Showing posts with label गीत. Show all posts
Showing posts with label गीत. Show all posts

Friday, September 1, 2017

भाव युक्त हो अंतर अपना

१ सितम्बर २०१७ 
जीवन में होने वाले अनुभवों में अधिकतर भीतर का भाव ही लौट-लौट कर आता है. जब किसी हृदय में परम के प्रति प्रेम का जागरण होता है तो वह प्रेम अपनी सुवास स्वयं ही बहा देता है,  इसके लिए शब्द जुटाने नहीं पड़ते. पका फल जैसे अपनी मिठास से भर कर खुदबखुद टपक जाता है,  भाव भरा अंतर भी इसी तरह व्यक्त हो जाता है. जिसने उसे अनुभव किया है उसने ही गीत गाए हैं. वह खुद भी नहीं जानता कितना बड़ा रहस्य अपने भीतर छुपाये है. जीवन स्वयं में एक रहस्य है, इसका रचियता भी और उसके प्रति समर्पित अंतर भी. जीवन धारा अविरल गति से बही जा रही है, किन्तु इसका आधार भी तो है. समयचक्र घूम रहा है, इसका केंद्र भी तो है. जगत गतिशील है, किन्तु गति का अनुभव कराने वाला अचल तत्व भी तो है. जिसने उसे अपने मन का मीत बना लिया वही दिव्य प्रेम को अनुभव सकता है.  

Tuesday, July 11, 2017

प्रतिपल बदल रहा है जग यह

१२ जुलाई २०१७ 
हमारे दुखों का कारण हमारे ही भीतर है, इसका ज्ञान होते ही हम सबल हो जाते हैं. जिस वस्तु का निर्माण हमने किया है उसे नष्ट करने की क्षमता भी तो हमारे ही पास है. यदि जगत हमारे दुखों का कारण हो तब तो हम असहाय हैं, क्योंकि जगत को बदलने की क्षमता हमारे पास है ही नहीं, जगत अपनी राह चलेगा ही. यदि बाहरी कारण हमारे अंतर्मन की दशा को प्रभावित करते हैं तब तो हम कभी भी प्रसन्न नहीं रह सकते क्योंकि बाहर तो सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है. मौसम ही अनुकूल-प्रतिकूल होते रहते हैं. व्यक्ति बदल जाते हैं. यहाँ तक कि हमारा खुद का मन भी सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग भावों में रहता है. बस एक हम ही हैं जो कभी नहीं बदलते, जो अनंत काल से जैसे थे अनंत काल तक वैसे ही रहेंगे. पर हम तो अपने उस न बदलने वाले स्वयं से कभी मिले ही नहीं, इसलिए कभी ख़ुशी कभी गम के गीत ही गाते रहे. 

Friday, August 22, 2014

मन के रूप अनेक

जनवरी २००७ 
हमारा मन तरल है, इसे जहाँ लगायें वह वैसा ही आकार ग्रहण लेता है. यह वही सोचता है वही कहता है, वही करता है जो हमने इसे सिखाया है. जैसे संस्कार हमने इसे दिए हैं वैसा ही यह बन जाता है. मन से बड़ा मित्र कोई नहीं और इससे बड़ा शत्रु भी कोई नहीं. जब तक इसमें आनन्द की कोंपलें नहीं खिलीं तब तक मन कृतज्ञता के गीत नहीं गाता, और जब तक कृतज्ञता के गीत नहीं गाता तब तक कृपा की वर्षा नहीं होती, कृपा से ही आनंद स्थायी होता है. जो मन स्वयं से दूर हो जाता है वह दुखी हो जाता है. 

Sunday, July 6, 2014

असली याद वही करता है

सितम्बर २००६ 
भक्त परमात्मा की कृपा को हर क्षण अनुभव करता है. गुरू के वचन उसके लिए अमृत के समान होते हैं जो भीतर की सारी पीड़ा को धो डालते हैं. वह सद् मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं. उनकी दी हुई शक्ति से भर कर वह भविष्य के प्रति आशावान रहता है और वर्तमान के प्रति सजग. भक्त कभी उसे याद न भी करे तो वह स्वयं अपनी याद दिलाता है. कभी-कभी जो भक्त के भीतर आनन्द के फूल बेवजह ही खिलने लगते हैं, गीत स्वतः झरने लगते हैं तो उसी ने किसी रूप में पुकारा होता है. उसकी महिमा के गीत यूँही ही तो नहीं गाए गये. वह क्या है यह तो शायद वह स्वयं भी नहीं जानता.  

