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Friday, October 26, 2018

सब कुछ भीतर बाहर नाहीं


 २६ अक्तूबर २०१८ 
हमें जो भी चाहिए पहले से ही मिला हुआ है, इसीलिए हमारी नजर उस तरफ नहीं जाती. जो प्रचुरता में उपलब्ध हो उसकी कीमत घट जाती है, जो दुर्लभ हो वह बेशकीमती बन जाता है. शिशु को जन्म के साथ सहज ही आनंदित रहने की सौगात मिलती है, किन्तु माँ-पिता जब उसे खिलौना लाकर देते हैं, उसे खुश होने का अभिनय करना सिखाते हैं. कुछ बड़ा होने पर छोटे से कृत्य पर ही उसे पुरस्कार देते हैं, लोभी बनाते हैं. व्यर्थ के गीतों पर उसे नृत्य करना सिखाते हैं, उसका सहज नृत्य खो जाता है. प्रतिस्पर्धा की दौड़ में उसे भागना सिखाते हैं. जीवन को बनावटी बनाने के सारे उपाय किये जाते हैं. किशोर होते-होते बालक की सारी स्वाभाविकता खो जाती है. कठिनाई यह है कि उनके माता-पिता ने भी कुछ ऐसा ही उनके साथ किया था. शास्त्र व गुरू हमें स्वभाव की ओर वापस ले जाते हैं. सहजता व सजगता से जीना सिखाते हैं. जीवन की परिपूर्णता का अनुभव करवाते हैं. जिस प्रेम की खोज में लोग जीवन भर भटकते हैं और निराशा ही हाथ लगती है, वे उस प्रेम को हमारे ही अंतर्मन की गहराई से पुष्प की सुगंध की तरह जग में बिखराने की कला सिखाते हैं.


Monday, June 8, 2015

मुक्त सदा ही रहता है वह

सितम्बर २००९ 
परमात्मा सृजन तो करता है, सृष्टा तो है पर कर्ता नहीं. शास्त्र कहते हैं परमात्मा नर्त्तक है, वह है और नृत्य भी हो रहा है, नृत्य उसके बिना नहीं हो सकता पर वह नृत्य के बिना भी हो सकता है. परमात्मा प्रकृति के साथ एक भी है और भिन्न भी. सारी प्रकृति वर्तती है उसकी उपस्थिति में ही, पर परमात्मा स्वयं नहीं वर्तता ! उसकी मौजूदगी ही काफी है. जो इस मौलिक तत्व को समझ लेता है वह कर्तापन के भाव से मुक्त होकर जीता है. प्रकृति बड़ी शांति से अपना काम करती है यह जानकर हमारी पकड़ छूट जाती है.

Sunday, June 17, 2012

मन गोपी सा हो पावन


अप्रैल २००३ 
गो का अर्थ है इन्द्रियाँ तो गोपी वही है जिसका अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण है, मन भी तो छठी इंद्री है, तभी हम परमात्मा के साथ आनंद नृत्य में शामिल होने के योग्य होते हैं. यदि कोई व्याधि सताए तो समझना चाहिए कि यम, नियम का पालन नहीं हुआ, कहीं न कहीं मनमुखता हुई है. सत्संग हमें मन को स्थिर रखने के कितने उपाय बताता है, संशयों और भ्रांतियों को दूर करता है. सत्य से जुडना सिखाता है. सत्य से ही हमारी शोभा है, वही प्रेम है और प्रेम हमें मुक्त करता है. अंतर में रूहानी संगीत व नृत्य का अनुभव कराता है. प्रातः काल जैसे हम स्नान करते हैं, वैसे ही सत्संग का जल हमारे मन के स्नान के लिये है. संतों की वाणी वह उबटन है जो हमारे मन का मैल रगड़–रगड़ कर स्वच्छ करता है. और वह फूल जैसा महकने लगता है. और तब वह उस ईश्वर को अर्पित होने के काबिल बन ही जाता है. मनरूपी पुष्प जब उनके पास पहुंचता है तो प्रभु उसे स्वीकार कर लेते हैं.