञता और शांति. जिसमें से झरता है आनंद. पहले विचार आंदोलित करते रहे हों पर ध्यान के बाद वे बेजान हो जाते हैं. उन्हें देखना भर है. उनमें स्वयं की शक्ति नहीं है, वे आते हैं और चले जाते हैं, जिसने तय कर लिया है कि अब से उसके जीवन में जो भी होगा श्रेष्ठतम ही होगा, उससे कम नहीं, सारा अस्तित्त्व उसके साथ है. ईश्वर श्रेष्ठतम है और वह हर क्षण हमारे साथ है.


Friday, August 22, 2014

मन के रूप अनेक

जनवरी २००७ 
हमारा मन तरल है, इसे जहाँ लगायें वह वैसा ही आकार ग्रहण लेता है. यह वही सोचता है वही कहता है, वही करता है जो हमने इसे सिखाया है. जैसे संस्कार हमने इसे दिए हैं वैसा ही यह बन जाता है. मन से बड़ा मित्र कोई नहीं और इससे बड़ा शत्रु भी कोई नहीं. जब तक इसमें आनन्द की कोंपलें नहीं खिलीं तब तक मन कृतज्ञता के गीत नहीं गाता, और जब तक कृतज्ञता के गीत नहीं गाता तब तक कृपा की वर्षा नहीं होती, कृपा से ही आनंद स्थायी होता है. जो मन स्वयं से दूर हो जाता है वह दुखी हो जाता है. 

Monday, August 18, 2014

ज्ञान की अग्नि जलाएं

जनवरी २००७ 
अनियंत्रित कामना के कारण ही क्रोध आता है. जो ज्ञानी हैं, उनका क्रोध पानी पर लकीर जैसा होता है, जो ज्ञान की साधना कर रहे हैं उनका क्रोध बालू पर लकीर जैसा, जो ज्ञान के इच्छुक हैं वे उतनी देर तक क्रोध में बने रहते हैं जितनी देर मिट्टी पर लकीर रहती है और जो अभी ज्ञान के पथ पर नहीं आये हैं, उनके हृदय में क्रोध उतनी देर तक बना रहता है जितनी देर लोहे पर लकीर. कामना विजातीय है, क्रोध भी विजातीय है, तभी हम उन्हें भीतर नहीं रख पाते, झट  प्रकट कर देते हैं. मनोजयी साधक प्रसन्नता को प्राप्त होता है, हर पल उसे आनन्द ही बना रहता है. साधक की कई बार परीक्षा भी होती है. उपलब्धि को यदि वह कृपा मानता है तो अभिमान से बचा रहता है. साधना का पहला सोपान है अंतःकरण की पवित्रता और अन्तिम सोपान है अंतःकरण की पवित्रता, यह साधना निरंतर चलती रहती है. मन जब निर्मल होता है तब ही उसमें समता आ पाती है, तब हर तरह की परिस्थिति में वह शांत रहता है. ज्ञान की अग्नि से कामना जल जाती है. 

Monday, August 11, 2014

भीतर नर्तक एक छुपा है

जनवरी २००७ 
ध्यान के बाद भीतर अद्भुत शांति छा जाती है, एक निस्तब्धता, सन्नाटा और गहरा मौन, जैसे भीतर कोई ठंडक बसी हो. उस मौन में एक संगीत गूंजता है जो निरंतर सुनाई देता है. एक आह्लाद का अनुभव होता है. एक नृत्य का जन्म हुआ हो जैसे और फिर कृतज्ञता के भाव जगते हैं. सन्त ध्यान की बड़ी महिमा बताते हैं, वे कठिन विषय को भी सहज बना देते हैं. उनकी बातें भीतर तक छू जाती हैं. सारे शास्त्र पुकार-पुकार कर यही कहते हैं, ईश्वर हमारे भीतर है, वह अपार शांति, ज्ञान और आनन्द का स्रोत है. हम उससे पृथक नहीं हैं. आत्मा व परमात्मा दोनों एक ही शै से बने हैं. जब मन सारी कामनाओं से मुक्त हो जाता है तब आत्मा में ही स्थित होता है. वैसे भी जिसे आत्मा का अनुभव हो जाये, उसे जगत से पाने लायक कुछ रह ही नहीं जाता, वह तो स्वयं दाता बन जाता है.  