Tuesday, July 1, 2014

धरती से आकाश तक

अगस्त २००६ 
किसी कवि ने ठीक कहा है –

अधिकांश आकाश छूट जाता है
थोड़ी सी भूमि गुनगुनाता हूँ


हम उस आत्मा को जो आकाश की भांति व्यापक है , कैद करना चाहते हैं पर वह पकड़ में नहीं आती. मन, बुद्धि से परे वह आत्मा सदा हमसे दूर ही रहती है, फिर हम हार कर मन, बुद्धि का आश्रय छोड़ देते हैं तो भीतर से कोई गीत गाने लगता है. संगीत फूटने लगता है. उस दुनिया में कुछ भी थोड़ा सा नहीं सब कुछ अनंत है. अनंत चिदाकाश, अनंत आनंद, अनंत शांति, अनंत प्रेम तथा अनंत ज्ञान भी ! जीवन का, कण-कण में बसी चेतना का ज्ञान ! तब छोटापन खत्म हो जाता है, सारी सीमाएं छूट जाती हैं. हम उसे विराट के अंश हैं और उसका सब हमारा है यह भाव दृढ हो जाता है. आत्मा का यह ज्ञान अद्भुत है, पर जब यह सहज रूप से हमारे कर्मों, वाणी तथा व्यवहार से प्रकट होने लगे तभी टिका हुआ जाना जायेगा.  

Wednesday, October 10, 2012

भक्ति कहो या प्रेम..


प्रेम कितने-कितने रूपों में हमारे सम्मुख आता है कई बार हमें स्वयं भी ज्ञात नहीं होता कि किसी के प्रति इतना प्रेम हमारे अंतर में छिपा है, पर वह अपना मार्ग स्वयं ही ढूँढ लेता है. यदि हमें किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति से प्रेम है तो वह वहाँ तक जाने का मार्ग स्वयं ही तलाश कर लेगा, प्रेम सच्चा है यही उसकी परख है. उसके सम्मुख फिर संसार की कोई बाधा नहीं रह जाती, वह ऊँचा हो जाता है, हमारा मन, बुद्धि, भावनाएँ सभी उस पावन प्रेम की बाढ़ में बह जाती हैं. जिस क्षण हम ऐसा विशुद्ध प्रेम पाते हैं, वह क्षण भी दैवीय होता है और वह क्षण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया की परिणति होता है, यकायक हम इतना सारा प्रेम तभी अनुभव करते हैं जब अचानक कोई निधि मिल जाये, फिर उसे धीरे-धीरे अपने भीतर समोने लगते हैं, जब पोर-पोर में वह रिस रहा होता है तो हम यह जानते भी नहीं, फिर एक क्षण में वह प्रकट होता है अपने पूर्ण वैभव के साथ. ईश्वर के प्रति प्रेम भी ऐसे ही धीरे-धीरे मन में एकत्र होता जाता है. ईश्वर से जो प्रेम हमें हर पल मिलता है हम उसे सहेजते जाते हैं अन्जाने ही, फिर वही प्रेम कभी आँखों से बह निकलता है, तो कभी कोई गीत बनकर. प्रेम एक बहुत उच्च भावना है, यह कचोटती भी है, सहलाती भी है, यह हमें उदात्त बनाती है, हम प्रिय का हित चाहते हैं और अधिक प्रेम में भर जाते हैं. संत इसी प्रेम को भक्ति का नाम देते हैं, प्रेम के लिए प्रेम ! एक अनवरत धारा जो प्रिय के प्रति हमारे मन में बहती है, चाहे वह उसे जाने अथवा नहीं हमें इसकी परवाह नहीं होती, क्योंकि प्रेम अपना मार्ग खोज ही लेता है.