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Friday, August 8, 2014

समझ समझ कर चलना होगा

जनवरी २००७ 
बुद्ध पुरुषों के वचनों को समझ लेने मात्र से हम बुद्ध नहीं हो पाते, जब तक हमारा स्वयं का अनुभव न हो. उनके वचन सत्य सिद्ध हैं, वे उनके अनुभव हैं पर वे हमारे जीवन को नहीं बदल सकते. वे केवल तथ्य की सूचना देते हैं, उनकी उदघोषणा में कोई भावावेश नहीं है. वे हमें हमरी समझ के अनुसार चलने का आग्रह करते हैं. हम मात्र बुरा-बुरा कहकर विकार को छोड़ने की कोशिश करते हैं पर सफल नहीं होते. यदि विकार को विकार की तरह देखते हैं तभी बदलते हैं. हमारे दृष्टि में भी जब विकार अग्नि जैसा लगे, तभी हम उससे बचते हैं. यदि संकट की घड़ी में ही केवल पुण्य का विचार करें और आराम के वक्त यदि सहजता से विकार के वश में रहें तो जिससे हम लड़ते हैं वह प्रबल होता है. हम जिसका दमन करते हैं वह एक न एक दिन बाहर आयेगा.