Friday, September 4, 2026

कृष्णम् वन्दे परमानन्दम वंदेहम्

आज कृष्ण जन्माष्टमी है। पाँच हज़ार वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण इस धरती पर आये और आज तक अपने अनंत प्रेम व अनंत ज्ञान की वर्षा में भिगो रहे हैं। उनका जन्म व हर कर्म दिव्य था, इसलिए आज भी हम उनके प्रेम को अनुभव करते हैं। कृष्ण कितने विनम्र थे, इसका भान उनके  जीवन की कितनी ही घटनाओं से मिलता है। राजसूय यज्ञ में वह अपने लिए जो कार्य चुनते हैं, वह था, यज्ञ में पधारे ब्राह्मणों और अतिथियों के पैरों का प्रक्षालन और उनकी जूठी पत्तलें उठाना। कृष्ण इतने पूज्य और सम्मानित थे कि उनकी अग्रपूजा की गयी थी, फिर भी उन्होंने अपने लिए ये कार्य चुने। ऐसा करके उन्होंने यह संदेश दिया कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। कार्य का महत्व उसके पीछे के भाव से होता है, उनके ह्रदय में सभी के लिए अथाह प्रेम था, जिसे व्यक्त करने के लिए उन्होंने सेवा के ये कार्य चुने। कृष्ण को हम ब्रह्मांड का स्वामी मानते हैं, सृष्टि का कारण मानते हैं, पर वह स्वयं को गोपियों व ग्वालों के प्रेम का ऋणी मानते हैं। उनसे प्रेम करना मानो स्वयं को उनके आत्मीयों में शामिल कर लेना है। सारी प्रकृति उनसे प्रेम करती है, वे स्वयं गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं। यमुना नदी, कालिया नाग, कदंब का वृक्ष, गौएँ और बंदर सभी तो उनकी लीला में शामिल हैं। हज़ारों वर्षों से कृष्ण की कथा ने कवियों और भक्तों के दिलों को आकर्षित किया है और यह आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है।