Thursday, July 17, 2014

ज्ञानमयी वह प्रेम मयी है

अक्तूबर २००६ 
हमारे भीतर की दिव्यता को जगाने के लिए हमें बहुत ज्यादा प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि सच्चाई से उसे एक बार पुकारने की आवश्यकता है. महत् एक तत्व है जो परमाणु से परे है, सूक्ष्म से परे है, हमारे भीतर भी महत् है, जहाँ प्रभु का वास है. हम उसे भुला देते हैं, भयभीत रहते हैं. इस भय के कारण ही जीवन में समझौते करते चले जाते हैं. इस जगत में प्रेम नामक वस्तु का भ्रम ही तो है, उसे हम महसूस कहाँ कर पाए हैं, उसकी छाया भर हमें मिलती है और उसे सच मानकर हम छले जाते हैं. प्रेम तो हमारा निजस्वरूप है और उससे हमारा मिलन अभी हुआ नहीं है. आत्मा ऊर्जावान है, प्रेममयी है, आनन्दमयी है, शक्तिशाली है, फिर हमें भयभीत होकर रहने की क्या आवश्यकता है. निर्भयता वह पहला गुण है जो धर्म के मार्ग पर चलने वाले साधक को मिलता है. किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति से भयभीत न होना, दुखों से भी नहीं, दुःख तो हमें मांजते हैं, दुखों से दोस्ती करनी होगी और सुख की आशा का त्याग करना होगा. 

Wednesday, July 16, 2014

जाने कब उससे मिलना हो

सितम्बर २००६ 
संतों की वाणी हमें झकझोर देती है. हमारे भीतर की सुप्त चेतना जो कभी-कभी करवट ले लेती है, एक दिन तो पूरी तरह से जागेगी. हम कब तक यूँ पिसे-पिसे से जीते रहेंगे, कब तक अहंकार का रावण हमें भीतर के राम से विलग रखेगा. हमारे जीवन में विजयादशमी कब घटेगी. वे कहते हैं, हम जगें, प्रेम से भरें, आनन्द से महकें. हम जो राजा के पुत्र होते हुए कंगालों का सा जीवन बिता रहे हैं. सूरज बनना है तो जलना भी सीखना पड़ेगा. अब और देर नहीं, न जाने कब जीवन की शाम आ जाये, कब वह घड़ी आ जाये जब उससे मिलना हो, तब हम उसे क्या मुँह दिखायेंगे? ऐसा कहकर सन्त हमें बार-बार चेताते हैं.  

Tuesday, July 15, 2014

एक लहर उमड़ती भीतर

सितम्बर २००६ 
‘आनंद को जीओ’, ओशो ने कहा है. हम जीवन को इतना गम्भीर बना देते हैं कि मुस्कुराना भी छोड़ देते हैं. जब हम प्रेम से ईश्वर का नाम लेते हैं तो भीतर की सरंचना बदल जाती है और आनंद का स्रोत जो भीतर बंद पड़ा था, खुल जाता है. जो भीतर बैठा है वह जग जाता है, वह तो सदा जगा ही है, हम ही उसके प्रति सजग नहीं थे. आत्मा रूपी आनंद भीतर है पर मन अहंकार की चादर ओढ़े बैठा है. उस तक वह लहर पहुंच ही नहीं पाती. शरणागत होने पर वह चादर उतार कर रख देनी होती है और सन्त हमें इसी बात को याद दिलाने आते हैं. निर्भयता, कृतज्ञता पुरुषार्थ तब ही भीतर जगता है. संत के भीतर अनवरत सुमिरन होता है. वह सहज ही भीतर प्रवेश कर सकता है, आनन्द की वर्षा कर सकता है और उसमें भीग सकता है.

Sunday, July 13, 2014

हरि भजन कर ले मना

सितम्बर २००६ 
भजन वही है जो हमें शब्द से निःशब्द की ओर ले जाता है, क्रिया से क्रियाहीनता की तरफ ले जाता है, विचार से निर्विचार की तरफ ले जाता है. शब्द, विचार और क्रिया हमें संतप्त करते हैं, और संतृप्त करते हैं आनद व अश्रु जो इनके विपरीत से मिलते हैं. कर्मयोग का एक सिद्धांत है, कर्म तभी पूर्ण होता है जब हम उससे जो अपेक्षित हो वही चाहते हैं, वह अपेक्षित क्या है, वह है आनंद, उसके बिना हमारे कर्म अधूरे ही रहते हैं. हमारा हृदय आनन्द से भर गया है इसका प्रमाण है कि भीतर निर्भयता, निश्चिंतता और निर्मलता बढ़ गयी है. अनावश्यक चेष्टा न हो, वाणी से व्यर्थ काम न हो तथा मन सदा उसके स्मरण में रहे तो सच्चा भजन है.


Wednesday, June 18, 2014

भक्ति का जब दीप जलेगा

जुलाई २००६
ब्रह्म साकार भी है निराकार भी, वह परमात्मा के रूप में हमारे हृदयों में रहता है. हमारे मन का आधार भी वही है. मन जब कृष्ण समाहित होता है तो वह भीतर-बाहर उसे ही देखता है. मन के पार दोनों एक ही हैं. पर साधक यहीं आकर ठहर नहीं जाता, इसके बाद भक्ति के फूल खिलाता है. भक्ति के बाद ही जीवन में रस मिलता है, आनन्द प्रकट होता है, उल्लास प्रकटता है. उसकी व्यापकता का, भव्यता का ज्ञान होने के बाद ही भीतर कृतज्ञता का भाव उमड़ता है. धन्यभागी होने का भाव जगता है और तब जीवन में पूर्णता आती है. इस अनंत ब्रह्मांड को जो संकल्प रूप से रचते हैं वह परमात्मा हमारे आराध्य हैं यह भाव जगते ही मन प्रेम से झुक जाता है.                                                                                                       

Tuesday, June 3, 2014

एक सूत्र में जग पोया है

अप्रैल २००६ 
जब हम सुख के पीछे दौड़ते हैं तो दुःख पीछा करता है और जब ज्ञान के पीछे दौड़ते हैं तो आनन्द पीछे आता है. ज्ञान क्या है? एक ही चैतन्य सत्ता सबके भीतर व्याप्त है, वही जड़ में है वही चेतन में, मूलतः सभी एक ही तत्व से बना है. हमें भिन्नता को नहीं सबके भीतर व्याप्त सामान्य सत्ता को ही देखना है, वह सत्ता जो आनंद मयी, करुणा मयी तथा ज्ञानमयी है. सारे सद्गुण उसी में निवास करते हैं. सभी प्राणी भीतर से शुद्ध हैं, यदि किसी के प्रति हम दोष दृष्टि रखेंगे तो स्वयं को भी दोषी ही मानेंगे, तब अपने भीतर प्रवेश सम्भव ही नहीं होगा. वह परमात्मा जब पूर्ण है तो उसका जगत भी पूर्ण ही है. जो भी कमी है वह ऊपर-ऊपर है.  

Tuesday, May 6, 2014

सुंदर पथ है ज्ञान का

फरवरी २००६ 
ज्ञान में स्थित रहकर जीना ही वास्तविक जीवन है. ज्ञान का अर्थ है राग-द्वेष से मुक्त होकर जीना, जहां राग होगा वहाँ द्वेष भी होगा ही, जहाँ मान मीठा लगेगा अपमान कड़वा लगेगा ही. राग से छुटकारा पाने का उपाय यही है कि हम किसी की गलती कभी न देखें, जब तक हमें दोष दिखाई देते हैं तब तक प्रेम नहीं पनपा है ऐसा ही मानना चाहिए. ज्ञान में जीने का अर्थ यह भी है कि स्वयं को शुद्धात्मा देखें, व अन्यों को भी वैसा ही देखें. देह, मन आदि जड़ हैं, इन्हीं को नाम मिला है, जो हमारा नाम है वह वास्तव में इन्हीं का है, तो जो भी अनुभव होता है वह उसी को होता है, स्वयं उससे पृथक है, यह भाव दृढ़तर करते जाना है. तब कर्मों का बंधन नहीं होगा. कितना अद्भुत है यह ज्ञान जो सारे दुखों से मुक्त करता है, हमारे भीतर उस आनन्दमय राज्य का सृजन करता है, जिसकी कामना अनंत काल से मानव करता आया है.